(गावस्कर का कॉलम) 

पांच मैचों की वनडे सीरीज में जो श्रीलंकाई टीम है, वह निश्चिततौर पर उस टेस्ट टीम से बिल्कुल अलग होगी, जिसे भारत ने बहुत ही आसानी से हराया था। पहली बात मैच सफेद गेंद से खेले जाएंगे, जो छह ओवर के बाद ही स्विंग होना बंद कर देती है। इसका मतलब यह हुआ कि गेंदबाज विकेट लेने के बजाय रन रोकने पर ज्यादा फोकस करेंगे। कप्तान भी विकेट या कैच के हिसाब से फील्डिंग लगाने के बजाय रन रोकने की कोशिश में होंगे। इसके अलावा सख्त नियमों के चलते बहुत ज्यादा बाउंसर भी नहीं देखने को मिलेंगी। अगर गेंद ज्यादा उछलती है, तो उसे वाइड करार दे दिया जाएगा। ये सभी बातें फील्डिंग टीम को टेस्ट मैच की तुलना में बिल्कुल अलग सोचने पर मजबूर करती हैं। बाउंड्री भी छोटी होंगी, यानी गलत शॉट भी आसानी से छक्का हो जाएगा। यह भी गेंद और बल्ले का मुकाबला है, लेकिन खिलाडिय़ों की मानसिकता पूरी तरह से अलग होगी। वनडे क्रिकेट में  बल्लेबाज तेज गेंदबाज पर स्टंप से हटकर खेलता है, तो कोई कुछ भी नहीं कहता, लेकिन अगर कोई बल्लेबाज टेस्ट में भी ऐसा करे, तो उस पर जिंदगी भर के लिए यह दाग लग जाएगा कि वह तेज गेंदबाजी खेलने से डरता है।

श्रीलंका भी इस बात से खुद में जोश भर सकता है कि आखिरी बार भारत के खिलाफ खेलते हुए उन्होंने 320 रन का विशाल लक्ष्य सिर्फ तीन विकेट  खोकर हासिल कर लिया था। भारत का गेंदबाजी आक्रमण टेस्ट सीरीज से बिल्कुल अलग है। हालांकि बुमराह अनुभवी हैं और उन पर भरोसा किया जा सकता है, लेकिन अन्य गेंदबाज नर्वस हो सकते हैं और उन पर रन बन सकते हैं। एक बार फिर दारोमदार बल्लेबाजों पर होगा। चयनकर्ताओं ने सूचना दी है कि राहुल चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करेंगे, इससे बल्लेबाजी क्रम तुरंत ही प्रतिबंधित हो जाता है, हां यह बात अलग है कि कप्तान खुद इसमें बदलाव का फैसला ले। उदाहरण के तौर पर अगर शीर्ष-तीन बल्लेबाज अच्छा खेल रहे हैं और सिर्फ आखिरी छह ओवर बचे हों, तो दूसरा विकेट गिरने पर कौन बल्लेबाजी करने आएगा राहुल या महेंद्र सिंह धौनी? यहां पर कोहली खुद फैसला लेंगे या फिर वह प्रमुख चयनकर्ता के फैसले से बंधे रहेंगे? खैर छोडि़ए, उम्मीद है कि इन मैचों में टेस्ट सीरीज की तुलना में ज्यादा प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी। शायद सीमित ओवरों के क्रिकेट में भारतीयों के सामने कुछ सवाल खड़े हों। 

 

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Posted By: Sanjay Savern

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