सुनील गावस्कर का कालम 

जसप्रीत बुमराह का विश्व कप से बाहर होना भारतीय टीम के लिए काफी परेशान करने वाली बात होगी। भारतीय टीम में बुमराह के अलावा ऐसा कोई खिलाड़ी नहीं है, जिसकी अनुपस्थिति इतनी खलेगी। हमने दो मैचों में देखा कि वह कितने प्रभावशाली हैं और उनके टीम में होने से अन्य गेंदबाजों पर इसका कितना असर पड़ता है। क्या वह जल्द वापसी करेंगे यह तो उनकी चोट की स्थिति पर निर्भर है, लेकिन सच्चाई यह है कि विश्व कप को देखते हुए बुमराह की अनुपस्थिति भारत के लिए बड़ा झटका है।

दीपक चाहर और युवा अर्शदीप सिंह ने तिरुवनंतपुरम के वातावरण में जिस तरह की गेंदबाजी की, उससे यह आशा जगी है कि वे बुमराह की कमी कुछ हद तक खलने नहीं देंगे। रवींद्र जडेजा की अनुपस्थिति से अक्षर पटेल के लिए अवसर खुले और जिस तरह वह गेंदबाजी कर रहे हैं, उससे एक भरोसा मिला है कि अक्षर रन रोकने के साथ ही विकेट भी ले सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों से उन्होंने गेंदबाजी में विविधता लाई है। आइपीएल के अनुभव को वह आलराउंडर के तौर इस्तेमाल कर सकते हैं। वह ऐसे खिलाड़ी हैं जिन पर नजरें रहेंगी।

भारत को गेंदबाजी में अभी भी काम करने की जरूरत है और हमेशा की तरह टास की भूमिका अहम होगी। लक्ष्य का बचाव करने के बजाए लक्ष्य का पीछा करते हुए भारतीय टीम अलग होती है और इस स्थिति का निर्णय टास करता है। क्रिकेट की दुनिया, विशेषकर मीडिया गेंदबाज के छोर पर रन आउट को लेकर बहस कर रही है, जबकि उसी समय दलीप ट्राफी फाइनल में अजिंक्य रहाणे का रवैया दिल छू लेने वाला था। उन्होंने अपने साथी खिलाड़ी यशस्वी जायसवाल को बल्लेबाज की छींटाकशी करने के कारण मैदान से बाहर भेज दिया था। जायसवाल, जिन्होंने उस मैच में दोहरा शतक लगाया था, वह लगातार बल्लेबाज के कानों में कुछ कह रहे थे। हालांकि, उन्होंने क्या कहा इसकी जानकारी तो नहीं है, लेकिन यह देखने में सही नहीं लग रहा था।

बल्लेबाज इस बात का बुरा नहीं मानते कि गेंदबाज या फील्डिंग टीम का सदस्य उनके कौशल और क्षमता पर शक कर रहा है, लेकिन अगर बातें निजी और अभद्र होती हैं तो रहाणे जैसा निर्णय लेना जरूरी है, सिर्फ कप्तान के द्वारा ही नहीं, बल्कि अंपायर को भी ऐसा फैसला लेना चाहिए। टेनिस में ऐसी बातों पर प्वाइंट की पेनाल्टी के साथ ही जुर्माना लगाया जाता है और क्रिकेट में भी ऐसे नियम लाने की जरूरत है। राशि का जुर्माना मौजूदा समय में खिलाडि़यों पर बहुत कम या बिलकुल फर्क नहीं डालता। एक ही चीज काम कर सकती है वो यह कि पेनाल्टी ऐसी होनी चाहिए जो मैच के नतीजे पर असर डाले। नया नियम आया है, जहां टी-20 के मैच में अगर 20वां ओवर निर्धारित समय पर शुरू नहीं होता है तो फील्डिंग टीम को 30 मीटर के घेरे में एक और फील्डर तैनात करना होगा और इसके बाहर सिर्फ चार फील्डर ही रह पाएंगे।

यह अच्छा नियम है और ऐसे कुछ और नियम आने चाहिए जिससे मैच का नतीजा प्रभावित हो। सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक यह था कि रहाणे के जायसवाल को बाहर भेजे जाने के बाद एक स्थानापन्न खिलाड़ी को मैदान पर आने की मंजूरी दी गई। ऐसा नहीं होना चाहिए था, क्योंकि जायसवाल को चोटिल होने के कारण बाहर नहीं भेजा गया था। फुटबाल की तरह नियम होने चाहिए जहां लाल कार्ड दिखाने पर कोई सब्स्टीट्यूट खिलाड़ी को आने की इजाजत नहीं दी जाती और टीम को 10 खिलाड़ियों के साथ खेलना होता है। आश्चर्य होगा कि जो लोग क्रिकेट भावना को लेकर चिल्लाते रहते हैं वे सभी लोग इस बारे में क्या सोचते हैं। यह ऐसी चीज है जो 1970 के दशक से शुरू हुई और आइपीएल आते-आते अपने चरम पर पहुंच गई है। जाहिर है कि इनके पास बोलने के लिए कुछ नहीं है, क्योंकि ऐसा करने वाले ज्यादातर उनके देश के ही होते हैं। क्रिकेट की भावना इन लोगों के लिए चुनिंदा होती है। जब उन्हें सही लगता है तो ठीक है, लेकिन अगर ऐसा नहीं होता तो इसका उनके लिए मतलब नहीं रह जाता है। ऐसे लोग पाखंडी होते हैं और इनसे निपटने का एक ही तरीका है कि इन्हें अनदेखा किया जाए।

Edited By: Sanjay Savern

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