नई दिल्ली, जेएनएन। आतंकवाद और फिक्सिंग से पाकिस्तान की विश्व क्रिकेट में छवि खराब हुई लेकिन एक ऐसी चीज भी है जिससे ज्यादातर लोग अनजान हैं और वह है तब्लीगी जमात। भारत में इस समय तब्लीगी जमात चर्चा में है लेकिन पाकिस्तानी क्रिकेट काफी समय से इस जमात के साए में है।

पाकिस्तानी मीडिया में इस पर कई लेख लिखे गए। पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार, उनकी क्रिकेट टीम में तब्लीगी जमात के कायदे-कानून की एंट्री पूर्व पाकिस्तानी बल्लेबाज इंजमाम-उल-हक से हुई। इंजमाम ने अपनी कप्तानी के दौरान ही नहीं संन्यास के बाद चयनकर्ता के दौरान भी इस जमात में अपनी राष्ट्रीय टीम के क्रिकेटरों की भर्ती कराई। अब वर्तमान में पाकिस्तान क्रिकेट टीम के राष्ट्रीय चयनकर्ता मिस्बाह-उल-हक हैं और वह भी तब्लीगी जमात से जुड़े हुए हैं जबकि इंजमाम-उल-हक इस्लामिक मिशनरी संगठन तब्लीगी जमात के एक प्रमुख सदस्य हैं।

एक पाकिस्तानी अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, इंजमाम-उल-हक चयन समिति में आने के बाद 2017 टी-20 चैंपियंस ट्रॉफी के लिए जिस हिसाब से टीम का चयन कर रहे थे तो लगा रहा था कि वह क्रिकेट टीम का नहीं मस्जिद ले जाने के लिए जमात का चयन कर रहे हों। 2016 में उन्हें पाकिस्तान की राष्ट्रीय टीम का मुख्य चयनकर्ता नियुक्त किया गया था। इंग्लैंड में पिछले साल हुए विश्व कप के दौरान भी पाकिस्तान की चयन समिति के मुखिया इंजमाम थे और लाजमी था कि वह उन ही लोगों को टीम में लेंगे जो उनकी विचारधारा से मेल खाते हों।

इंजमाम जब इंग्लैंड में कुर्ता-पैजामा पहनकर बढ़ी दाढ़ी के साथ टीम के अभ्यास सत्र में पहुंचे तो कई विदेशी पत्रकारों को लगा कि ये मौलाना यहां क्या कर रहा है। हालांकि बाद में पता चला कि वह तो इंजमाम हैं। इस विश्व कप में पाकिस्तानी टीम बुरी तरह हारी, खास तौर पर भारत से हार के बाद उसकी और उसके कप्तान सरफराज अहमद की बहुत आलोचना हुई। इसके बाद सरफराज ने अपने ट्विटर प्रोफाइल में खुद को हाफिज-ए-कुरान और क्रिकेटर लिखा है। हाफिज-ए-कुरान का मतलब है कि जो बिना देखे पूरी कुरान का उल्लेख कर सकता है।

इंजमाम क्रिकेट से संन्यास लेने के पहले ही जमात की ओर जाने लगे थे। उन्होंने दाढ़ी बढ़ाना शुरू कर दिया था। उनका अधिकांश समय इबादत, अल्लाह और जमातों में बीतता। उनकी देखा देखी सईद अनवर, मिस्बाह और मुहम्मद युसूफ भी अपना अधिकांश समय जमात में बिताने लगे। उस समय में यह दौर भी था जो क्रिकेटर तब्लीगी जमात के लिए तैयार नहीं होते थे, उन्हें राष्ट्रीय टीम से जगह भी गंवानी पड़ती थी। यह इंजमाम की कप्तानी में था कि जमात की प्रार्थनाएं अनौपचारिक रूप से अनिवार्य हो गईं।

जमात के लिए तैयार नहीं होने के कारण शोएब अख्तर, यूनिस खान और अब्दुल रज्जाक को राष्ट्रीय टीम में नियमित जगह बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ा था। मिस्बाह एमबीए हैं। वहीं, युसूफ पहले ईसाई थे और मुसलमान बनने के बाद ही वह जमातों की शान हो गए थे। जमातों में ये इस्लाम के फायदे बताते और लोगों को सच्चा मुसलमान बनने को कहते हैं। अनवर, मिस्बाह, युसूफ को जो समय क्रिकेट को देना चाहिए था वो समय इनका तब्लीग और जमात में बीतने लगा।

कई पाकिस्तानी खेल पत्रकारों ने लिखा है कि 1990 से 2000 तक बुलंदी पर रहने वाली पाकिस्तान की टीम का गर्त में जाने का कारण उसका धर्म की तरफ कुछ अधिक ही मुड़ जाना था। टीम इसमें इस हद तक खो गई कि उसे यह तक नहीं दिखा कि वो क्रिकेट जिसने उन्हें विश्व में पहचान दी थी वो उनसे उनकी आंखों के सामने दूर हो रहा है।

Posted By: Sanjay Savern

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