कोलकाता में हाल ही में एक निर्माणाधीन ब्रिज के गिरने से कई तरह के सवाल उठ खड़े हुए हैं। इस हादसे में कई लोगों को जिंदगी से हाथ धोना पड़ा। कंपनी पर कई तरह के आरोप लग रहे हैं। आने वाले दिनों में कंपनी को भारी भरकम मुआवजा भी देना पड़ सकता है। हादसे के शिकार लोग कंपनी से मुआवजे की मांग कर सकते हैं। क्या कंपनी इसके लिए तैयार है? क्या बीमा कवरेज लेकर कंपनी अपने आर्थिक बोझ से बच सकती है?

क्या हादसे के शिकार लोग कंपनी से मुआवजा मांग सकते हैं?

इन सवालों का जवाब देने से पहले हम जरा इस तरह के हादसों के बढ़ रहे खतरे पर ध्यान दें। री-इंश्योरेंस करने वाली दुनिया की प्रख्यात कंपनी स्विस रे का एक अध्ययन बताता है कि वर्ष 2015 में भारत में सभी तरह के हादसों (प्राकृतिक या मानवीय चूकों वाले) से 6.2 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। इस तरह के हादसों से दुनिया में होने वाली हानि का 6.8 फीसद भारत में हुआ है। हालांकि इसमें बीमित हानि महज एक अरब डॉलर की है। यानी भारत में हादसों से जितनी हानि हुई है उसके 84 फीसद का कोई बीमा नहीं हुआ है। जिस रफ्तार से देश में शहरीकरण की रफ्तार बनी हुई है और जिस तरह से बड़ी ढांचागत परियोजनाओं पर काम चल रहा है उसे देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि आने वाले दिनों में हादसे नहीं होंगे। इन परियोजनाओं की सुरक्षा और इन्होंने पर्याप्त बीमा कवरेज करवाया है या नहीं, इस पर काफी विस्तार से चर्चा होने की जरूरत है।

सबसे ज्यादा विचार करने की जरूरत इस बात की है कि ऐसे हादसों में मानव जीवन हमेशा जोखिम पर रहता है। और हादसों के बाद इनके लिए मुआवजा सबसे बड़ी जरूरत होता है। तीन वर्ष पहले मुंबई के ठाणे में एक भवन के गिरने से 38 लोगों की मौत हुई थी। दो वर्ष पहले चेन्नई में एक भवन के गिरने से 61 लोग काल कलवित हो गए। कोलकाता में इसके पहले भी निर्माणाधीन पुल गिरने के हादसे हुए हैं। सूरत में एक फ्लाईओवर का एक

हिस्सा गिर गया था।

क्या भारत मानव निर्मित इन हादसों को पर्याप्त बीमा सुरक्षा देने को तैयार है?

क्योंकि इन हादसों से सैकड़ों लोग व परिवारों की कमाई व भविष्य पर असर पड़ता है। निर्माण से जुड़ी देश की ज्यादातर कंपनियां, ठेकेदार या संपत्तियों के मालिक सभी जोखिम को कवर करने वाली बीमा पॉलिसी करवाते हैं जिसे सीएआर कहा जाता है। लेकिन अक्सर इन परियोजनाओं की यह पॉलिसी नुकसान की भरपाई करने में कारगर नहीं होती। ऐसे में मानव जीवन को हुए नुकसान की भरपाई का जोखिम बढ़

जाता है।

सबसे बड़ी मुश्किल तब आती है जब हादसों की वजह से नुकसान उठाने वाले लोग मुआवजे के लिए कोर्ट चले जाएं। इससे मुआवजे का मामला लंबा खिंचता है। इसलिए यह जरूरी है कि इन कंपनियों के पास पर्याप्त बीमा कवरेज हो। एक हकीकत यह भी है कि बड़ी परियोजनाएं चलाने वाली कंपनियां भी आम जनता के लिए पर्याप्त कवरेज नहीं लेतीं। सिर्फ दस फीसद ही बड़ी कंपनियों ने सार्वजनिक दायित्व की भरपाई के लिए बीमा कवरेज लिया हुआ है। इसलिए आम जनता के हितों को देखते हुए यह आवश्यक है कि इस तरह के निर्माण से जुड़ी हर कंपनी के पास पब्लिक लायबिलिटी कवरेज हो।

एस.के. आदिदामू

चीफ टेक्निकल ऑफिसर

बजाज एलायंज जनरल इंश्योरेंस

Posted By: Babita Kashyap

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