मैं बीच में अमेरिका गया था। वहां बिना प्रिस्क्रिप्शन के आपको एक टेबलेट तक नहीं मिलेगी, लेकिन यहां किराना दुकान से आप दवा ले लीजिए। आखिर ऐसा क्यों? कहीं तो हमारे सिस्टम में खामी है। जो एजेंसियां हैं वे या तो निगरानी नहीं रख पा रही हैं या फिर कार्रवाई में चूक हो रही है। देखिए, हमें स्टैंडर्ड सिस्टम खड़ा करना होगा और उसका पालन करवाना होगा। अच्छी-अच्छी दवा दुकानों में फॉर्मासिस्ट नहीं हैं।

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ऐसे में हम कैसे यह भरोसा करें कि जो दवा दी जा रही है, वह सही ही है। दवाओं की गुणवत्ता पर भी ध्यान देने की जरूरत है। यहां तो डॉक्टर तक को पता नहीं है कि दवा मानकों पर है या नहीं, मरीज की बात तो छोड़ ही दीजिए।

जरूरत नहीं है नए कॉलेज खोलने की
आज फोकस हॉस्पिटल, बिल्डिंग पर है न कि डॉक्टर और गुणवत्ता युक्त इलाज पर। नए मेडिकल कॉलेज खोलने की जरूरत नहीं है, लेकिन पहले पुराने कॉलेजों को ही मानकों पर खरा उतारें। अस्पतालों में डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ पर्याप्त संख्या में हों। कोशिश यह हो कि मरीज को अस्पताल से बिन इलाज लौटना न पड़े। जानकारी तो यह है कि टेक्नीशियन जांच कर रिपोर्ट दे रहे हैं, डॉक्टर की सिर्फ सील-मुहर लगी होती है। 

 

जन-जन को जागरूक करना होगा, कैसे?
आज सड़क हादसा होता है, सिर में चोट लगती है और हम सीधे अस्पताल भागते हैं, लेकिन हेड इंजरी न हो कभी इसके लिए सोचा है। पुलिस ने डर बैठाया कि हेलमेट लगाओ... नहीं लगाओगे तो चालान कट जाएगा। लोगों को यह तो समझाना होगा कि हेलमेट क्यों जरूरी है? विदेशों में रात हो या दिन ग्रीन सिग्नल पर ही गाड़ियां क्रास होती हैं, हमारे यहां रेड पर ही। सबकुछ जन-जागरूकता से आएगा, बिल्कुल आएगा लेकिन प्रयास करने होंगे।

डॉक्टर से लेकर वार्ड ब्वॉय तकः सबकी ट्रेनिंग जरूरी
मैं उदाहरण इसलिए दे रहा हूं क्योंकि ये सब बातें सीधे स्वास्थ्य से जुड़ी हुई हैं। सिस्टम को अपडेट करते रहना चाहिए, वरना जंग लग जाती है। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां अपडेशन की दरकार नहीं है। स्वास्थ्य में डॉक्टर से लेकर वार्ड ब्वॉय तक को समय-समय पर ट्रेनिंग करवाकर अपडेट करना चाहिए। स्पेशल कोर्स करवाना चाहिए, नई तकनीक के बारे में बताना चाहिए, इससे सिस्टम में जंग नहीं लगेगी।

अस्पतालों में हो रेलवे की तरह टोकन व्यवस्था
जहां तक कि अस्पतालों के ओपीडी काउंटर में लंबी लाइन का सवाल है तो मेरा मानना है कि यहां भी रेलवे आरक्षण केंद्र जैसी ही टोकन व्यवस्था हो सकती है, बसरते अस्पताल की क्षमता के अनुसार ही मरीज वहां पहुंचें। अभी आंबेडकर अस्पताल की ही बात लें, तो वहां कतार लगती है। जितनी क्षमता है उससे अधिक ओपीडी पर दबाव है और बेड से अधिक मरीजों को भर्ती करना मजबूरी है।"

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- पद्मश्री डॉ. एटी दाबके

 (वरिष्ठ शिशुरोग विशेषज्ञ और सेवानिवृत्त कुलपति, पं. दीनदयाल उपाध्याय आयुर्विज्ञान एवं आयुष विश्वविद्यालय)

By Krishan Kumar