नई दिल्ली (धीरेंद्र कुमार, वैल्यू रिसर्च)। बजट में सरकार ने लांग टर्म कैपिटल गेन पर फिर से टैक्स लगाने की घोषणा की है। इस घोषणा से शेयर बाजार में तेज गिरावट आई है। आम निवेशकों के मन में भी इससे जुड़े कई सवाल हैं। ऐसे में यह जानना भी जरूरी है कि निवेश करते हुए कौन सी रणनीतियां अपनाकर आप इसके असर को कम कर सकते हैं। निवेश का तरीका ही आपके रिटर्न पर इस टैक्स से पड़ने वाले असर को कम या ज्यादा करेगा। बार-बार खरीद-बिक्री करते रहने वालों को ज्यादा नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

लिस्टेड शेयरों और इक्विटी म्यूचुअल फंडों में लांग टर्म कैपिटल गेंस पर दोबारा टैक्स लगाने का फैसला 2005 के बाद से पर्सनल सेविंग्स टैक्सेशन में सबसे बड़ा बदलाव है। 2005 में ही इस टैक्स को हटाया गया था। इन 13 साल में भारत में निवेशकों की दुनिया बहुत बदल चुकी है। अब बहुत बड़ी संख्या में लोग निवेश करने लगे हैं। 2005 से पहले कर की यह व्यवस्था आम थी, लेकिन आज बहुत से लोग ऐसे हैं, जो इस कराधान की व्यवस्था से बिलकुल परिचित नहीं हैं।

कुछ आधारभूत बातों पर ध्यान देते हैं। एक फरवरी के बाद से ऐसे किसी स्टॉक या इक्विटी म्यूचुअल फंड को बेचने पर, जिसे आपने लंबे समय (एक साल या उससे ज्यादा) से रखा हुआ है, उस पर हुए गेन पर टैक्स लगेगा। इस टैक्स के लिए आपकी कमाई का आकलन 31 जनवरी के बाजार भाव के हिसाब से किया जाएगा। अगर साल भर में आपने एक लाख रुपये से ज्यादा का लाभ कमाया तो 10.04 फीसद (सेस समेत) टैक्स के रूप में देना होगा। इसे लेकर आप खुद को यह कहकर समझा सकते हैं कि आपकी आय तो 30 फीसद वाली आयकर स्लैब में आती है, उसकी तुलना में तो यह टैक्स बहुत कम है। सच यह है कि यह टैक्स 10 फीसद से ज्यादा भारी पड़ सकता है। वैसे तो सरकार को आपकी कमाई में से 10 फीसद ही मिलेगा, लेकिन आपको रिटर्न में 30 से 40 फीसद तक का नुकसान हो सकता है। यह निर्भर करेगा आपके निवेश के तरीके पर। हालात को समझकर और तरीके में बदलाव कर आप इस नुकसान को कम कर सकते हैं।

पिछले साल दिसंबर में जब इस टैक्स की वापसी की चर्चाएं चली थीं, तब मैंने उल्लेख किया था कि 10 या 15 साल लंबी अवधि के निवेशकों को ज्यादा नुकसान होगा। वजह है कि कोई इक्विटी निवेशक इतनी अवधि तक निवेश को बचाकर नहीं रखता है। किसी ना किसी वक्त पर वह कुछ शेयरों को बेच देता है और नए खरीद लेता है। कराधान के नियम के अनुसार, लेनदेन में ऐसे हर बदलाव से होने वाली कमाई पर टैक्स लगेगा। कुल मिलाकर अंत में होने वाली कमाई कम हो जाती है। अंतिम प्रभाव बड़ा भी हो सकता है, लेकिन यह निवेशक की खरीद-बिक्री के पैटर्न पर निर्भर करता है।

