नेत्रदान: भ्रांतियों को दूर करने की आवश्यकता, सही जानकारी मिले तो कार्निया की बीमारी से जूझ रहे मरीजों को मिल सकती है रोशनी
रायपुर के आंबेडकर अस्पताल की डा. निधि पांडेय नेत्रदान से जुड़ी भ्रांतियों को दूर कर जागरूकता फैला रही हैं। उन्होंने ...और पढ़ें

नेत्र रोग विभाग की प्रमुख डा. निधि पांडेय।
HighLights
डा. निधि पांडेय नेत्रदान जागरूकता अभियान चला रही हैं।
उम्र, चश्मा, मधुमेह नेत्रदान में बाधा नहीं बनते।
केवल कार्निया दान होता है, चेहरा विकृत नहीं होता।
अखिल शर्मा, रायपुर। रायपुर के आंबेडकर अस्पताल की ओपीडी में रोजाना आंखों की जांच कराने वाले मरीजों के बीच डा. निधि पांडेय नेत्र रोग विभाग की प्रमुख के रूप में नेत्रदान के प्रति जागरूकता फैलाने का कार्य कर रही हैं।
वे उन भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास कर रही हैं, जो नेत्रदान में बाधा बनती हैं। जैसे कि उम्र अधिक होने, चश्मा लगाने, मोतियाबिंद या मधुमेह होने पर नेत्रदान संभव नहीं है, जैसी गलत धारणाएं आज भी प्रचलित हैं। डा. पांडेय का मानना है कि नेत्रदान के प्रति डर से ज्यादा जानकारी का अभाव और परिवार की हिचकिचाहट बड़ी बाधा है।
उन्होंने बताया कि अधिक उम्र में भी नेत्रदान किया जा सकता है, हालांकि बहुत अधिक उम्र में कार्निया की गुणवत्ता कम होने की संभावना रहती है। चश्मा, मोतियाबिंद, मधुमेह या उच्च रक्तचाप होने से नेत्रदान अपने आप खारिज नहीं होता। यदि कार्निया स्वस्थ है, तो दान संभव है।
डा. पांडेय ने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्यतः नेत्र बैंक की टीम केवल कार्निया निकालती है, जिससे चेहरे का स्वरूप खराब नहीं होता। मृत्यु के बाद जितनी जल्दी संभव हो, नेत्र बैंक को सूचना देनी चाहिए।
सामान्यतः छह घंटे के भीतर प्रक्रिया पूरी होने पर कार्निया की गुणवत्ता बनी रहती है। दान की गई आंखों का उपयोग नेत्र प्रत्यारोपण में किया जाता है, जिसमें आंख की पारदर्शी परत यानी कार्निया को बदला जाता है। कार्निया संबंधी बीमारी और आंख के अन्य हिस्सों के स्वस्थ होने पर दृष्टि में सुधार संभव है। हालांकि, एचआइवी, सक्रिय वायरल हेपेटाइटिस, कुछ प्रकार के एन्सेफलाइटिस, रैबीज की आशंका, सक्रिय सेप्टीसीमिया और अज्ञात कारणों से हुई मृत्यु जैसी परिस्थितियों में कार्निया प्रत्यारोपण नहीं किया जा सकता।
डा. पांडेय ने परिवारों को सलाह दी कि व्यक्ति को अपने जीवनकाल में ही नेत्रदान की इच्छा बतानी चाहिए, क्योंकि मृत्यु के बाद परिवार की सहमति आवश्यक होती है।
सवाल : क्या अधिक उम्र, चश्मा या बीमारी नेत्रदान में बाधा है?
जवाब : अधिक उम्र में भी नेत्रदान किया जा सकता है। हालांकि बहुत अधिक उम्र में कार्निया की गुणवत्ता कम होने की संभावना रहती है। चश्मा लगने, मोतियाबिंद, मधुमेह या उच्च रक्तचाप होने से नेत्रदान अपने आप खारिज नहीं होता। यदि कार्निया स्वस्थ है तो दान संभव है। नेत्रदान की उपयोगिता का अंतिम निर्णय चिकित्सकीय जांच के बाद होता है।
सवाल : क्या नेत्रदान में पूरी आंख निकाल ली जाती है और इससे चेहरा खराब हो जाता है?
जवाब : सामान्यतः नेत्र बैंक की टीम केवल कार्निया निकालकर उसे सुरक्षित माध्यम में रखती है। कुछ परिस्थितियों में पूरी आंख निकालकर बाद में नेत्र बैंक में कार्नियल बटन तैयार किया जाता है। इससे चेहरे का स्वरूप खराब नहीं होता और अंतिम संस्कार की परंपराएं सामान्य रूप से पूरी की जा सकती हैं।
सवाल : मृत्यु के बाद कितनी जल्दी नेत्र बैंक को सूचना देनी चाहिए?
जवाब : मृत्यु के बाद जितनी जल्दी संभव हो नेत्र बैंक को सूचना देनी चाहिए। सामान्यतः छह घंटे के भीतर प्रक्रिया पूरी हो जाए तो कार्निया की गुणवत्ता बनी रहने की संभावना रहती है।
सवाल : दान की गई आंखों का उपयोग किसके लिए होता है?
जवाब : नेत्र प्रत्यारोपण में आंख की पारदर्शी परत यानी कार्निया को बदला जाता है। कार्निया संबंधी बीमारी और आंख के अन्य हिस्सों के स्वस्थ होने पर प्रत्यारोपण के बाद दृष्टि में सुधार संभव है। सफलता कई चिकित्सकीय कारणों पर निर्भर करती है।
सवाल : किन मामलों में नेत्रदान नहीं किया जा सकता?
जवाब : एचआइवी, सक्रिय वायरल हेपेटाइटिस, कुछ प्रकार के एन्सेफलाइटिस, रेबीज की आशंका, सक्रिय सेप्टीसीमिया और अज्ञात कारणों से हुई मृत्यु जैसी परिस्थितियों में कार्निया प्रत्यारोपण नहीं किया जा सकता। कैंसर के मामले में उसके प्रकार और फैलाव के आधार पर नेत्र बैंक निर्णय लेता है।
सवाल : परिवार को क्या सावधानी रखनी चाहिए?
जवाब : व्यक्ति को जीवनकाल में ही परिवार को अपनी नेत्रदान की इच्छा बता देनी चाहिए। मृत्यु के बाद परिवार की सहमति जरूरी होती है। इसलिए नजदीकी नेत्र बैंक का नंबर परिवार के पास होना भी उपयोगी है। डा. पांडेय के अनुसार नेत्रदान को लेकर प्रचलित भ्रांतियों को दूर करना जरूरी है, क्योंकि सही जानकारी मिलने पर कई परिवार इस निर्णय के लिए आगे आ सकते हैं।
