शिक्षा... पाठ्यक्रम पूरा करवाने वाली शिक्षा... छात्रों को पास करवाने वाली शिक्षा... सिर्फ किताबी ज्ञान देने वाली शिक्षा...। इनमें से छात्रों के बौद्धिक, नैतिक विकास के लिए कोई भी सही नहीं है। जरूरी है ऐसी शिक्षा, जिससे एक बच्चा न सिर्फ अच्छा छात्र बने, बल्कि उसके अंदर नैतिकता का विकास हो, वह समाज और देश के लिए जवाबदेह बने।

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 इसके लिए जरूरत है शिक्षा की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने की, जिसकी नींव घर से ही पड़नी चाहिए। माता-पिता को बच्चों के प्रति जवाबदेह बनना होगा, फिर स्कूलों में शिक्षकों को। इसके लिए माता-पिता के साथ-साथ शिक्षकों की काउंसिलिंग की जरूरत है। उन्हें यह समझाने की कि वे देश को जिम्मेदार युवा दे रहे हैं।

सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों की भांति अपने सिस्टम में बदलाव लाने की जरूरत है। हालांकि कुछ ऐसे प्रयोगधर्मी सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी हैं, जिनके किए गए प्रयोगों को निजी स्कूलों ने अपने यहां लागू किया। सरकार को चाहिए कि वह गणित, अंग्रेजी पर विशेष ध्यान दे। इसके लिए विशेषज्ञ शिक्षकों की नियुक्ति की जाए। बेरोजगार इंजीनियर्स को गणित पढ़ाने के लिए नियुक्त किया जाए, इससे गणित का भूत भाग सकता है। अब वक्त आ गया है कि अभिभावक, शिक्षकों को खुद को बदलना होगा। नवाचार (इनोवेशन) पर ही शिक्षा की गाड़ी दौड़ानी होगी।

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जिला शिक्षा अधिकारी एएन बंजारे से शिक्षाविद् जवाहर सूरीसेट्टी के सवाल
सवाल- सीएसआर फंड का इस्तेमाल सिर्फ स्कूली भवन बनाने, रंगरोगन में होता है। शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता या आप कोई काम कर रहे हैं?
जवाब- दिशाएं कार्यक्रम के जरिए स्कूली छात्रों को जिले में संचालित 13 राष्ट्रीय संस्थानों के भ्रमण का प्लान है। अभी तक 15 हजार छात्रों को भ्रमण करवाया जा चुका है। इसका मकसद छात्रों को इन संस्थानों के बारे में जानकारी दिलवाना, प्रवेश कैसे होता है, यह समझाना, ताकि उनके अंदर भी इन राष्ट्रीय संस्थानों में प्रवेश की इच्छा पैदा हो। सीएसआर फंड के जरिए स्कूलों में कलाम लाइब्रेरी की स्थापना करवाई जा रही है, जिसके जरिए 50 हजार रुपये तक की किताबें खरीदने का अधिकार प्राचार्य को दिया गया है।

सवाल- आपको नहीं लगता कि जो सिलेबस (पाठ्यक्रम) आज पढ़ाया जा रहा है, उसका जीवन में कहीं इस्तेमाल भी है?
जवाब- हर पांच-सात साल में हमारे मूल्यों में परिवर्तन होता है, नए-नए शोध और देश-दुनिया में बदलाव होते हैं। मुझे लगता है कि इन्हीं आधारों पर सिलेबस में भी बदलाव होना चाहिए। नौवीं के छात्रों को जॉब ओरिएंटेड बनाने के लिए बैंकिंग सेक्टर, एग्रीकल्चर क्षेत्रों के बारे में जानकारी मुहैया करवाई जा रही है।

परिवार की बढ़ती दूरी को कम करने की दरकार
एक समय था, जब पिता अपने बच्चों को बुलाते थे और बच्चा बिना सवाल किए उनके पास पहुंच जाता था, लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं, बच्चे को यदि माता-पिता पुकारकर बुलाते हैं तो सबसे पहले वह क्यों और क्या का प्रश्न उठाता है। एक तरह से उनमें जिज्ञासा की क्षमता बढ़ गई है। यदि माता-पिता बच्चों को क्वालिटी टाइम दें तो शिक्षा के स्तर में काफी परिवर्तन आ जाएगा।

