कृषि क्षेत्र में अनिश्चितता को खत्म करने के लिए सरकार ने पिछले दिनों प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पेश की है। इसके तहत 1999 एवं 2004 में राजग और संप्रग सरकारों द्वारा पेश की गई फसल बीमा योजनाओं में सुधार किया गया है। नई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में न्यूनतम प्रीमियम रबी के लिए 1.5 और खरीफ के लिए दो फीसद तय किया गया है। इसके अलावा इसमें सब्सिडी की ऊपरी सीमा को भी हटा दिया है। ये नए प्रावधान निश्चित रूप से इस योजना को किसानों के लिए ज्यादा आकर्षक बनाएंगे और वे मुक्त कारोबार के लिए ज्यादा जोखिम उठा सकेंगे।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना का स्थान लेगी। इससे राज्यों को असीमित दायित्व के प्रावधान बनाने के लिए बीमा प्रीमियम सब्सिडी का बजट तैयार करने में मदद मिलेगी। हालांकि वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि प्रीमियम सब्सिडी का अपना हिस्सा जुटाने में राज्यों को दिक्कत आ सकती है।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत फसलों के नुकसान संबंधी तकनीकी आंकड़े आसानी से जुटाए जा सकेंगे।

सबसे पहले सरकार मौसम जोखिम प्रबंधन के बारे में किसानों को जागरूक करने की योजना बना रही है। इसके लिए कृषि एवं मौसम विज्ञान के आंकड़ों के आधार पर बीमा एवं क्षतिपूर्ति प्रणाली की स्थापना की जाएगी। इसके अलावा मौसम संबंधी प्राकृतिक आपदाओं, जैसे बरसात या कटाई के बाद बारिश से फसलों को होने वाले नुकसान की परिभाषा को भी बदला जाएगा। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि राज्य सरकारें दावों के निपटारे के लिए आंकड़े कैसे जुटाएंगी। आंकडों के बिना फसल कटाई के प्रयोगों के लिए उनका हिस्सा तय करना मुश्किल होगा।

उम्मीद की जा रही है कि यह आकर्षक योजना देश के 50 फीसद से ज्यादा किसानों को कवर करेगी। इसका सीधा लाभ बैंकों और वित्तीय संस्थानों को मिलेगा, जो अपनी प्रणाली के जोखिमों को कवर करने के लिए किसानों को कवरेज देने के पक्ष में पहले से हैं। इससे बैंकों से कर्ज लेने वाले किसानों का कवरेज बढ़ जाएगा। बीमा योजना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह होगा कि यह देश के उन कम जागरूक एवं गरीब किसानों तक पहुंचेगी, जिन्हें अभी किसी बैंकिंग प्रणाली से कर्ज लेने की सुविधा उपलब्ध नहीं है। मौसम एवं प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाले नुकसान के खिलाफ सुरक्षा एवं जागरूकता को बढ़ाने के लिए निजी कृषि

कंपनियां तथा एनजीओ महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि यह योजना बेहतर पैकेज लेने वाले किसानों को किसी तरह का प्रोत्साहन प्रदान नहीं करती और न ही इसमें खेतों के स्तर पर दावों के निपटारे पर ध्यान केंद्रित किया गया है। यह योजना किसानों में बढ़ावा देने के लिए निजी कंपनियों और एनजीओ को कम प्रोत्साहन

प्रदान करती है। हालांकि ग्रामीण वित्तीय कंपनियां बिना कर्ज वाले किसानों को ये पॉलिसियां बेचने के लिए प्रोत्साहित होंगी।

बैंकों से दावों का कवरेज मौसम स्टेशनों एवं मानवरहित वायुयानों से मिलने वाले आंकड़ों पर आधारित होगा। भारतीय मौसम विभाग इस तरह के उपकरणों को इंस्टाल करने का काम करेगा। जबकि विमानन नियामक डीजीसीए केवल सरकारी संस्थानों को ही ये वाहन उड़ाने की अनुमति देगा। चूंकि इसमें बड़े पैमाने पर भूमि को कवर किया जाएगा, लिहाजा निजी एजेंसियों को बड़े स्तर पर मौसम स्टेशनों के इंस्टालेशन एवं वायुयानों द्वारा सर्वेक्षण का काम करना होगा। हालांकि ऐसे स्टेशनों के लिए अब तक कोई व्यावहारिक दिशानिर्देश तय नहीं किए गए हैं।

कम प्रीमियम एवं सरकारी सहायता पर ऊपरी सीमा में छूट जैसे मुद्दों की बात करें तो सरकार भारतीय किसानों को किसी भी प्रकार की वित्तीय असुरक्षा से बचाते हुए सुरक्षा प्रदान करना चाहती है। उम्मीद है कि सरकार का यह कदम कृषक समुदाय के कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के साथ ही साथ किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं के चिंताजनक मुद्दे का भी समाधान करेगा। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की सफलता विभिन्न स्तरों पर किए जाने वाले कार्यों और सहयोग पर निर्भर करेगी। योजना का वास्तविक प्रभाव तो समय के साथ ही सामने आएगा। लेकिन इतना तय है कि तकनीकी इस क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव लाएगी। वित्तीय

पहलुओं को एक तरफ रख दिया जाए तो भी प्राकृतिक एवं मौसमी आपदाओं से नुकसान की भरपायी के लिए बनाई गई योजनाएं भारत में कृषि क्षेत्र व किसानों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाएंगी।

सोनू अग्रवाल

संस्थापक एवं मैनेजिंग डायरेक्टर

क्लाइमेट रिस्क मैनेजमेंट कंपनी लिमिडेट

Posted By: Babita Kashyap

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