गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। बीमारी का मतलब है आमदनी का नुकसान, जीवन शैली में बदलाव व कभी-कभी स्थायी तौर पर विकलांगता या अपंगता। आमतौर पर ऐसी बीमारियों में होने वाला वित्तीय नुकसान इतना अधिक होता है कि साधारण हेल्थ प्लान उसकी भरपाई नहीं कर पाते। इस दिक्कत से निपटने के लिए जरूरी है कि अब क्रिटिकल इलनेस इंश्योरेंस प्लान लिया जाए।

ये प्लान न केवल भारी भरकम चिकित्सा खर्चों को वहन करने में मददगार होते हैं, बल्कि इनमें अस्पताल में भर्ती होने के अन्य खर्चों से निपटने के लिए एकमुश्त रकम भी मिलती है। ये आपको किसी भी वित्तीय आपात स्थिति से दूर रखते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, भारत में हर साल करीब दस लाख कैंसर के मामले रिपोर्ट होते हैं। संगठन का मानना है कि साल 2015 खत्म होते-होते सात लाख मरीज कैंसर के चलते मृत्यु के शिकार हो जाते हैं। चिकित्सा की लागत भी बढ़ती जा रही है। इन हालात में क्रिटिकल हेल्थ इंश्योरेंस किसी के लिए भी स्वाभाविक पसंद हो सकती है।

साधारण हेल्थ इंश्योरेंस प्लान में अस्पताल के खर्चों को पूरा किया जा सकता है और कुछ बीमा स्कीमों में सिर्फ अस्पताल के बुनियादी खर्चों को पूरा करने की ही व्यवस्था होती है, जबकि दूसरी तरफ क्रिटिकल इंश्योरेंस प्लान बीमारी के इलाज में होने वाले खर्च के अलावा गंभीर बीमारी के साथ जुड़ी किसी स्थिति में एकमुश्त राशि की व्यवस्था होती है। गंभीर बीमारियों का असर इलाज के बाद तक होता है, जो कभी कभी पूरी जिंदगी का रहन सहन बदल देता है। इसलिए क्रिटिकल हेल्थ इंश्योरेंस प्लान ऐसे परिवार के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं, जहां आय का एकमात्र स्नोत परिवार का मुखिया होता है और दुर्भाग्यवश वही किसी गंभीर बीमारी का शिकार बन जाता है। इस तरह की पॉलिसियों को लेने से पहले खास सावधानी बरतने की जरूरत होती है।

आमतौर पर किसी भी क्रिटिकल इंश्योरेंस पॉलिसी में कुछ तय बीमारी होती है, जिसे कवर किया जाता है। कुछ प्लान में जिस बीमारी को कवर नहीं किया जाता उनका भी उल्लेख होता है। पॉलिसी लेने से पहले सूची को भली-भांति जांच लेना चाहिए। ऐसी पॉलिसी में वेटिंग पीरियड होता है। आमतौर पर क्रिटिकल हेल्थ इंश्योरेंस प्लान में 90 दिन का वेटिंग पीरियड होता है। यानी प्लान लेने के 90 दिन के भीतर आपको क्लेम नहीं मिलता।

इसी तरह यदि प्लान लेने वाले व्यक्ति की गंभीर बीमारी की पहचान होने के तीस दिन के भीतर मृत्यु हो जाए तो भी क्लेम नहीं मिलता। आमतौर क्रिटिकल हेल्थ इंश्योरेंस में दो विकल्प उपलब्ध होते हैं। पहला किसी पॉलिसी के साथ राइडर या ऐड ऑन की व्यवस्था व दूसरा स्टैंडअलोन पॉलिसी। स्टैंडअलोन पॉलिसी लेनी हो तो ज्यादा बीमा कवर रखना चाहिए। क्रिटिकल हेल्थ इंश्योरेंस प्लान लेते वक्त हमेशा अपने बारे में सही जानकारी बीमा कंपनी को उपलब्ध कराएं। यदि क्लेम लेते वक्त ऐसी कोई भी चूक सामने आती है तो बीमा कंपनी उसे चुनौती देकर आपका क्लेम रद कर सकती है।
भास्कर ज्योति शर्मा
एमडी व सीईओ
एसबीआइ जनरल इंश्योरेंस

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