ये ऐसा दौर है, जब बच्चों को माता-पिता को देखकर बच्चा झूठ सीख रहा है। इस तरह की छोटी-छोटी बातें ही विकराल रूप ले रही हैं। माता-पिता बच्चों को समय तो दे रहे हैं, लेकिन घूमने ले जाने, फिल्म देखने, लेकिन उनसे कम्यूनिकेशन नहीं कर रहे हैं। ये आज शिक्षा-व्यवस्था की कमी का सबसे बड़ा कारण बन गया है। वहीं दूसरा कारण देखें तो बच्चे स्वयं देर रात तक जाग रहे हैं। इसका सर्वाधिक प्रभाव उनके मानसिक स्थिति और शारीरिक क्षमता पर पड़ रहा है। दोनों वजहों को घर के स्वस्थ वातावरण से बड़ी आसानी से दूर किया जा सकता है।
- जवाहर सूरी सेट्टी, शिक्षाविद्

शिक्षक, बालक, पालक... तीन ध्रुव
कोई संदेह नहीं है कि आरटीई से छात्रों को लाभ हुआ है। मैं मानता हूं कि शिक्षक, बालक, पालक तीन ध्रुव होते हैं, जब ये एक साथ हाथ पकड़कर आगे बढ़ेंगे, तभी इन्हें सफलता मिलेगी। इसी दिशा में काम भी किया जा रहा है। शिक्षा की गुणवत्ता और मूलभूत सुविधाओं में लगातार इजाफा हो रहा है। मुझे पालक फोन करके कहते हैं- साहब... आज शिक्षक नहीं आए, बच्चे कम आए। शिक्षकों का काम परिणामदायक होना चाहिए। शिक्षक जो पढ़ा रहे हैं, बच्चों में उसका असर दिखना चाहिए। दूसरी बात यह कि शिक्षक जवाबदेह बनें। तीसरा शिक्षकों की काउंसिलिंग होनी चाहिए। मैं यह भी स्वीकार करता हूं कि विभाग सब कुछ कर पाए, इस भरोसे पर भी नहीं बैठना चाहिए। अकेले रायपुर जिले में ऐसे कई शिक्षक उदाहरण हैं, जिन्होंने सरकारी फंड का इंतजार नहीं किया, अपने वेतन से स्कूल में बदलाव किया। इन्हें देखकर दूसरों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए।
- एएन बंजारा, जिला शिक्षा अधिकारी, रायपुर

शिक्षा के साथ नैतिकता का भी पाठ पढ़ाएं
सरकारी स्कूलों की किताबें निसंदेह निजी स्कूलों की तुलना में प्रतिस्पर्धी नहीं हैं, उनमें गुणवत्ता भी नहीं है, इसलिए संपन्न परिवार वाले अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं भेजना चाहते। गणित, अंग्रेजी कमजोर है। शिक्षा को डिग्री के तौर पर न देखें। आज छात्रों में देश-समाज-परिवार के प्रति मोरल (नैतिकता) दिखाई नहीं देती। अब सवाल यह है कि यह कहां से आएगी? पहले पालक को इसके प्रति जागरूक होना होगा। मोरल एजुकेशन की शुरुआत घर से ही होनी चाहिए, इसके बाद स्कूलों में। आज हमें ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता नहीं है, जो सिर्फ पढ़ाएं, बल्कि ऐसे शिक्षक चाहिए, जो बच्चों का नैतिक विकास करें।
- सरिता अग्रवाल, समाजसेवी

