नई दिल्ली, जेएनएन। ICC World Cup 2019: साल 1983 के बाद 28 साल बाद 2011 में भारतीय टीम एक बार फिर विश्व क्रिकेट की बादशाह बनी। इस बादशाहत के 'युवराज' बने सिक्सर किंग युवराज सिंह। विश्व कप इस हीरो ने कैंसर से जूझते हुए, भारत की झोली में चैंपियनशीप डाल दी। पंजाब के लिए खेलने वाले इस खिलाड़ी के सितारे उसके बाद से ही गर्दिश में चल रहे हैं। न तो उनका बल्ला आइपीएल में चल रहा है और न ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में। आइए जानते हैं विश्व कप 2019 के इस हीरो की कहानी।

कुछ यूं शुरू हुआ क्रिकेट का सफर

युवराज सिंह का जन्म पंजाब में हुआ। वह शुरूआत में टेनिस और स्कैंटिंग के चैंपियन थे, लेकिन उनके पिता ने उनका रुख क्रिकेट की ओर मोड़ दिया। उन्होंने अपने कैरियर की युवराज की शुरुआत 1995-96 पंजाब की तरफ अंडर-16 क्रिकेट से की। घरेलू क्रिकेट में नाम तब मिला जब उन्होंने अंडर-19 में हिमाचल प्रदेश के खिलाफ 137 रन नॉट आउट बनाए। फर्स्ट क्लास क्रिकेट में उनकी शरुआत सही नहीं रही। साल 1997 में वह उड़ीसा के खिलाफ पहला फर्स्ट क्लास मैच खेले, लेकिन वह पहली गेंद पर बिना खाता खोले आउट हो गए। 2002 अंडर-19 विश्व कप में भी मोहम्मद कैफ की कप्तानी में युवराज सिंह बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया। इस टूर्नामेंट में भारत विजयी रहा था।

और फिर मिली नीली जर्सी

अंडर-19 विश्व कप प्रर्दशन को देखते हुए उन्हें 2000 में ICC KnockOut Trophy में पहली बार भारतीय टीम में मौका दिया गया। युवराज सिंह ने केन्या के खिलाफ अपना डेब्यू किया, लेकिन 16 रन ही बना सके। इसी टूर्नामेंट के क्वार्टरफाइनल में युवराज सिंह का असली रूप दिखा, जब उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 84 रन की पारी खेली। हालांकि, इसके बाद उन्होंने इतनी जबरदस्त पारी नहीं खेली, जिसके चलते उन्हें टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। 2002 के नेट वेस्ट ट्रॉफी में एक बार फिर से उनका जलावा देखने को मिला। इस सीरीज में युवराज और कैप के रूप में दो बेहतरीन खिलाड़ी भारतीय टीम को मिले।

2007 विश्व कप में उप कप्तानी

2007 आने तक युवराज सिंह खुद को बतौर ऑलराउंडर के रूप में स्थापित कर लिया था। युवराज को इस टूर्नामेंट में उपकप्तान भी बनाया गया। लेकिन, इस वर्ल्ड कप में ना तो कोई बल्लेबाज चला और ना ही कोई गेंदबाज। ऐसे में टीम इंडिया इस वर्ल्ड कप में केवल तीन ग्रुप मैच में से दो मैच हारकर वर्ल्ड कप से बाहर हो गई। लेकिन, इसी साल टी20 वर्ल्ड कप खेला गया, जिसमें युवराज सिंह सिक्सर किंग के रूप में बनकर उभरे। युवराज ने इंग्लैंड के स्टुअर्ट ब्रॉड के खिलाफ 6 गेंदों में 6 छक्के और 12 गेंदों में फिफ्टी ठोककर सनसनी मचा दी। इस टी20 वर्ल्ड कप में भारत को जीत मिली।

और फिर सपना हुआ साकार

2003 के वर्ल्ड कप के फाइनल में करारी हार और फिर साल 2007 में लीग मैच से ही बाहर हुई टीम इंडिया के पास 28 साल बाद इतिहास दोहराने का मौका था। वर्ल्ड कप का दसवां संस्करण एशिया में खेला गया। इस पूरे टूर्नामेंट में युवराज ने बल्ले और गेंद से प्रहार किया और वर्ल्ड कप 2011 भारत ने जीत लिया। लेकिन, इसी वर्ल्ड कप में युवराज सिंह कैंसर का शिकार हो गए। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ क्वार्टर फाइनल में उनके मुंह से खून तक निकल आया। लेकिन, युवराज ने इसकी भनक किसी को नहीं लगने दी। युवराज ने वर्ल्ड कप 2011 में बल्ले और गेंद से अच्छा प्रदर्शन करते हुए मैन ऑफ द टूर्नामेंट का खिताब जीतकर अपने सपने के साथ-साथ क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर के सपने को भी साकार करा दिया।

करीब दो दशक तक अंतरराष्ट्रीय स्तर की क्रिकेट से जुड़े रहे युवराज सिंह अब टीम इंडिया में मौके तलाशते-तलाशते थक चुके हैं। ऐसे में टीम इंडिया के लिए 400 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मैचों में 10 हजार से ज्यादा रन बनाने वाले युवराज सिंह संन्यास लेने पर मजूबर हैं। कहीं से एक उम्मीद ये भी नहीं है कि युवराज सिंह को आखिरी बार अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलते देखा जाए। यही वजह है कि युवराज अब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहकर दुनियाभर की टी20 लीग्स में हिस्सा लेना चाहते हैं। युवराज सिंह आखिरी बार साल 2017 में वेस्टइंडीज दौरे पर नज़र आए थे। कैंसर से लड़ाई लड़ चुके युवराज सिंह इस बीमारी से पीड़ित लोगों की मदद करते आ रहे हैं।

लोकसभा चुनाव और क्रिकेट से संबंधित अपडेट पाने के लिए डाउनलोड करें जागरण एप

Posted By: Vikash Gaur