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'आदिवासी समाज का अलिखित संविधान त्वरित न्याय की मिसाल', बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार में बोलीं राष्ट्रपति मुर्मु

Published: Fri, 23 Oct 2026 09:40 PM (IST)

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार में आदिवासी समाज के अलिखित संविधान और त्वरित न्याय प्रणाली की ...और पढ़ें

राष्ट्रपति मुर्मु ने बस्तर दशहरा में आदिवासी न्याय प्रणाली को सराहा

राष्ट्रपति मुर्मु ने बस्तर दशहरा में आदिवासी न्याय प्रणाली को सराहा

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डिजिटल डेस्क, रायपुर। आदिवासी समाज का संविधान भले ही अलिखित है, लेकिन विवादों के निपटारे में उसकी व्यवस्था त्वरित न्याय की मिसाल है। शुक्रवार को बस्तर दशहरा की परंपरागत मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इस परंपरा को रेखांकित करते हुए आधुनिक न्याय व्यवस्था की चुनौती की ओर ध्यान खींचा।

उन्होंने कहा कि अदालतों में मुकदमों के फैसले आने में 10, 20 और 30 वर्ष तक लग जाते हैं, जबकि आदिवासी समाज में मांझी से परगना तक की पारंपरिक व्यवस्था के जरिए विवादों का समाधान गांव में ही हो जाता है।

उन्होंने इस सामाजिक व्यवस्था को आदिवासी समाज की विशिष्ट ताकत के रूप में प्रस्तुत किया।बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार में शामिल होने जगदलपुर पहुंचीं राष्ट्रपति ने सबसे पहले मां दंतेश्वरी मंदिर में दर्शन किए। इसके बाद सिरासार भवन में मुरिया दरबार पहुंचीं, जहां मांझी-चालकियों से उनका संवाद हुआ। पारंपरिक प्रतिनिधियों ने उन्हें मुरिया दरबार की ऐतिहासिक परंपरा, जनजातीय संस्कृति और वनांचल के जीवन के बारे में बताया।

राष्ट्रपति ने उनकी बातें सुनीं और इस व्यवस्था से अपने पारिवारिक जुड़ाव का उल्लेख करते हुए कहा, मैं भी मांझी की बेटी हूं। राष्ट्रपति ने कहा कि गांव में मांझी विवाद से जुड़े सभी पक्षों को सुनकर समाधान निकालने का प्रयास करते हैं। गांव में सहमति नहीं बनने पर मामला पीड़ परगना और फिर देश परगना तक पहुंचता है। बड़ी समस्याओं पर कई दिनों तक विचार-विमर्श होता है।

उन्होंने शिक्षा और विकास के साथ जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान बचाए रखने का भी आह्वान किया।

माओवादी हिंसा से मुक्त होकर प्रगति की ओर छत्तीसगढ़

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा से मुक्ति की दिशा में हो रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए सुरक्षा और विकास के क्षेत्र में आए सकारात्मक बदलावों की सराहना की। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार के समन्वित प्रयासों को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने आदिवासी समाज से अपने गांव, समाज और भविष्य के निर्णय स्वयं लेने का आह्वान करते हुए अशांति फैलाने वाली ताकतों का एकजुट होकर सामना करने की अपील की।