बिलासपुर (निप्र)। ममता, पविता और राधिका तीन ऐसी लड़कियां हैं जो पिछड़े हुए गांव में रहते हुए आर्थिक तंगी के बावजूद 12 वीं की परीक्षा पास की। इसके बाद कुछ करने की चाह में एक एनजीओ की ओर से चलाए जा रहे स्किल ट्रेनिंग से जुड़कर कम्प्यूटर एप्लीकेशन का प्रशिक्षण लिया। वर्तमान में इसी के बल पर वे नौकरी करते हुए अपने सफल जीवन की शुरुआत कर चुकी हैं। उनका यह सिलसिला यही नहीं थमा, आज वे नौकरी के साथ ही गांव में प्रशिक्षण शिविर चलाते हुए अन्य बालिकाओं को प्रशिक्षित कर रोजगार के लिए प्रेरित कर रही हैं।

बिलासपुर से लगभग 22 किलोमीटर दूर रतनपुर में एक पिछड़ा गांव पौंसरा है। यहां की आबादी 2 हजार है। पिछड़ा गांव होने के कारण लगभग 90 प्रतिशत ग्रामीण गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं। ग्रामीणों का मुख्य धंधा खेती-किसानी है, लेकिन जमीन नहीं होने के कारण दूसरे गांव के खेतों में जाकर मजदूरी करते हुए जैसे-तैसे अपना जीवन यापन कर रहे हैं। आर्थिक तंगी ने गांव के बच्चों की पढ़ाई लिखाई दूर कर दी है।

पढ़ने-खेलने की उम्र में जीवन यापन के लिए रोजी-मजूरी करने के लिए बच्चों को मजबूर होना पड़ रहा है। इस तरह की परिस्थिति होने के कारण ही यहां के बच्चें आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। लेकिन इन्हीं के बीच से गांव की तीन बेटी ऐसे पैदा हुई जिन्होंने अपने जीवन स्तर को सुधारने का खुद ही बीड़ा उठाया है। गांव की ममता भार्गव, पविता बिजोर और राधिका यादव बचपन से ही अपने घर की गरीबी दूर करनी की ठान चुकी थीं।

स्कूली पढ़ाई करने के लिए पैसे नहीं होने के बाद भी इन्होंने खेतों में काम करते हुए मिलने वाले पैसे से 12 वीं तक की पढ़ाई की। लेकिन इसके बाद उनके सामने एक नई समस्या आई की आगे की पढ़ाई कैसे करें, यदि किसी तरह कॉलेज में दाखिला लेते हैं तो घर की माली हालत और भी बिगड़ जाएगी और यदि पढ़ाई नहीं करते हैं तो हम आगे नहीं बढ़ पाएंगी। इसी मशक्कत के बीच एनजीओ आरोह फाउंडेशन का साथ मिला।

फाउंडेशन गांव के बच्चों का स्तर सुधारने के लिए स्किल ट्रेनिंग के तहत सभी को कम्प्यूट एप्लीकेशन का प्रशिक्षण देना चाहता था। लेकिन इस प्रशिक्षण शिविर को चालू करने में भी दिक्कतें पेश आ रही थी, क्योंकि कोई भी प्रशिक्षण शिविर से नहीं जुड़ना चाहता था, यदि इससे जुड़ते तो मजदूरी छूट जाती और जीवन-यापन में दिक्कत आती। इसके बाद भी ममता, पविता और राधिका को यह समझ आ गया कि यदि प्रशिक्षण के लिए लोग नहीं मिले तो यह प्रशिक्षण गांव में नहीं हो पाएगा।

इसके बाद इन तीनों बेटियों ने मिलकर अपने गांव समेत आसपास के गांव में जाकर सरपंच से मिलकर प्रशिक्षण के लिए बच्चों को राजी करवाने की बात रखते हुए प्रशिक्षण के फायदे के बारे में बताया। तीनों की बातों से प्रभावित होकर आसपास के गांवों के सरपंचों ने अपने-अपने गांव के बच्चों को प्रशिक्षण के लिए राजी किया। तब जाकर दिसंबर 2015 में पौंसरा के सामुदायिक भवन में 2 माह का कम्प्यूटर एप्लीकेशन का प्रशिक्षण चालू किया गया। तीनों में सीखने की ललक ने कंप्यूटर की पढ़ाई में उन्हें पारंगत कर दिया।