ट्रांसफर ऑफ एजुकेशन वाले शिक्षक ही चाहिए
मेरा मानना है कि आज शिक्षक की भूमिका बदल गई है। वह ट्रांसफर ऑफ इंफॉर्मेशन हो गया है। हमें ऐसे शिक्षकों की दरकार नहीं है। ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ एजुकेशन वाले शिक्षक चाहिए। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि आज शिक्षक, शिक्षा या पढ़ाने के प्रति जुनून के साथ नहीं आते, बल्कि इसे सिर्फ रोजगार समझते हैं। ऐसे में संभव ही नहीं है कि हम क्वालिटी ऑफ एजुकेशन दे पाएं। आज देखिए कि प्रैक्टिकल एजुकेशन तो न के बराबर है। विदेशों में प्रैक्टिकल पर जोर दिया जाता है, वे जो पढ़ रहे हैं, उसके साथ जीते हैं। अगर विभाग यह समझता है कि यह मुश्किल है तो जरा भी नहीं, सिर्फ आपको कुछ बदलाव करने की जरूरत है, खुद ब खुद परिणाम दिखाई देने लगेंगे।
- अजीत वरवंडकर, एजुकेशनल काउंसलर

गणित और अंग्रेजी पर ध्यान देने की जरूरत
सबसे बड़ा प्रश्न है कि साल दर साल पांचवीं के बच्चे में गुणवत्ता का सुधार नहीं हो रहा है। इसमें दिक्कतें कहां आ रही हैं, जब इस पर मैंने ध्यान दिया तो देखा कि दो ऐसे विषय गणित और अंग्रेजी हैं, जिनमें सर्वाधिक छात्र फेल हो रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है कि दोनों ही विषयों में प्रायोगिक प्रयोग नहीं हो रहे हैं। यदि गणित विषय पर मजबूती देनी है तो तीन बिंदुओं पर फोकस करना होगा-
पहला- गणित का भय छात्रों से दूर करें।
दूसरा- शिक्षक फार्मूला तैयार कर प्रश्नों को हल करवाएं।
तीसरा- लगातार अभ्यास का प्रशिक्षण दें।

अंग्रेजी में चुनौतियां
70 से 75 प्रतिशत छात्र अंग्रेजी में फेल हो जाते हैं, इसकी सबसे बड़ी खामी ये है कि अंग्रेजी के शिक्षकों की कमी। किसी स्कूल में हिंदी का शिक्षक अंग्रेजी पढ़ा रहा है, तो कहीं गणित के। इन चुनौतियों को पार करने के लिए आउटसोर्सिंग की नहीं बल्कि स्थानीय युवाओं को रोजगार देने की जरूरत है। सबसे अच्छा विकल्प हैं, इंजीनियरिंग के डिग्रीधारी छात्र, जो बेरोजगार हैं। इन्हें यदि शिक्षा से जोड़ा जाए तो गणित और अंग्रेजी दोनों विषयों को बेहतर हो जाएंगे।
- बीकेएस रे, रिटायर्ड आइएएस एवं पूर्व सचिव माध्यमिक शिक्षा मंडल

शिक्षा व्यवस्था बेहतर, लेकिन सेतु के निर्माण में कमी
प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था दो हिस्सों में बंट गई है। एक तो ट्राइबल एरिया तो दूसरी शहरी। दोनों में फर्क इतना है कि जो छात्रों के भविष्य के निर्माण के लिए शिक्षकनुमा सेतु तैयार किया गया है, उसमें कहीं न कहीं कमी है। उस सेतु का संचार यदि बेहतर तरीके से किया जाए तो शिक्षा व्यवस्था अपनी बुलंदियों पर होगी। इसमें दो पहलू हैं- एक तो शिक्षक के प्रशिक्षण की व्यवस्था, दूसरी पाठ्यक्रम को छात्रों को पढ़ाने का तरीका। जब रायपुर जैसी जगहों पर बीएड-डीएड कॉलेज केवल औपचारिता पर टिके हुए हैं तो फिर बस्तर जैसे सुदूर इलाके में इन शिक्षकों से बेहतर शिक्षा की उम्मीद नहीं की जा सकती। कॉलेजों की संख्या पर्याप्त है, बस वहां जो प्रशिक्षण दिया जा रहा है, उसे बेहतर तरीके से दिया जाए और जो शिक्षक प्रशिक्षण ले रहे हैं, वे ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाएं।
- वर्णिका शर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर, साइंस कॉलेज, रायपुर

