नई दिल्ली (बिजनेस डेस्क)। नियमित बचत की आदत एक पुरानी बात है। हममे से अधिकांश ने अपने माता-पिता से यह बात जरूर सुनी होगी। बचत उस वक्त अधिक दिलचस्प हो सकती है जब आप किसी ऐसे सुरक्षित निवेश विकल्प में एक आनुपातिक राशि का निवेश तेजी से साप्ताहिक या मासिक या तिमाही आधार पर करने के लिए तैयार हों, जो कि बेहतर रिर्टन देने में सक्षम हो।

बैंक का रेकरिंग डिपॉजिट (आरडी) और म्युचुअल फंड का सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (सिप) ऐसे ही दो बेहतर निवेश विकल्प हैं, जो कि उन लोगों के लिए बेहतर हैं जो कि जोखिम लेने की क्षमता रखते हैं। बैंक रेकरिंग डिपॉजिट (आरडी) और म्युचुअल फंड एसआईपी में अलग-अलग विशेषताएं और शर्तें होती हैं जो लोगों की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा कर सकती हैं। इन दो निवेश विकल्पों में से किसी एक का चुनाव करना आपकी रिटर्न उम्मीदों, जोखिम उठाने की क्षमताओं, निकासी विकल्पों, टैक्स और निवेश उद्देश्यों के आधार पर तय होता है जो कि लंबी अवधि और छोटी अवधि के लिए होते हैं।

बैंक आरडी और म्युचुअल फंड सिप: 5 अहम बातें जो आपतो जाननी चाहिए-

रिटर्न: बैंक के रेकरिंग डिपॉजिट पर मिलने वाला रिटर्न बैंक की ओर से तय किया जाता है औरं बैंकों के पास इसे बदलने का विवेकाधिकार होता है। जबकि दूसरी तरफ म्युचुअल फंड के सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (सिप) पर मिलने वाला रिटर्न फिक्स्ड नहीं होता है और यह स्कीम के आधार पर अलग अलग होता है। साथ ही इस पर मार्केट का भी असर होता है। बैंक आरडी पर मिलने वाला रिटर्न 6 से 8 फीसद के आसपास होता है, जबकि इक्विटी म्युचुअल फंड स्कीम पर मिलने वाला रिटर्न बीते तीन वर्षों के रिकॉर्ड के मुताबिक 11 से 12 फीसद के आसपास रहा है।

जोखिम: बैंक के रेकरिंग डिपॉजिट (आरडी) पर किए जाने वाले निवेश को रिस्क फ्री माना जाता है। आरडी को वाणिज्यिक बैंकों की ओर से खोला जाता है लेकिन इसका नियमन रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) की ओर से किया जाता है। जबकि म्युचुअल फंड सिप में जोखिम स्कीम के आधार पर अलग अलग होता है। यह एसेट्स के आधार पर अलग अलग होता है जैसे कि लार्ज कैप स्टॉक, स्मॉल कैप स्टॉक्स, बॉण्ड, सरकारी प्रतिभूतियां इत्यादि। म्युचुअल फंड सिप के मुकाबले बैंक आरडी में किया जाने वाला निवेश कम जोखिम वाला होता है।

निकासी: बैंक आरडी में मैच्योरिटी पूर्व निकासी पर पेनाल्टी लागू होती है। जबकि म्युचुअल फंड सिप में कोई भी निवेशक किसी भी वक्त अपनी स्कीम को बंद करवाकर पैसा निकाल सकता है। यानी इसमें बिना कोई अतिरिक्त शुल्क दिए मैच्योरिटी पूर्व निकासी की सुविधा मिलती है।

टैक्स: बैंक के रेकरिंग डिपॉजिट और म्युचुअल फंड सिप से हासिल हुए ब्याज पर टैक्स देना होता है। इसमें इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम अपवाद है। कोई भी निवेशक आयकर की धारा 80C के अंतर्गत ईएलएसएस सिप में किए गए निवेश पर एक वित्त वर्ष के भीतर 1.5 लाख रुपये तक का टैक्स डिडक्शन क्लेम कर सकता है। हालांकि इसमें लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन 1 लाख से ज्यादा होने पर इस पर 10 फीसद टैक्स देना होता है।

निवेश का उद्देश्य: बैंक का रेकरिंग डिपॉजिट उन लोगों के लिए बेहतर माना जाता है जो कि छोटी अवधि के लिए निवेश करते हैं, जबकि म्युचुअल फंड सिप लंबी अवधि के निवेश के लिए बेहतर माना जाता है।

Posted By: Praveen Dwivedi