एक समय था, जब रायपुर के फॉरेसिंक साइंस लैब में सुविधाएं और संसाधन की भारी कमी थी। बिसरा, डीएनए, बैलेस्टिक और विस्फोट सामग्री आदि की जांच के लिए सागर, हैदराबाद समेत अन्य बड़े शहरों के फॉरेंसिक लैब का मुंह ताकना पड़ता था। कई महीनों तक जांच की रिपोर्ट नहीं मिलती थी। ऐसे में बड़े से लेकर छोटे प्रकरणों के मामले जांच रिपोर्ट के अभाव में लंबित पड़े रहते थे, लेकिन आज रायपुर के फॉरेंसिक लैब में वह सारी सुविधाएं, उपकरण उपलब्ध हैं। यह लैब पूरी तरह से वेल स्टेबलिस हो चुका है।

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यह कहना है लंबे समय तक रायपुर में सेवाएं देने वाले रिटायर्ड सीनियर फॉरेंसिक एक्सपर्ट (वरिष्ठ वैज्ञानिक) शिवजी सिंह का। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ सालों में फॉरेंसिक लैब में अत्याधुनिक सुविधाओं में इजाफा हुआ है। लैब में ढेरों जांच की सुविधाएं होने से अब दूसरे राज्यों के लैब की ओर दौड़ नहीं लगानी पड़ रही है।

जांच रिपोर्ट की मदद से कई ऐसे अनसुलझे मामलों में पुलिस को जांच की कड़ी मिल जाती है, जिसमें सामान्य जांच में पता करना बड़ा ही मुश्किल होता है। यहां पर डीएनए, लाईडिटेक्टर, विस्फोटक जांच, ड्राउनिंग टेस्ट, बिसरा समेत अन्य कई तरह की जांच होने से रिपोर्ट भी जल्द मिल जाती है। 

रायपुर के फॉरेंसिक लैब में प्रदेश भर से हजारों की तदाद में सैंपल आ रहे हैं। पुलिस और उसकी जांच व्यवस्था को मजबूत करने के लिए फॉरेंसिक जांच तकनीक को लगातार विकसित किया जा रहा है। फॉरेंसिक लैब को और ज्यादा प्रभावी बनाने शोध केंद्र बनाया गया है।

जब्त बारूद और जिलेटिन की जांच सुविधा
बारूद, जिलेटिन आदि की जांच रायपुर लैब में होने का फायदा माओवाद प्रभावित बस्तर और सरगुजा पुलिस को मिल रहा है। कुछ महीने पहले बस्तर में नक्सलियों को बारूद सप्लाई करने के आरोप में पकड़े गए ओडिशा के माइनिंग इंजीनियर समेत सात लोगों के कब्जे से जब्त बारूद व जिलेटिन की जांच यहीं की गई।

वैज्ञानिकों की कमी से जांच प्रभावित
फॉरेंसिक जांच धीमी गति से चलने के कारण लगातार आपराधिक प्रकरणों की जांच में देरी होती जा रही है। रायपुर के फॉरेंसिक लैब में वैज्ञानिकों की कमी के कारण जांच में देरी होती है। यहां हर साल दो हजार से ज्यादा मामलों की जांच की जा रही है। इसे ध्यान में रखकर 31 फॉरेंसिक वैज्ञानिकों की भर्ती की प्रक्रिया चल रही है। आने वाले दिनों में रायपुर समेत पूरे प्रदेश में फॉरेंसिक वैज्ञानिकों की कमी दूर हो जाएगी।

बिसरा की जांच एक से दो महीने में
बिसरा की जांच में एक से दो माह लग जाते हैं, जबकि विष संबंधी विज्ञान और रसायन विज्ञान के अंतर्गत आने वाले आधे मामलों की ही जांच हो पाती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने वालों तक पहुंचने में होने वाली देरी में फॅारेंसिक जांच की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।

फॉरेंसिक लैब में परीक्षण की जो सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, उन्हें रविवि विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला से पूरा किया जा सकता है। इसके साथ ही विश्वविद्यालय में होने वाली सेमिनार, कार्यशाला और कॉन्फ्रेंस का भी अधिकारियों को लाभ मिलेगा।

64 महिला अधिकारियों की जरूरत
रायपुर जिले में 32 पुलिस थाने हैं। वर्तमान में गिने-चुने थाने में ही महिला विवेचना अधिकारी है यानी महिला एएसआई की कमी लंबे समय से बनी हुई है। शहर के सात सीएसपी डिवीजन में केवल एक-एक महिला विवेचना अधिकारी हैं, जबकि दुष्कर्म के मामलों की विवेचना के लिए हर थाने में कम से कम दो-दो महिला अधिकारी की जरूरत है। ज्यादा से ज्यादा महिला अधिकारियों की थानों में पदस्थापना होने से महिला संबंधी अपराधों की विवेचना में तेजी आएगी।

वर्तमान में राज्य विज्ञान प्रयोगशाला में हर तरह की जांच की सुविधाएं होने के बाद भी महिला अधिकारियों की कमी के कारण जांच में देरी हो रही है। रीजनल सेंटरों को भी संसाधनों से लैस करना होगा। अभी दूसरे जिलों के सेंटर रायपुर लैब के भरोसे काम कर रहे हैं। इसके अलावा सीन ऑफ क्राइम की यूनिट बढ़ाने के साथ उन्हें वाहन उपलब्ध कराना पड़ेगा।

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By Nandlal Sharma