सुनील गावस्कर का कालम। क्रिकेट के ताबड़तोड़ फार्मेट में टकराने के बाद भारत और न्यूजीलैंड की टीमें अब खेल के मैराथन प्रारूप में एक-दूसरे का सामना करने उतरेंगी। अब इन दोनों टीमों में से कुछ स्प्रिंटर लंबी दूरी के धावकों के लिए रास्ता छोड़ देंगे। अगले कुछ वक्त तक इन्हें दूरी तय करने के लिए स्टेमिना की जरूरत होगी। टेस्ट क्रिकेट सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि ये खिलाड़ियों की तकनीकी रूप से तो परीक्षा लेता ही है, साथ ही उनके टेंपरामेंट का भी इम्तिहान लेता है। दिन के खेल का उतार-चढ़ाव तीनों सत्रों में देखा जा सकता है। इस दौरान बेहद एकाग्रता की जरूरत होती है। और मैच का नतीजा तय करने में इसकी भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं होती।

पिछले कुछ साल में हमने देखा है कि कानपुर की पिच बल्लेबाजों के लिए सपनों सरीखी रही है जहां गेंद नई हो या पुरानी, वो बहुत अच्छी तरह बल्ले पर आती है, वो भी बिना अधिक मूवमेंट के साथ। जो बल्लेबाज क्रीज पर वक्त बिताता है वो आराम से इन गेंदों पर रन बना सकता है। चेतेश्वर पुजारा और केन विलियमसन दो ऐसे खिलाड़ी हैं जो इस तरह की पिचों पर पांचों दिन बल्लेबाजी कर सकते हैं। हालांकि, मैं ये भी कहना चाहूंगा कि मैंने हालिया समय में पिच को देखा नहीं है, लेकिन मुझे इसमें बहुत बदलाव होने की उम्मीद नहीं दिखती। इस लिहाज से ये पिच वैसी ही रहनी चाहिए जैसी कि ग्रीनपार्क स्टेडियम की पिच आमतौर पर रहती है।

वर्कलोड है नया शब्द

इस खेल में एक नया शब्द आया है जिसे वर्कलोड कहते हैं। इसका ये मतलब हुआ कि दोनों टीमों में कई नियमित खिलाड़ी नजर नहीं आएंगे। इससे इस सीरीज से टेस्ट शब्द अलग हटता सा लगता है, लेकिन आधुनिक क्रिकेट में अब ऐसा है। मेरी पीढ़ी के लोगों के लिए ये देखना काफी हताशाभरा है कि आखिर कोई भी कैसे अपने देश के लिए खेलने के मौके से इन्कार कर सकता है, वो भी कथित वर्कलोड की वजह से। हालांकि, किसी खिलाड़ी का वर्कलोड मुद्दा किसी दूसरे खिलाड़ी के पास ये साबित करने का अवसर भी होता है कि वह देश के लिए खेलना डिजर्व करता है। इस मैच से हमें एक या दो उभरते सितारे भी मिल सकते हैं। भारत को उसकी जमीन पर हराना लगभग नामुमकिन होता है और ये वास्तविकता दो मैचों की इस टेस्ट सीरीज में भी बदलनी नहीं चाहिए।  

Edited By: Vikash Gaur