प्रशिक्षण के बीच में ग्रामीण प्रतिभाओं की परखने सेंट्रल कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट रायपुर की टीम पौंसरा पहुंची। यहां बच्चों की सीखने की ललक को देखते हुए कॉलेज की टीम ने कैंपस सलेक्शन कराने का मन बनाया।

कैंपस सलेक्शन में ममता, पविता और राधिका ने सारे सवालों का जवाब सही देते हुए नौकरी के लिए सलेक्ट हुई। आज ये तीनों लड़कियां कॉलेज की टेलीकॉलर के रूप में कार्य करते हुए अपनी घर की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में लगी हुई है। तीन की ट्रेनिंग अवधि के बाद इनके वेतन में बढ़ोतरी की जाएगी। एक तरह इन तीनों लड़कियों सुविधाओं के अभाव के बीच में अपने आप को साबित करते हुए एक नई मिसाल पेश करते हुए नारी शक्ति का परिचय दिया।

22 को दे रही ट्रेनिंग

ममता, पविता व राधिका की खास बात यह है कि वे अपनी तकदीर बदलने के साथ ही पूरे गांव की तकदीर बदलना चाहती है, ताकि गांव का विकास हो सके। इसी के चलते बिलासपुर में टेलीकॉलर की नौकरी करने के साथ-साथ ही गांव के 22 लड़कियों को फाउंडेशन के साथ मिलकर प्रशिक्षित कर रही हैं। इसका सकारात्मक परिणाम आने वाले दिनों में अवश्य मिलेगा।

हौसले है बुलंद

आरोह फाउंडेशन की अध्यक्ष नीलम गुप्ता ने बताया कि हमारा उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं का जीवन स्तर ऊपर करने का है। हमारी लिस्ट में पौंसरा गांव का नाम आया। हमें बताया गया कि गांव की स्थिति अधिक खराब है। लोग आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। इसके बाद हमने इस गांव में काम करना चाहा। अगर ममता, पविता और राधिक नहीं होती तो हमारा काम पूरा नहीं हो सकता था। तीनों लड़कियों ने बुलंद हौसले का परिचय देते हुए अपने सफल जीवन की शुरुआत की है।

घर की जिम्मेदारी संभालने के साथ पढ़ाई

तीनों के जीवन में इतना संघर्ष रहा है कि बीच-बीच में इनके घर में अन्न का एक दाना भी नहीं रहता था। तब इन्हें घर के लिए भी खेतों में काम करना पड़ता था। दिनभर मेहनत करने के बाद शाम को इनके घर में चूल्हा जलता था। पिता रोजी-रोटी के चक्कर में कई-कई दिनों तक घर से बाहर रहते थे। ऐसे में मां व घर के सदस्यों की जिम्मेदारी इनके ऊपर आ जाती थी।

विरोध का सामना

तीनों को गांव वालों के विरोध का भी सामना करना पड़ा। शिक्षित नहीं होने की वजह से गांव के कुछ लोग प्रशिक्षण की उपयोगिता को नहीं समझ पा रहे थे। इसके चक्कर में कई बच्चियां प्रशिक्षण लेने से वंचित भी हो गई। इस दौरान ममता, पविता और राधिका का भी विरोध होता रहा है। गांव की जीवन शैली बिगाड़ने का काम किया जा रहा है, लेकिन अब स्थिति उलट गई है। गांव में तीनों का सम्मान हो रहा है। रोजगार व शिक्षा की अलख जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

ये भी पढ़ेंः कलेक्टर के हस्तक्षेप के बाद अस्पताल ने सौंपा खिलाड़ी का शव

Posted By: anand raj