(गावस्कर का कॉलम)

कल्पना कीजिए, कोई टीम पहली पारी में 444 रन बनाती है और इसके बावजूद वह टेस्ट मैच हार जाती है। भारत ने ठीक ऐसा ही किया और इस हार के साथ ही उसने ऑस्ट्रेलिया में एक और व्हाइटवॉश के लिए दरवाजे खोल लिए। मैच पूर्व आक्रामक बातें व सकारात्मक रवैये की बातें समझ में आती हैं, लेकिन कार्रवाई वास्तव में तब शुरू होती है, जब मैच शुरू हो जाता है। भारत यह गर्व के साथ कह सकता है कि जब तक कोहली और मुरली क्रीज पर थे, उसने जीत की कोशिश की, लेकिन उनकी साझेदारी टूटने और रोहित व साहा के जल्दी आउट हो जाने के बावजूद मोर्चा खोले रखने की जरूरत नहीं थी। अब हकीकत यह है कि मैच गंवाने के बाद भारत एक बार फिर शून्य से शुरुआत करेगा और ऑस्ट्रेलियाई उनके लिए अब कुछ भी आसान नहीं रहने देंगे।

ब्रिस्बेन की पिच ऑस्ट्रेलिया की सबसे मुश्किल पिचों में से एक है। यहां न सिर्फ उछाल मिलती है, बल्कि गेंद देर से हवा में मूव भी करती है। यह तय है कि भारतीय बल्लेबाजों के लिए यह लड़ाई आसान नहीं होने वाली। निश्चित रूप से भारतीय गेंदबाज भी हालात का फायदा उठाते हुए मेजबान टीम के बल्लेबाजों को परेशान कर सकते हैं, लेकिन यह अब भारत के लिए एक कठिन संघर्ष होने जा रहा है।

मुरली विजय ने पहली पारी में अच्छी बल्लेबाजी की। दूसरी पारी में वह शतक से चूक गए, लेकिन जिस संयम और दृष्टिकोण के साथ उन्होंने बल्लेबाजी की, वह शिखर धवन को सीखने की जरूरत है। जब गेंद नई हो तो धवन को थोड़ी धैर्य रखने की जरूरत है। कूकाबुरा गेंद पुरानी हो जाने के बाद अन्य लाल गेंदों की तरह स्विंग नहीं करती है। जब गेंद की कठोरता और चमक चली जाती है तो बल्लेबाजी थोड़ी आसान हो जाती है।

दूसरी पारी में कोहली के लगाए शतक के लिए जितनी भी सराहना की जाए कम है। इसके साथ उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि कप्तानी से उनकी बल्लेबाजी प्रभावित नहीं होती है और यह भारत के दृष्टिकोण से बहुत अच्छी बात है। लियोन की भी यहां प्रशंसा करनी होगी, जिन्होंने ऑफ स्टंप और उसके बाहर एक ही लाइन पर लगातार गेंदबाजी करके बल्लेबाजों की कड़ी परीक्षा ली। मैच से पहले टीम में उनकी जगह पक्की नहीं थी, लेकिन ऑस्ट्रेलिया को यह जीत दिलाकर उन्होंने उसे पक्का कर लिया है। भारत अपनी हार के लिए केवल खुद को दोषी ठहरा सकता है।

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Posted By: sanjay savern

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