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छत्तीसगढ़: गोद में नौ महीने की बेटी, कंधे पर बच्चों का भविष्य और सामने उफनती नदी

Published: Sun, 20 Sep 2026 08:54 PM (IST)

बलरामपुर जिले के धौरपुर गांव में दो शिक्षिकाएं, कर्मिला टोप्पो और संध्या हालदार, अपनी जान जोखिम में डालकर उफनती नदी पार कर बच्चों को पढ़ाने जाती हैं।

कंधे पर बच्चों का भविष्य और सामने उफनती नदी।

कंधे पर बच्चों का भविष्य और सामने उफनती नदी।

HighLights

  1. शिक्षिकाएं उफनती नदी पार कर प्रतिदिन स्कूल पहुंचती हैं।

  2. नौ माह की बेटी के साथ भी कर्मिला का समर्पण।

  3. कलेक्टर ने शिक्षकों के जज्बे की सराहना की।

डिजिटल डेस्क, रायपुर। गोद में कपड़े से बंधी नौ माह की बेटी, दूसरे हाथ में छाता, कंधे पर बैग और सामने उफनती नदी, लेकिन शिक्षिका कर्मिला टोप्पो के सामने हर मुश्किल हार मान लेती है।

कर्मिला टोप्पो और उनकी साथी शिक्षिका संध्या हालदार अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार करती हैं और बच्चों को पढ़ाने के लिए विद्यालय पहुंचती हैं। दोनों शिक्षिकाएं छत्तीसगढ़ में बलरामपुर जिले के सुदूर ग्राम धौरपुर के प्राथमिक शाला में पदस्थ हैं।

जंगलों के बीच बसे इस गांव में 15 से 20 घर हैं। यहां तक पहुंचने के लिए बरसात में मोरन और इरिया नदी के संगम को पार करना पड़ता है।

शासन ने वर्ष 2005 में यहां प्राथमिक शाला शुरू की थी। इस स्कूल में फिलहाल नौ बच्चे हैं और उन्हें पढ़ाने के लिए दो महिला शिक्षिकाएं कर्मिला टोप्पो और संध्या हालदार पदस्थ हैं। कर्मिला कुछ महीने पहले ही मां बनी हैं और उनकी बेटी नौ महीने की है, लेकिन अध्यापन को लेकर उनका समर्पण बेमिसाल है। कर्मिला के पति भी शिक्षक हैं।

दीदी कल आओगी न?

शिक्षिकाओं ने बताया कि वे घर से निकलती तो स्कूटी से हैं, लेकिन उसे मढ़ना गांव में ही खड़ा करना पड़ता है। उसके बाद दोनों लगभग तीन किलोमीटर का पथरीला रास्ता पैदल तय करती हैं, फिर नदी पार करती हैं, इसके बाद विद्यालय पहुंचती हैं। कर्मिला कहती हैं कि डर तो लगता है, पानी का बहाव होता है, गोद में बच्ची भी रहती है।

कर्मिला टोप्पो वर्ष 2014 से इसी स्कूल में पदस्थ हैं, जबकि संध्या हालदार की पदस्थापना उनके बाद हुई है। उनका कहना है कि बच्चों का यह पूछना कि दीदी कल आओगी न?, उन्हें हर हाल में स्कूल खींच लाता है। दोनों के इस जज्बे की सराहना कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी ने भी की है।

उन्होंने कहा कि वे ऐसे शिक्षकों का बहुत सम्मान करती हैं, जो अपने कर्तव्यों के प्रति इतने समर्पित हैं, ऐसे शिक्षक सचमुच दुर्लभ हैं। हालांकि, उन्होंने समस्या के समाधान का कोई आश्वासन नहीं दिया। यह व्यवस्था पर बड़ा सवाल भी है। इतने सालों में ग्रामीणों की मांग के बावजूद अब तक धौरपुर तक एक पुलिया या पहुंच मार्ग क्यों नहीं बन पाया?