नई दिल्ली, राहुल जैन। हेल्थ इंश्योरेंस आज के समय में हर व्यक्ति के पोर्टफोलियो का एक सबसे अहम हिस्सा बन गया है। किसी भी सही निर्णय तक पहुंचने के लिए विभिन्न तरह की हेल्थ पॉलिसीज के बीच के अंतर को समझना जरूरी होता है। व्यापक तौर पर देखा जाए तो हेल्थ इंश्योरेंस की दो श्रेणिया होती हैं- रेगुलर और क्रिटिकल इलनेस के लिए। वैसे तो इन दोनों पॉलिसीज का लक्ष्य चिकित्सा मद में होने वाले भारी-भरकम खर्च को रोकना होता है। लेकिन इसके बावजूद दोनों के कामकाज का तरीका बिल्कुल अलग होता है। ऐसे में आइए इनके बीच के अंतर समझने की कोशिश करते हैं। आइए जानते हैंः 

प्लान का नेचर

स्टैंडर्ड हेल्थ इंश्योरेंस प्लान इंडेमनिटी (क्षतिपूर्ति) के सिद्धांत के आधार पर काम करता है। इस चीज को इस तरह समझते हैं कि इस प्लान के तहत अस्पताल में भर्ती कराने पर आने वाले खर्च को ही बीमा कंपनी पॉलिसीहोल्डर को रिअम्बर्स (वापस) करती है। दूसरी ओर, कैंसर इंश्योरेंस जैसे क्रिटिकल इलनेस प्लान में पॉलिसी में उल्लेखित गंभीर बीमारी के डायग्नोसिस होने पर ही पॉलिसीहोल्डर को कंपनी एकमुश्त राशि ट्रांसफर करती है। इसका सीधा-सीधा मतलब ये है कि बीमारी पर चाहे कितना भी खर्च आए आपको बीमारी का पता लगने पर तय राशि मिल जाएगी। इसके तहत भुगतान पाने के लिए हॉस्पिटलाइजेशन की अनिवार्यता नहीं है। इसके साथ ही आपके पास यह सुविधा रहती है कि आप धनराशि को कहां खर्च करते हैं। 

कितनी मिलेगी कवरेज

रेगुलर हेल्थ प्लान में कई बीमारियों के लिए इंश्योरेंस कवर मिलता है। यह एक या दो बीमारियों तक सीमित नहीं है। दूसरी ओर, क्रिटिकल इलनेस प्लान में स्ट्रोक, किडनी फेल, अंग प्रतिरोपण जैसी चीजों के लिए कवरेज मिलती है। कैंसर जैसे क्रिटिकल इलनेस प्लान की बात की जाए तो आपको सभी कैंसर के लिए कवरेज मिलती है, किसी और बीमारी के लिए नहीं। यहां यह ध्यान रखने वाली बात यह है कि गंभीर बीमारियों को कवर करने वाले प्लान में केवल ऐसी बीमारियों को शामिल किया जाता है, जिनमें उपचार पर खर्च बहुत अधिक होता है और आपके सेविंग के पैसे बहुत जल्द खत्म हो जाते हैं।

किनके लिए हैं ये प्लान

किसी भी तरह की मेडिकल इमरजेंसी की स्थिति में आपकी मेहनत की कमाई और वर्षों से इकट्ठा सेविंग्स ना लग जाएं, इसे सुनिश्चित करने के लिए हर किसी को रेगुलर हेल्थ इंश्योरेंस प्लान लेना चाहिए। इसके लिए फ्लोटर प्लान लिया जा सकता है, जिसमें परिवार के सभी सदस्यों को कवरेज मिल जाती है। 

वहीं, पहले से चल रहे हेल्थ इंश्योरेंस प्लान के साथ-साथ कोई भी व्यक्ति क्रिटिकल इलनेस प्लान भी खरीद सकता है। ये प्लान ऐसे लोगों को जरूर लेना चाहिए, जिनको किसी तरह की गंभीर बीमारी होने की आशंका होती है। हालांकि, आज के समय में इस तरह की बीमारियां किसी को भी अपने चपेट में ले सकती हैं, ऐसे में अतिरिक्त सुरक्षा के लिए इस तरह का कवर खरीदकर रखना चाहिए। 

कितनी बार ले सकते हैं क्लेम

रेगुलर हेल्थ प्लान लेने पर आप एक से ज्यादा बार क्लेम ले सकते हैं। हालांकि, क्लेम की कुल राशि कवरेज सीमा के अंदर ही होनी चाहिए। क्रिटिकल इलनेस प्लान में ऐसा नहीं है। एक बार आपका क्लेम स्वीकार होने और तय राशि के भुगतान के साथ पॉलिसी तत्काल प्रभाव से टर्मिनेट हो जाती है। 

रेगुलर हेल्थ प्लान में आपको हर साल पॉलिसी को रिन्यू कराना पड़ता है लेकिन गंभीर बीमारियों से जुड़े हुए प्लान लंबी अवधि के होते हैं। 

निष्कर्ष

रेगुलर हेल्थ प्लान और गंभीर बीमारियों के उपचार से जुड़े इंश्योरेंस दोनों अलग-अलग जरूरतों की पूर्ति करते हैं, और ये आपके पोर्टफोलियो में होने चाहिए। किसी भी तरह की गंभीर बीमारी के उपचार में आने वाले भारी खर्चे को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि पॉलिसी होल्डर्स को इन बीमारियों के कवर के लिए एकल प्लान लेना चाहिए। इसमें रेगुलर हेल्थ प्लान का इस्तेमाल आप चिकित्सा संबंधी अन्य जरूरतों के लिए कर सकते हैं।  

हालांकि, किसी भी तरह का प्लान लेने से पहले सभी शर्तों को पढ़ना चाहिए। इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए कि पॉलिसी में क्या चीजें शामिल नहीं हैं। साथ ही इंश्योरेंस कंपनी का क्लेम सेटलमेंट रेशियो पता करना चाहिए। यह रेशियो जितना अधिक होता है, आपका क्लेम सेटल होने की संभावनाएं उतनी ही अधिक होती हैं।

(लेखक Edelweiss Personal Wealth के प्रमुख हैं। प्रकाशित विचार लेखक के निजी हैं।)

Edited By: Ankit Kumar