नई दिल्ली (बिजनेस डेस्क)। ईरान पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों का असर सामने आने लगा है। अमेरिकी प्रतिबंध और दबाव की वजह से भारत ने जहां ईरान से खरीदे जाने वाले तेल की मात्रा को कम करना शुरू कर दिया है, जिसका फायदा अमेरिका को हुआ है।

जून महीने में भारत ने अमेरिका से रिकॉर्ड मात्रा में कच्चे तेल की खरीदारी की। आंकड़ों के मुताबिक इस साल अमेरिका से खरीदा गया कच्चा तेल, पिछले साल के मुकाबले दोगुना है। ट्रंप प्रशासन के लिए ईरान पर लगाया गया प्रतिबंध अमेरिका के लिए फायदे का सौदा साबित हो रहा है।

गौरतलब है कि अमेरिकी प्रशासन अपने सहयोगी देशों को ईरानी सामानों का आयात कम कर नवंबर तक उसे शून्य पर लाने के लिए दबाव बना रहा है। ऐसे में भारत की तरफ से रणनीति में किया गया बदलाव अमेरिका को उसके राजनीतिक मकसद को पूरा करने में मदद दे रहा है।

सरकारी आंक़ड़ों के मुताबिक अमेरिका भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा सप्लायर बन चुका है, जिसने अप्रैल में कुल 17.6 लाख बैरल प्रति दिन कच्चे की आपूर्ति की।

इतना ही नहीं अमेरिकी कंपनियां जुलाई तक भारत को 1.5 करोड़ बैरल से अधिक कच्चे तेल की सप्लाई करेंगी। यह इस लिहाज से अहम है क्योंकि पिछले साल अमेरिका ने भारत को कुल 80 लाख बैरल कच्चे तेल का निर्यात किया था। अमेरिकी दबाव में भारत की तरफ से ईरान से होने वाली कच्चे तेल की खरीदारी को लगातार कम किए जाने का असर भारत-ईरान संबंधों पर भी दिखने लगा है।

 

ईरान ने चेताया

न्यूज एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के मुताबिक ईरान के वरिष्ठ राजनयिक ने भारत को चेताते हुए कहा है कि अगर ईरान के कच्चे तेल को भारत सऊदी अरब, रूस और अमेरिका से होने वाली सप्लाई से रिप्लेस करने की कोशिश करता है तो उसे ''विशेष सुविधाओं'' से हाथ धोना पड़ सकता है।

मंगलवार को दिल्ली में आयोजित ऑल इंडिया माइनॉरिटीज के एक कार्यक्रम में ईरान के उप-राजदूत ने कहा, 'इससे पहले 2012 और 2015 के अमेरिकी प्रतिबंध के दौरान ईरान ने भारत को तेल की आपूर्ति करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।'

गौरतलब है कि पिछले महीने भारत के तेल मंत्रालय ने रिफाइनरी कंपनियों को ईरान से होने वाले तेल के आयात को सीमित किए जाने की दिशा में तैयार रहने को कहा था।

 

ईरान के साथ न्यूक्लियर संधि को तोड़े जाने के बाद अमेरिका ने उस पर नये सिरे से प्रतिबंधों की घोषणा की है। इस संधि के मुताबिक ईरान प्रतिबंधों में कटौती की शर्त के साथ परमाणु हथियार से जुड़ी गतिविधियों को कम करने का वादा किया था। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने इस संधि को अमेरिका के लिए नुकसानदेह बताते हुए इसका विरोध किया था। ट्रंप ने कहा कि वह सत्ता में आने के बाद इस संधि को खत्म कर सकते हैं।

By Surbhi Jain