(गावस्कर का कॉलम)

टॉस हारने के साथ विराट कोहली की टेस्ट कप्तानी का आगाज हुआ। सिक्के की उछाल का सही अनुमान नहीं लगा पाने वाले वह न तो पहले कप्तान हैं और न ही आखिरी होंगे। दुर्भाग्य से उनके और भारत के लिए यह अच्छा नहीं कहा जा सकता। क्योंकि ऑस्ट्रेलिया को उस पिच पर पहले बल्लेबाजी का मौका मिल गया जो बिल्कुल ही सपाट थी। आसमान भी साफ था और मौसम भी गर्म, ऐसे में गेंद को मूव करने में न तो पिच से मदद मिली और न ही हवा से।

यह पिच किसी टी-20 मैच के पिच की तरह थी, जहां एक गुड लेंथ गेंद पर भी ड्राइव लगाया जा सकता था और ठीक ऐसा ही डेविड वार्नर ने किया। उन्होंने जल्द ही नई गेंद की चमक को खत्म कर दिया। दूसरी तरफ भारतीय गेंदबाज उन्हें राउंड द विकेट गेंदबाजी करते रहे। स्पष्ट रूप से गेंदबाजी रणनीति के तहत ऐसा किया जा रहा था। सामान्यत: गेंदबाज राउंड द विकेट गेंदबाजी नहीं करते हैं। ऐसा करने पर गेंदबाजों को अपनी थोड़ी सी गति का भी त्याग करना पड़ता है।

एडिलेड ओवल पर माइकल क्लार्क का औसत लगभग सौ के करीब है और वह तेजी से उसकी तरफ बढऩे भी लगे थे। दूसरे सत्र में ऑस्ट्रेलिया ने पूरी तरह से दबदबा बनाया। इस सत्र में वार्नर ने अपना शतक पूरा किया और क्लार्क ने तेजी से रन बटोरे। चाय से पहले जब क्लार्क पीठ की चोट के कारण रिटायर्ड हुए तो भारत को थोड़ी राहत मिली। केवल तीन तेज गेंदबाजों के साथ उतरा भारत बुरी तरह से थका हुआ नजर आ रहा था, लेकिन क्लार्क के मैदान से बाहर जाने पर गेंदबाजों की थोड़ी उम्मीद जगी।

कर्ण शर्मा अपने पदार्पण टेस्ट में प्रभावशाली नजर आए। लेकिन पहले विकेट के लिए उन्हें भी तीसरे सत्र तक इंतजार करना पड़ा। दूसरी नई गेंद आने के बाद ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों को थोड़ी दिक्कत महसूस हुई। मार्श, लियोन और हाडिन के विकेट भी गिरे, लेकिन तब तक ऑस्ट्रेलिया ने खुद को मजबूत स्थिति में पहुंचा लिया था। राहत की बात यह है कि पिच को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि भारतीय बल्लेबाजों को भी इस पर ज्यादा परेशानी नहीं होनी चाहिए।

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Posted By: sanjay savern

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