नई दिल्ली (बिजनेस डेस्क)। कुछ महीनों पहले जब कच्चे तेल की कीमतें 76 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई तब यह अनुमान जाहिर किया जाने लगा था कि जल्द ही यह आंकड़ा 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर सकता है। हालांकि ऐसा कुछ हुआ नहीं और उल्टे तेल 50 डॉलर प्रति बैरल के आस-पास आ गया।

तेल की कीमतों में गिरावट से जहां उत्पादक देश सऊदी अरब और रूस को झटका लगेगा वहीं भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है, जो कच्चे तेल के बड़े आयातकों में शुमार है। 

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड इस सप्ताह 11 फीसदी से ज्यादा की गिरावट के साथ 60 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे लुढ़क गया। वहीं, अमेरिकी लाइट क्रूड वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) का भाव बीते एक सप्ताह में करीब 10.70 फीसदी फिसल कर 50 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया।

कच्चे तेल की वैश्विक आपूर्ति बढ़ने और मांग घटने से पिछले सात सप्ताह से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में नरमी बनी हुई है। तीन अक्टूबर के बाद ब्रेंट क्रूड के दाम में 30 फीसदी से अधिक और डब्ल्यूटीआई के भाव में करीब 33 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।

कच्चे तेल के दाम में आई हालिया गिरावट के बाद इस बात की संभावना बढ़ गई है कि आगामी छह दिसंबर को वियना में ऑगेर्नाइजेजन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपार्टिग कंट्रीज (ओपेक) की बैठक में तेल की आपूर्ति में कटौती पर जोर डाला जाएगा, जिसके बारे में प्रमुख तेल उत्पादक देश सऊदी अरब पिछले दिनों कई बार दोहरा चुका है।

 

कच्चे तेल की कीमतों में आ रही गिरावट की वजह से पिछले छह दिनों से देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें में नरमी आई है और माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इसमें और भी गिरावट आएगी। ऐसे में हमारे लिए यह जानना जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की गिरावट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा और उसके हमारे लिए क्या मायने मतलब होंगे।

महंगाई पर असर कच्चे तेल की कीमत में कमी आने से महंगाई में कमी आएगी और इसकी वजह से देश के केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों में इजाफा नहीं करना होगा।

आरबीआई ने महंगाई को 4 फीसदी रखने का लक्ष्य तय किया है, लेकिन इस साल महंगाई बैंक के लक्ष्य से ऊपर रही है। तेल की कीमतों में कमी की वजह से महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी और उसे ब्याज दरों में इजाफा नहीं करना होगा।

इस साल रिजर्व बैंक दो बार से रेपो रेट में बढ़ोतरी कर चुका है। फिलहाल 0.5 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ रेपो रेट 6.5 फीसदी पहुंच चुका है।

इस दर पर शीर्ष बैंक अन्य बैंकों को लोने देता है। पिछली समीक्षा बैठक के बाद गवर्नर उर्जित पटेल ने कहा था कि मार्च, 2019 की तिमाही तक खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर 4.5 फीसद पर पहुंच जाएगी। ऐसे में तेल की कीमत से बैंक को ब्याज दरों के निर्धारण में खासी मशक्कत नहीं करनी होगी।

उभरती अर्थव्यवस्था पर असर न्यूज एजेंसी ब्लूमबर्ग के डेटा के मुताबिक प्रति बैरल तेल की कीमत में 10 डॉलर की कमी आने से जीडीपी के मुकाबले आय में 0.5 से 0.7 फीसद तक का उछाल आता है। वहीं तेल उत्पादक देशों के लिहाज से देखा जाए तो वहां की अर्थव्यवस्था में 3-5 फीसद की कमजोरी आती है। 

भारत समेत अन्य उभरती अर्थव्यवस्था अपनी ऊर्जा सुरक्षा को पूरा करने के लिए पूरी तरह से तेल के आयात पर निर्भर है। तेल की कीमत में होने वाली गिरावट से वहां के आर्थिक विकास को गति मिलेगी।

काबू में रहेगा चालू खाता घाटा कच्चे तेल की कीमतों में नरमी के चलते चालू वित्त वर्ष में चालू खाता घाटा जीडीपी के अनुपात में 2.6 फीसद रह सकता है। इसके पहले इसके 2.8 फीसद रहने का अनुमान लगाया गया था।

एसबीआई की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, 2018-19 की पहली छमाही में राजकोषीय घाटा पूरे साल के बजट अनुमान के 95.3 फीसद पर पहुंच गया है। छह माह की अवधि में सरकार की कुल प्राप्तियां 7.09 लाख करोड़ रुपये यानी बजट अनुमान का 39 फीसद तथा कुल खर्च 13.04 लाख करोड़ रुपये यानी बजट अनुमान का 53.4 फीसद रहीं।

एसबीआई की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, 'कच्चे तेल की कीमतों में हो रही हालिया गिरावट से चालू खाते के घाटे में हमारे अनुमान 78 अरब डॉलर से करीब 5- 6 अरब डॉलर की कमी आने की उम्मीद है। इससे चालू खाते का घाटा गिरकर जीडीपी के 2.6 फीसद के आसपास रह सकता है।'

 

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Posted By: Abhishek Parashar