कैपिटल गेन टैक्स के छिपे हुए असर से बचने के तीन तरीके

पहला तरीका

बहुत जल्दी-जल्दी शेयरों की खरीद-बिक्री न करें। सदाबहार शेयरों को चुनें, जिन्हें आप लंबे समय तक बनाकर रख सकें। इससे आपका रिटर्न बढ़ेगा। यह पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विस देने वाली फर्मो से जुड़ने वालों के लिए बेहद जरूरी बात है। ऐसी फर्मे आपके निवेश को इधर-उधर करती रहती हैं। इनका उद्देश्य अपनी कमाई को बढ़ाना होता है। इनसे आपके रिटर्न पर हमेशा बुरा प्रभाव पड़ता है, लेकिन अब यह प्रभाव और भी बुरा होगा।

दूसरा तरीका

सीधे इक्विटी खरीदने के बजाय म्यूचुअल फंडों में निवेश करें। म्यूचुअल फंड निवेशक को रिटर्न करीब उतना ही मिलता है, लेकिन उसे खरीद-बिक्री बार-बार नहीं करनी पड़ती है। इसमें ट्रेडिंग फंड मैनेजर करते हैं। जब तक आप फंड नहीं बेचते हैं, टैक्स नहीं देना पड़ता। मेरा अपना अनुभव है कि म्यूचुअल फंड निवेशकों के लिए एक ही फंड से 10 साल या इससे ज्यादा समय तक जुड़े रहना ज्यादा आसान रहता है। आपको इसे तब तक बेचने की जरूरत नहीं होती, जब तक आपको पैसे की जरूरत ना पड़ जाए। ऐसे में फंड लेने में समझदारी है, क्योंकि इसमें आपको कम से कम खरीद-बिक्री की जरूरत होती है। इसमें भी हाइब्रिड फंड बेहतर होते हैं। केवल इक्विटी या डेट आधारित फंड की जगह ऐसे फंड को चुनना अच्छा होगा, जो एसेट री-एलोकेशन स्ट्रेटजी पर काम करते हों।

तीसरा तरीका

यह तरीका फायदेमंद है, लेकिन इसके लिए थोड़ी समझ और मेहनत की जरूरत होगी। कर व्यवस्था में साल के अंत में एक लाख रुपये तक का लाभ कर मुक्त है। आप उतने स्टॉक या फंड बेच सकते हैं, जिनसे एक लाख रुपये से कम गेन हो। बाद में उसी पैसे का फिर से निवेश कर दीजिए। इससे हर साल आप 10,000 रुपये बचा सकते हैं। निश्चित तौर पर भविष्य में यह बड़ी राशि बन जाएगी।

इस कर के और साइड इफेक्ट हैं

ईएलएसएस फंड: ज्यादातर निवेशक सोचते हैं कि टैक्स सेविंग (ईएलएसएस) फंड में निवेश पूरी तरह से कर मुक्त होता है। यहां तक कि उससे मिलने वाले रिटर्न पर भी टैक्स नहीं लगता। यह सच नहीं है। ऐसे फंड निवेश के समय आपको कर से छूट दिलाते हैं, लेकिन नियमानुसार इनको बेचकर मिलने वाला रिटर्न हमेशा कर के दायरे में ही आता रहा है। हालांकि ये फंड इक्विटी फंड की श्रेणी में आते हैं और इनमें निवेश तीन साल के लॉक-इन पीरियड के साथ होता है, इसलिए प्रभावी रूप से इन पर टैक्स नहीं लगता था। अब एक लाख की सीमा के ऊपर इन पर भी टैक्स लगेगा।

डिस्ट्रीब्यूटर: ऐसे फंड निवेशक, जो पूरी तरह से फंड डिस्ट्रीब्यूटरों की सलाह पर निर्भर होते हैं, उनके निवेश में ज्यादा उतार-चढ़ाव होता है। डिस्ट्रीब्यूटर को तभी कमीशन मिलता है, जब कुछ खरीदते हैं। उसके पास हमेशा तर्क रहता है कि क्यों आपको कोई स्टॉक बेचकर दूसरा खरीद लेना चाहिए। नई कर व्यवस्था में यह आपके रिटर्न पर और भी बुरा असर डालेगा।

By Shubham Shankdhar