शिक्षक अपनी जिम्मेदारियों को समझें, प्राथमिक स्कूल हो बेहतर
शिक्षक अपनी जिम्मेदारियों को समझें, केवल खानापूर्ति न हो। बच्चे की सबसे पहली नींव परिवार के बाद प्राथमिक स्कूल में होती है। यदि वहां उसे बेहतर शिक्षा और नवाचार नहीं मिला तो वह पूरे जीवन पढ़ाई से जुड़ नहीं पाएगा। केवल खानापूर्ति और पास होने के लिए शिक्षा ग्रहण करेगा। परिणाम ये आएगा कि वह शिक्षा के मौलिक महत्व को समझ ही नहीं पाएगा। उसके जीवन में केवल शिक्षा विषय बन कर रह जाएगी। इन्हीं कारणों से प्राथमिक स्कूलों की शिक्षा को दुरुस्त करने की सबसे ज्यादा जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ी का बेहतर विकास हो सके। शिक्षा की गुणवत्ता पर सदैव प्रश्न लगते रहे हैं और लगते रहेंगे, लेकिन शिक्षक केवल खानापूर्ति कर प्रशिक्षण लेकर बैठ जाते हैं। ये ठीक नहीं। भविष्य में इससे बेहतर परिणाम लाने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

- नकुलराम वर्मा, शिक्षक, शासकीय उच्चतर माध्यमिक स्कूल, मोवा, रायपुर

आरटीसी में आए ये सुझाव-
- जिन स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, वहां जिम्मेदार नागरिक सप्ताह में एक दिन ही पढ़ाने के लिए समय दें, तो काफी है।
- पालक संघ जिम्मेदारी ले कि वह पालकों को शिक्षा के प्रति जागरुक करेंगे। इससे पढ़ाई की निगरानी होगी, शिक्षक नियंत्रण में रहेंगे।
- सरकार कलाम लाइब्रेरी बना ही रही है। इसमें पालकों और बच्चों को अपनी अनुपयोगी किताबें दान करने के लिए प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है।

कंपनियों के सीएसआर फंड का ऐसा हो इस्तेमाल
- सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी कमजोर है। बच्चों को सिखाने के लिए अंग्रेजी किट दिए जा सकते हैं। इससे बच्चे खेल- खेल में अंग्रेजी सीखेंगे।
- मानदेय देने से स्कूलों में शिक्षकों की कमी काफी हद तक दूर की जा सकती है। कम से कम एक साल के लिए एक शिक्षक दे तो भी राहत मिलेगी।
- शिक्षकों को जागरूक बनाने के लिए वर्कशॉप। मौलिकता का पाठ बच्चों को कैसे पढ़ाया जाए, इसका प्रशिक्षण।

सरकार चाहे तो ये करे
- इंजीनियरों को शिक्षक के रूप में खड़ा किया जा सकता है। साइंस और गणित के अच्छे शिक्षक साबित हो सकते हैं, जिसकी इस वक्त कमी है।
- आदिवासी इलाकों में भी स्तरीय बीएड कॉलेज खोले जाएं। वहां केवल डिग्री देने के लिए नहीं, शिक्षकों को बुनियादी चीजों का प्रशिक्षण दिया जाए।
- मोबाइल स्कूल चलाया जा सकता है। बड़े वाहन पर चलने वाला यह स्कूल बच्चों को पढ़ाई के प्रति आकर्षित करेगा और विषय विशेषज्ञों की कमी दूर करेगा।
- हर सरकारी स्कूल में हर माह पैरेंट्स-टीचर मीटिंग अनिवार्य हो। इसकी रिपोर्ट तैयार की जाए। इससे पालक जागरूक होंगे और उन्हें बच्चे की कमी की जानकारी मिल सकेगी।

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By Nandlal Sharma