(गौतम गंभीर का कॉलम)

सबसे पहले तो पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली (Sourav Ganguly) का अगला बीसीसीआइ (BCCI) अध्यक्ष बनना भारतीय क्रिकेट के लिए बड़ी छलांग है। सामान्य तौर पर बीसीसीआइ का कार्य अब तक पीछे हटने वाला और अस्पष्ट रहा है, लेकिन एक पूर्व क्रिकेटर का इस अहम पद पर बैठना एक सुखद कदम है। मुझे नहीं पता कि कैसे यह हुआ और मैं यह जानने के लिए उत्सुक भी हूं। मुझे खुशी है कि भारतीय क्रिकेट का नेतृत्व वह इंसान करेगा जिसे क्रिकेट की अच्छी समझ है। जिस तरह के बदलाव उन्होंने बंगाल क्रिकेट संघ में किए यह साफ संकेत है कि दादा केवल पूर्व क्रिकेटर नहीं है जो मैदान पर बदलाव करते थे।

उनके प्रशासनिक कौशल का टेस्ट होगा लेकिन जहां तक मैं दादा को जानता हूं उनकी सम्मिलित विकास की क्षमता उन्हें अच्छी जगह पर बनाए रखेगी लेकिन मैं उम्मीद करता हूं कि दादा को इसके लिए 10 महीनों से ज्यादा का समय मिलना चाहिए, नहीं तो सारा परिश्रम बेकार जाएगा। मुझे उम्मीद है कि दादा को उनसे भी सहायता मिलेगी, जिन्होंने दादा को बधाई नहीं दी। एक क्रिकेटर के तौर पर, वह अच्छे परिणाम इसीलिए ला सके क्योंकि उन्हें ड्रेसिंग रूम और बीसीसीआइ से सहयोग मिला। दादा के लिए स्वर्गीय जगमोहन डालमिया का साथ मिले बिना काम करना चुनौतियों भरा हो सकता था। इसके बाद उन्होंने और कोच जॉन राइट ने सहवाग, नेहरा, युवराज हरभजन और जहीर जैसे खिलाडि़यों को तैयार किया, लेकिन दादा खुशकिस्मत थे कि उन्हें द्रविड़, कुंबले, तेंदुलकर और लक्ष्मण जैसे साथी मिले।

गौतम गंभीर (Gautam Gambhir) ने कहा कि अब दादा को इसी तरह के सहयोग की सहायता बीसीसीआइ के बड़े दिग्गजों से है। मुझ पर विश्वास करें, दुनिया अब भारतीय क्रिकेट पर पहले से ज्यादा नजर बनाए रहेगी। मैं दिग्गज क्रिकेटर ब्रायन लारा के भारतीय क्रिकेट पर किए गए कमेंट को पढ़कर काफी खुश हुआ। मैं इस बात का समर्थन करता हूं कि विश्व क्रिकेट मानकों पर खरा नहीं उतर रहा है, लेकिन यह विराट कोहली की समस्या नहीं है। अगर लारा आज कहते हैं कि हमारी गेंदबाजी उन्हें वेस्टइंडीज के पुराने दिनों की याद दिलाती है तो इसका श्रेय कप्तान और सहयोगी स्टाफ को ही जाता है।

तेज गेंदबाजी और भारतीय क्रिकेट दो अलग-अलग चीजें रही हैं, लेकिन अगर हम जसप्रीत बुमराह के बगैर यह टेस्ट सीरीज जीत जाते हैं तो मुझे लगता है कि हम सुधार कर रहे हैं। इस पर मैं और विस्तार से बात करूं, तो हमारे पास द्रविड़, गेंदबाजी कोच भरत अरुण, क्षेत्ररक्षण कोच आर. श्रीधर और पूर्व बल्लेबाजी कोच संजय बांगर जैसे लोग हैं। ये सभी सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताना पसंद नहीं करते हैं, लेकिन उन्होंने भारतीय क्रिकेट पर अपना मजबूत प्रभाव छोड़ा है। द्रविड़ आराम से किसी भी आइपीएल टीम के कोच या मेंटर बन सकते थे और बाकी के समय में कुछ अलग कर सकते थे, लेकिन उन्होंने जूनियर क्रिकेटरों के साथ काम करने का फैसला करके एक नजीर पेश की। ऐसे में यह उदाहरण है कि भारतीय सहयोगी स्टाफ क्रिकेट में क्या दे रहा है।

Posted By: Sanjay Savern

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