पिछले कुछ साल में फिक्स्ड डिपोजिट पर ब्याज दरों में गिरावट आई है। एफडी की ब्याज दर दो फीसद कम होने का अर्थ है रिटर्न में 20 फीसद की गिरावट। इसके अलावा एफडी की ज्यादा ब्याज दर महंगाई की ऊंची दर को न्योता देती है। इसलिए एफडी की ऊंची ब्याज दर भी उतनी फायदेमंद नहीं है, जितनी लगती है। महंगाई को हटाकर देखा जाए, तो असल रिटर्न बहुत कम रह जाता है। इसकी तुलना में इक्विटी में निवेश से मिलने वाला रिटर्न ज्यादा रहता है। इसका बड़ा फायदा यह भी है कि इससे मिलने वाले रिटर्न पर टैक्स भी नहीं लगता है।

कुछ दिन पहले मुझे एक बुजुर्ग का मैसेज आया था। उनका कहना था कि पांच साल में एक फिक्स्ड डिपोजिट (एफडी) से उन्हें मिलने वाला रिटर्न 25 फीसद तक कम हो गया। मामला अगस्त, 2012 से अगस्त 2017 के बीच का है। उन्होंने अगस्त, 2012 में पांच साल की एफडी की थी। अगस्त, 2017 में जब मैच्योरिटी के बाद उन्होंने इसे रीन्यू कराया, उनके रिटर्न में अच्छा खासा फर्क पड़ गया।

अगर आप ब्याज दरों में बदलाव की खबरें केवल सरसरी निगाह से देखते हैं, तो निश्चित रूप से आपको यह बेतुकी सी बात लगेगी। आप यही सोचेंगे कि ब्याज दरों में तो केवल दो या तीन फीसद की ही कमी आई है। फिर रिटर्न में 25 फीसद का फर्क कैसे। इसे समझने के लिए पहले उनका पूरा मैसेज पढ़ते हैं। उन्होंने लिखा था, ‘मुझे हर महीने 35,352 रुपये मिला करते थे। यह आयकर के दायरे में आने वाली रकम थी, लेकिन इससे मैं वित्तीय रूप से निश्चिंत रहता था। अब मैच्योरिटी के बाद मैंने फिर उतना ही पैसा बैंक में डाला है, लेकिन अब बैंक मुझे केवल 26,489 रुपये प्रतिमाह देगा।’

एफडी पर मिलने वाली ब्याज की दर संभवत: करीब 2.5 फीसद ही कम हुई होगी, लेकिन रिटर्न पर 25 फीसद का असर पड़ गया। दरअसल यह सबकुछ ब्याज दरों के कम होने की खबरों को मीडिया में रखने के तरीके पर निर्भर करता है। सच्चाई यही है कि किसी भी डिपोजिट पर ब्याज दर 10 से आठ फीसद होने से उस पर मिलने वाला रिटर्न 20 फीसद कम हो जाता है। अगर आपको 20,000 रुपये बतौर रिटर्न मिलते थे, तो अब 16,000 रुपये ही मिलेंगे। ब्याज दर में दो फीसद की कटौती वाली खबरें असल में केवल छलावा होती हैं।

अर्थव्यवस्था से बाहर हो चुके हैं वरिष्ठ नागरिक: वास्तव में अर्थव्यवस्था में सब तरफ से अच्छी खबरों के बीच ब्याज दरों में कटौती के तमाम कदमों का संबंध काफी हद तक बुजुर्गो और रिटायर हो चुके लोगों से है। कम महंगाई, नीची ब्याज दरें, बेहतर वित्तीय प्रबंधन और अच्छी विकास दर अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी बातें हैं, लेकिन बुजुर्गो के लिए इनका कोई लाभ नहीं है, क्योंकि वो कमाई के किसी सीधे स्रोत से नहीं जुड़े होते हैं। अर्थव्यवस्था में विकास की वजह से किसी बुजुर्ग को अच्छी नौकरी या ऊंचा वेतन नहीं मिलेगा। उनका यह दौर समाप्त हो चुका है।

