नई दिल्ली, अभिषेक त्रिपाठी। सुप्रीम कोर्ट में बीसीसीआइ मामले के मुख्य याचिकाकर्ता और क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार के सचिव आदित्य वर्मा ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विनोद राय की अध्यक्षता वाली प्रशासकों की समिति (सीओए) की कार्यप्रणाली से नाखुश हैं।

आदित्य ने कहा कि नौ अगस्त को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया लेकिन मुझे लगता है कि 18 जुलाई 2016 जैसे हालत बीसीसीआइ और राज्य संघों में अभी भी बने हुए हैं।

कोर्ट के आदेश को दरकिनार किया जा रहा है और विनोद राय असहाय हो चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चार सप्ताह में स्टेटस रिपोर्ट दें। मुझे पता चला है कि स्टेटस रिपोर्ट तैयार है लेकिन उन्हें खुद के जाने का डर है और इसलिए वह इसे दाखिल नहीं कर रहे हैं। 22 मई को वह 70 साल के हो चुके हैं। उन्हें डर है कि नए मुख्य न्यायधीश 70 साल के प्रावधान को लेकर उन पर सवाल न खड़े कर दें।

बीसीसीआइ में सुधार ही निजी हितों के टकराव को लेकर होना है। इसके कारण शरद पवार, राजीव शुक्ला और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे बड़े-बड़े नेताओं को जाना पड़ा लेकिन सीओए वर्तमान में ऐसे लोगों को बचा रहा है। हैदराबाद में दो क्लब होने के कारण डॉक्टर श्रीधर को बीसीसीआइ ने जनरल मैनेजर पद से हटा दिया गया था लेकिन अभी दैनिक जागरण ने ही छापा था कि मयंक पारिख मुंबई में छह-छह क्लब चलाते हैं फिर भी वह एमसीए में शामिल हैं।

सबसे आश्चर्य की बात है कि वह मुंबई के क्रिकेट सेंटर में चौथे फ्लोर में बैठते हैं और दूसरे फ्लोर पर एमसीए का ऑफिस है। इसके बावजूद उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। सीईओ राहुल जौहरी ने पांच दिन में उनसे जवाब मांगा था लेकिन अभी हाल में एक अखबार से कहा कि अभी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट चल रहा है इसलिए हम पारिख मसले पर कुछ नहीं कर रहे हैं। क्या यह मजाक नहीं है?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धता बताया जा रहा है। पारिख को किसके इशारे पर बचाया जा रहा है? सीओए ने उत्तराखंड में अपनी मर्जी से एडहॉक कमेटी बना दी। हैदराबाद के अध्यक्ष और सचिव में झगड़ा था और वहां पर भी एडहॉक कमेटी बना दी गई लेकिन बिहार में खिलाड़ियों के चयन के वीडियो-ऑडियो आने के बावजूद कुछ नहीं किया गया।

बिहार क्रिकेट संघ नए संविधान को लागू नहीं कर पाया लेकिन सब आंखों पर पट्टी बांधे हुए हैं। मैं व्यक्तिगत तौर पर तीन-तीन बार इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश के सामने रख चुका हूं और अब फिर से वह समय आ रहा है कि मैं सीओए की कार्यप्रणाली को मुख्य न्यायधीश के सामने रखूंगा।

मैं सीओए से पूछना चाहूंगा कि बीसीसीआइ की चयन समिति में विवाद का मामला हो या फिर मैच कराने को लेकर राज्य संघों के इन्कार का मामला, फ्री पासों का मामला हो, या फिर हितों के टकराव का मामला हो या मयंक पारिख का मसला, इन सभी पर लोग जवाब चाहते हैं। 

रत्नाकर शेट्टी 67 साल के हुए तो उनसे इस्तीफा ले लिया गया लेकिन उन्हें उत्तराखंड और हैदराबाद की एडहॉक कमेटी में जगह दे दी गई। उन्हें प्रतिदिन के लिए 50000 रुपये तक दिए जा रहे हैं। सीओए जब शेट्टी की सेवाएं ले सकता है तो फिर पूर्व क्रिकेट प्रशासकों की सेवाएं लेने में क्या बुराई है।

सुप्रीम कोर्ट ने कार्यवाहक अध्यक्ष, कार्यवाहक सचिव और कोषाध्यक्ष को बहाल किया था लेकिन सीओए ने उनके अधिकार सीमित कर दिए। वहीं मयंक पारिख को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के नाम पर बताया जा रहा है। मुझे लगता है कि इन सब बातों को सुप्रीम कोर्ट के सामने रखने का समय आ गया है।

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Posted By: Lakshya Sharma