[गावस्कर का कॉलम]

चैंपियंस लीग में भारतीय क्लबों के खराब प्रदर्शन की चर्चाएं इन दिनों गर्म हैं। लोग आइपीएल टीमों की कई खामियां गिनाने में लग गए हैं। वे कह रहे हैं कि आइपीएल टीमों के खिलाड़ी साल में सिर्फ एक बार एक साथ होते है, इस कारण उनमें वैसी एकजुटता नहीं होती है, जैसी कि अन्य टीमों के खिलाडि़यों में। ये बातें हास्यास्पद हैं। यदि आप चैंपियंस लीग के पिछले तीन टूर्नामेंटों पर गौर करें तो पाएंगे कि पिछले दो खिताब आइपीएल की टीमों ने ही जीते हैं।

इसके अलावा यह भी कहा जा रहा है कि दक्षिण अफ्रीका की पिचों पर भारतीय टीमें असहज महसूस कर रही हैं। यहां वे यह भूल जा रहे हैं कि पिछली बार जब दक्षिण अफ्रीका में यह टूर्नामेंट खेला गया था तो चेन्नई सुपरकिंग्स की टीम चैंपियन बनी थी। ऐसे में अब लोगों को आइपीएल में खामी निकालना बंद कर देना चाहिए और इसके सकारात्मक पक्ष को देखना चाहिए।

दक्षिणी अफ्रीकी में बाहरी टीमें अभी इसलिए भी अच्छा नहीं कर पा रही हैं क्योंकि यह सत्र की शुरुआत है और विदेशी पिच पर तालमेल बैठाने में थोड़ा समय तो लगता ही है। इसके उलट घरेलू टीमें पिच और माहौल से अच्छी तरह से वाकिफ होती हैं। वैसे भी दुनियाभर की पिचों में सत्र की शुरुआत में अच्छी उछाल देखने को मिलती है।

अगला मैच दिल्ली डेयरडेविल्स और ऑकलैंड के बीच डरबन में होना है। डरबन की पिच जोहानिसबर्ग और केप टाउन से अलग है। डरबन का मौसम थोड़ा गर्म है, जिसकी वजह से यहां की पिचों से नमी जल्दी उड़ जाती है। टाइटंस के गेंदबाजों को जैसा टर्न मिल रहा था उसे देखकर दिल्ली के गेंदबाजों का मनोबल बढ़ा होगा। दिल्ली ने अपना पहला मैच जीता है। यह टीम हर तरह से संतुलित है। आइपीएल की अन्य टीमें यहां कुछ खास नहीं कर पा रही हैं, ऐसे में अब दिल्ली पर यह जिम्मेदारी आन पड़ी है कि वह अपने खेल से आलोचकों का मुंह बंद कर दे और वह कर दिखाए जो चेन्नई ने दो साल पहले किया था।

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