हालांकि इस स्थिति में ऊंची ब्याज दर के लिए दुआ करने का कोई मतलब नहीं है। ऊंची ब्याज दरों के प्रति हमारी आसक्ति इसलिए है, क्योंकि हमने महंगाई की ऊंची दरों को नजरअंदाज करना सीख लिया है। हम भूल जाते हैं कि महंगाई अपने आप में ऊंची ब्याज दरों की जुड़वां बहन जैसी है। मुझे कहते हुए दुख हो रहा है, लेकिन उपरोक्त मैसेज भेजने वाले बुजुर्ग वित्तीय रूप से असफल हैं। पिछले पांच साल उन्हें ब्याज से आय के रूप में 35,352 रुपये प्रतिमाह मिल रहे थे और वह उसे खर्च कर रहे थे। असल में वह अपनी ही पूंजी खा रहे थे। उस पैसे में से उनकी आय बमुश्किल 7,000 से 10,000 रुपये ही थी। बाकी जो था, वह महंगाई की वजह से रुपये की कीमत में गिरावट का नतीजा था।

सबसे महत्वपूर्ण बात, जो उनकी तरह करोड़ों लोग नजरअंदाज कर देते हैं कि उनकी असली आय कम नहीं हुई है। अगर वे महंगाई के असर को हटाकर गणना करें, तो उनकी आय बढ़ी ही होगी। लेकिन सवाल है कि उस असल आय को कैसे जानें? इसका उत्तर है कि हर साल जमा की गई राशि का केवल डेढ़ फीसद के बराबर ही खर्च करें। बाकी को बढ़ने दें। यह इस आधार पर कहा गया है कि अमूमन एफडी की दरें महंगाई की दर से 1.5 फीसद ज्यादा रहती हैं।

जाहिर सी बात है कि ऐसा करने के लिए किसी को भी बहुत पैसों की जरूरत होगी। 40 लाख रुपये की जगह दो करोड़ रुपये डिपोजिट करने होंगे, जो उसके पास नहीं है। आप समझ सकते हैं कि ऐसा करना सबके लिए संभव नहीं है। सवाल यह है कि इसका हल कैसे निकाला जाए? इसका उत्तर है इक्विटी में निवेश करके। इक्विटी से मिलने वाले रिटर्न से इस समस्या को कुछ हद तक हल किया जा सकता है। महंगाई को हटाकर इक्विटी से मिलने वाला असल रिटर्न एफडी के दोगुने या तीन गुने बराबर होता है। जहां एफडी महंगाई से 1.5 फीसद ज्यादा रिटर्न देती है, इक्विटी तीन से पांच फीसद तक ज्यादा रिटर्न देने में सक्षम है।

इक्विटी के अलावा कोई रास्ता नहीं: कम रिस्क लेते हुए और कर का हिसाब-किताब लगाते हुए इक्विटी में थोड़ा निवेश करने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं है। इसे आदर्श रूप से कुछ चरणों में किया जा सकता है। पहला, करीब तीन साल के अनुमानित खर्च के बराबर का पैसा अलग रखकर बाकी को दो या तीन बैलेंस्ड फंड में डालें। तीन साल बाद आप इन बैलेंस्ड फंड में से हर साल पैसा निकालना शुरू कर सकते हैं। हर साल करीब बाकी पैसे के तीन या चार फीसद के बराबर निकासी कीजिए।

मोटे तौर पर कहा जाए तो यह आप को एफडी के रिटर्न के बराबर या उससे ज्यादा का रिटर्न दे देगा। इसका सबसे बड़ा फायदा है कि बचे हुए निवेश की कीमत भी करीब-करीब महंगाई के हिसाब से ही बढ़ रही होगी। ऐसा करके कुछ हद तक संतुष्ट हुआ जा सकता है कि बुढ़ापे में आपको गरीबी का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसका एक और बड़ा फायदा है कि इससे मिलने वाली आय पर टैक्स नहीं लगेगा, जबकि एफडी के रिटर्न पर लगता है।

जैसा कि मैं अक्सर कहता हूं कि बुढ़ापे में गरीबी से बचने के लिए इक्विटी में निवेश को लेकर फैला डर खत्म करने की जरूरत है। दूसरा कोई रास्ता नहीं।

(यह लेख धीरेन्द्र कुमार ने लिखा है जो कि वैल्यू रिसर्च के सीईओ हैं।)

By Praveen Dwivedi