फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स को गलत तरीके से बेचने के मुद्दे की समीक्षा के लिए गठित सरकारी समिति ने पिछले हफ्ते अपनी रिपोर्ट सौंप दी। समिति ने 16 व्यापक सिफारिशें कीं। इनमें कुल 100 विशेष बिंदु हैं। ये सभी सिफारिशें तर्कपूर्ण व सुविचारित हैं। इनसे इन उत्पादों की बिक्री पर लगाम लग सकती है। वास्तव में अगर ये सभी सिफारिशें लागू कर दी जाती हैं तो प्रभाव और व्यापक होगा। भारत का बीमा कारोबार अभी जिस रूप में है, वह बंद हो जाएगा। इसे खुद को पुन: नए तरीके से खड़ा करना होगा। यह अतिशयोक्ति नहीं है। वास्तव में ऐसा ही होगा। वाकई यह बहुत अच्छा होगा। समिति ने जो सिफारिशें की हैं, उनमें जिसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ेगा, वह मिश्रित बीमा व निवेश से जुड़ी है। इस सिफारिश से यूलिप व परंपरागत उत्पादों में पारदर्शिता व निष्पक्षता आएगी।

संभावित ग्राहक स्पष्ट रूप से यह देख सकेंगे कि बीमा वाले हिस्से की कितनी लागत आ रही है और निवेश की कितनी। वे निवेश के ट्रैक रिकॉर्ड का भी इस ढंग से मूल्यांकन कर सकेंगे, जो आसानी से समझ आ सकेगा। विभिन्न उत्पाद व प्रोडक्ट कैटेगरी के बीच तुलना भी हो सकेगी। वे यह देख सकेंगे कि उनका कितना पैसा कमीशन के तौर पर जा रहा है। वे इस संबंध में दूसरे निवेश के विकल्पों से तुलना भी कर सकेंगे। साथ ही, निवेश व बीमा वाले हिस्सों के लिए कमीशन आौर रिपोर्टिंग का ढांचा भी अलग-अलग होगा।

रिपोर्ट में जो बात नहीं कही गई है वह यह कि अगर संभावित ग्राहकों को वास्तव में यह सब जानकारी मिल जाए और समझ आ जाए तो वे इन उत्पादों को नहीं खरीदेंगे। मामूली वित्तीय साक्षरता वाला व्यक्ति भी आसानी से यह देख सकेगा कि अलग से बीमा कवर (टर्म बीमा) के लिए कितना पैसा जा रहा है और दूसरे निवेश के लिए कितना। वह यह भी देख सकेंगा कि एंडोमेंट प्लान से पोस्ट ऑफिस या बैंक का रिकरिंग जमा खाता ही बेहतर है। इस तरह उसे बीमा उद्योग की हकीकत पता चल जाएगी।

समिति की प्रमुख सिफारिश यह है कि नियामकों को कार्यों का पालन करना चाहिए न कि उसके प्रकारों का। इसमें सिफाशि की गई है कि लागत, कमीशन व पारदर्शिता के मामलें में किसी भी बीमा कंपनी के किसी प्रोडक्ट में निवेश वाले हिस्से और म्यूचुअल फंड के बीच भेद नहीं होना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि लीड रेगुलेटर को कार्यों के अनुरूप नियम तय करने चाहिए। बंडल प्रोडक्ट में लीड रेगुलेटर को सब-पार्ट के लिए नियम तय करने चाहिए। इसका अर्थ है कि यूलिप व एंडोमेंट प्लान जैसे बीमा उत्पाद में निवेश वाले हिस्से के लिए सेबी के म्यूचुअल फंड्स के नियमों का पालन करना होगा।

कुछ साल पहले सेबी ने जब यूलिप को रेगुलेट करने की कोशिश की थी तो यही दृष्टिकोण अपनाया था। उस समय कई ऐसे यूलिप प्लान थे, जिनमें बीमा का हिस्सा बहुत कम था। वास्तव में वे म्यूचुअल फंड थे, जिनके लिए अत्यधिक कमीशन दिया जा रहा था। इनकी लागत भी अधिक थी और इनमें मामूली बीमा का अंश था, ताकि वे इरडा के नियामक तंत्र के तहत बेचे जा सकें। इसके बाद यूलिप नए अवतार में आया जिसमें कुल कमीशन पूरी समयावधि में कम था। इस रिपोर्ट में भी कहा गया कि अगर आप पहले ही अधिक कमीशन दे देते हैं और उसके बाद उसकी दर कम रहती है तो कम कमीशन की अवधारणा मिथ्या साबित होती है। इससे भी अहम यह है कि ऐसा होने पर परंपरागत बीमा प्लान की बिक्री बढ़ गई। इसमें आज भी अधिक कमीशन दिया जाता है और पारदर्शिता नगण्य है।

रिपोर्ट में म्यूचुअल फंडों के बारे में भी सिफारिश की गई है। इसमें सबसे अधिक प्रभाव उस सिफारिश का होगा, जिसमें कहा गया कि म्यूचुअल फंड के लिए कमीशन पहले नहीं दिया जाना चाहिए। एडवाइजर का कमीशन सभी कमीशनों से आना चाहिए, जो कि अब भी काफी निम्न है। यह कमीशन उस अविध में मिलता है, जब निवेशक उस प्रोडक्ट में निवेश जारी रखता है। इस बदलाव की जरूरत काफी समय से महसूस की जा रही है। यह एडवाइजर्स के हितों को निवेशक के हितों से जोड़ता है।

क्या इन सिफारिशों के लागू होने पर कोई वास्तविक बदलाव आएगा। मैं इसका इंतजार नहीं कर रहा। जिन समस्याओं का समाधान इस रिपोर्ट में सुझाया गया है, उन्हें सब जानते हैं। इसको सरकारी समिति की रिपोर्ट के रूप में पेश करना एक सही दिशा में कदम है। लेकिन यह कदम बहुत छोटा है। मुख्य सिफारिशों को लागू करने के लिए वित्तीय क्षेत्र के नियामक तंत्र में व्यापक बदलाव करना होगा। भारतीय वित्तीय कोड के माध्यम से भी इस दिशा में पहले से ही प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि सबसे बुरी स्थिति तब होगी, जब इन सिफारिशों में से कुछ को लागू कर दिया जाए और कुछ को छोड़ दिया जाए। मुख्य मुद्दा यहां पर नियामकों का है। सेबी से तुलना करें तो इरडा के निवेश के संबंध में नियम काफी कमजोर हैं। कल्पना करें कि अगर म्यूचुअल फंड की सिफारिशें लागू हो जाती हैं और बीमा की अनदेखी कर दी जाती है तो उससे भी नियामकों की भूमिका पर असर पड़ेगा। मैं ऐसी संभावना नकार नहीं कर सकता, क्योंकि ऐतिहासिक तौर पर हमने देखा है बीमा उद्योग शक्तिशाली है।
धीरेंद्र कुमार

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