(शास्त्री का कॉलम)

स्पिनर्स विकेट लेने के बाद बहुत कम बार ही रोमांचित होते हैं। बाउंड्री पर लपके गए कैच या स्टंपिंग में उनको बहुत कम बार ही श्रेय दिया जाता है। यहां कहा जाता है कि बल्लेबाज गलती कर गया। उन्हें देखना दिलकश भी नहीं होता है। कुछ बेहद ही पतले होते हैं, कुछ मोटे होते हैं और कुछ को देखकर तो यही लगता है कि जल्द ही ये पेंशनर हो जाएंगे। ज्यादातर समय इनके चेहरों पर एक क्षमाप्रार्थी भाव नजर आता है। बार-बार कंधों को उचकाते हैं। ऐसा लगता है जैसे कोई कबूतर भेडिय़ों के बाड़े में उतर आया है।

लेकिन स्पिनरों की जरूरत हर किसी को होती है। हर टीम में एक या दो या कभी कभार तीन स्पिनर भी होते हैं। आइपीएल के इस सत्र की शुरुआत से पहले यह कहा जाता था कि सुनील नरेन कोलकाता नाइटराइडर्स टीम की आधी ताकत हैं। अपनी-अपनी टीमों में आर अश्विन और अमित मिश्रा का रुतबा भी कुछ ऐसा ही है। दिल्ली डेयरडेविल्स में इमरान ताहिर खास हैं। मुंबई की टीम भी हरभजन सिंह के बगैर अधूरी नजर आती है। प्रवीण तांबे और कर्ण शर्मा अभी तक सुर्खियां बटोरने में कामयाब नहीं रहे हैं, लेकिन जब भी अंतिम एकादश की बात आती है अपनी टीमों में उनका नाम सबसे पहले कागज पर लिखा जाता है।

स्पिनरों के वर्चस्व की एक मुख्य वजह हालात और टूर्नामेंट का समय है। बढ़ती गर्मी में भारतीय पिचों की पतली मिट्टी धूल में तब्दील हो जाती हैं। लगातार खेले जाने वाले मैच की वजह से पिच स्पिनरों की मददगार होती जाती है। सुरेश रैना और जेपी डुमिनी जैसे पार्ट टाइम स्पिनर भी सफल होने लगते हैं।

एक स्पिनर जिसने इस आइपीएल के दौरान खुद में सबसे ज्यादा सुधार किया है वह हैं इमरान ताहिर। ताहिर इस सत्र में काफी व्यस्त रहे हैं। वह बल्लेबाज को हवा में ज्यादा समय नहीं देते हैं और न ही गेंद की टर्न बल्लेबाज को मुफीद होती है। एक अन्य स्पिनर जिसने सभी का ध्यान अपनी तरफ खींचा वह हैं ब्रैड हॉग। आने वाले दिनों में स्पिनर और भी बेहतर होते जाएंगे। उनकी किफायती गेंदबाजी बल्लेबाजों को गलती करने पर मजबूर करेगी। आइपीएल का इतिहास गवाह रहा है कि सबसे ज्यादा सफल टीमों के पास सफल स्पिनर रहे हैं और यह चलन फिलहाल रुकने वाला नहीं।

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Posted By: sanjay savern

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