नई दिल्ली, धीरेंद्र कुमार। एक दशक पहले वर्ष 2008-09 की वैश्विक आर्थिक मंदी में एक बहुत अच्छी बात हुई। चूंकि दुनियाभर के शेयर बाजारों में तेज गिरावट आई, तो उस स्थिति में शेयर और निवेश बाजारों से जुड़ी कुछ ऐसी दिक्कतें और समस्याएं भी सामने आईं, जो सामान्य अवस्था में नहीं आ सकती थीं। कुछ दिनों पहले एक परिचित से हमारी बात हुई। वे संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई में रहते हैं। उन्होंने बताया कि किस तरह एक बहुराष्ट्रीय बैंक ने उनकी सारी कमाई चट कर डाली। हालांकि, यूएई एक अलग न्यायिक क्षेत्र में आता है। लेकिन जो किस्सा उन्होंने सुनाया उसमें बचतकर्ता भी भारतीय है, जिस म्यूचुअल फंड में उन्होंने निवेश किया था वह प्रोडक्ट भारतीय है और वह बैंक भारत में भी परिचालन करता है। इस लिहाज से देखें, तो यह कहानी उन सभी पाठकों के लिए बेहद लाभप्रद साबित हो सकती है जिनके रिश्तेदार विदेश में रहते हैं और भारतीय बाजार या यहां के निवेश उत्पादों में पूंजी लगाते हैं। उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम से जो सीख मिलती है, वह भारतीय बाजारों और निवेशकों के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक हो सकती है जितनी उस बाजार में जहां की यह कहानी है।

हमारे इस परिचित या ग्राहक से कुछ समय पहले एक बैंक ने संपर्क किया। उस बैंक ने उन्हें एक भारतीय म्यूचुअल फंड उत्पाद में निवेश के लिए प्रेरित किया। बैंक के मुताबिक निवेश का तरीका कुछ ऐसा होता कि रिटर्न की मात्र बहुत बढ़ जाती। कम से कम बैंक ने तो उस वक्त यही कहा था। ग्राहक ने बैंक की कहानी पर भरोसा कर लिया और निवेश को तैयार हो गया। निवेश के लिए इसलिए भी तैयार हो गया क्योंकि वह म्यूचुअल फंड एक बेहद मशहूर भारतीय वित्तीय ब्रांड है। लेकिन ग्राहक को यह नहीं पता था कि जिस प्रोडक्ट में उसने निवेश किया है, वह एक लीवरेज्ड प्रोडक्ट है और उस प्लान में ग्राहक ने जितनी रकम का निवेश किया था, असल में निवेश उससे दोगुना था। दोगुना इसलिए था कि बैंक ने भी उतनी ही रकम का निवेश किया था। लेकिन इसमें दिलचस्प बात यह थी कि बैंक ने ग्राहक की रकम को ही गिरवी रखकर बाकी आधी रकम जुटाई थी।

बेहद स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में जब तक रिटर्न बहुत सुखद थे, तब तक ग्राहक भी बहुत खुश था। लेकिन जब शेयर बाजार धराशायी हो गए, तब बैंक ने ग्राहक से मार्जिन मनी के रूप में बड़ी रकम की मांग की। बैंक ने इस रकम की मांग इसलिए की ताकि गिरवी का स्तर बढ़ाया जा सके। अब क्योंकि ग्राहक उस वक्त और निवेश करने की स्थिति में नहीं था, तो बैंक ने उसके करीब पूरे के पूरे शेयर बेच लिए। इससे ग्राहक का लगभग सारा का सारा निवेश चैपट हो गया। ग्राहक को पता भी नहीं चला कि असल में हुआ क्या। और अगर पता चल भी जाता तो उसे पलटने का कोई रास्ता नहीं उसके पास नहीं था। हो सकता है कि बैंक इस तरीके को उद्योग की तरह चला रहा हो और यह भी संभव है कि उसने इसके कानूनी पहलुओं से बचने की पूरी तैयारी कर रखी हो। जो भी हो, यह मामला पूरी तरह से भारतीय न्यायिक क्षेत्र से बाहर का है।

क्या ऐसा भारत में भी हो सकता है? इसका सही जवाब यह है कि म्यूचुअल फंड्स में तो बिल्कुल इसी तरीके से होना संभव नहीं है। हालांकि, यह बिल्कुल हो सकता है कि स्टॉक्स या म्यूचुअल फंड्स में किए हुए निवेश के एवज में बैंकों से कर्ज लें और फिर उस कर्ज का भी निवेश कर दें। उससे भी कमाई तो निश्चित तौर पर बहुत अधिक होगी, लेकिन जोखिम का स्तर भी बहुत-बहुत ज्यादा होगा। यह सच है कि शेयरों या स्टॉक्स में इस तरह की लीवरेज्ड ट्रेडिंग बहुत आम है और यह शेयर कारोबारियों के कामकाज का एक सामान्य तरीका भी है। का एक तरीका भी है। लेकिन हम ऐसा मानते हैं कि उन्हें अच्छी तरह पता है कि वे क्या कर रहे हैं। और अगर नहीं पता है तो पहले ही तगड़े नुकसान के बाद इसका आभास भी हो जाएगा।

सामान्य तौर पर कहूं तो जब बाजार तेजी से चढ़ रहा होता है या कम से कम एक तरीके से रोजमर्रा आकलन की हिसाब से गिर रहा होता है तब निवेश और खरीद-फरोख्त के कई ऐसे उपाय होते हैं जो एकदम ठीक से काम कर रहे होने का भ्रम देते हैं। लेकिन जब बाजारों पर दबाव बहुत बढ़ जाता है तो उन तरीकों में छुपी कमजोरियां उभरकर सामने आ जाती हैं। अभी यही हो रहा है और हर उस बिजनेस के साथ निकट भविष्य में ही होगा, जिसने बहुत सारा कर्ज ले रखा है। कर्ज लेकर निवेश करना किसी भी व्यक्तिगत निवेशक के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। दुर्भाग्य यह है कि हर बार कुछ बिचौलिए सिर्फ और सिर्फ अपनी कमाई बढ़ाने के लिए निवेशकों को हाथ पकड़कर इस रास्ते पर ले जाते हैं। बेहद कड़ा नियामकीय तंत्र इस समस्या को टालने में मददगार तो हो सकता है, लेकिन लोगों को 100 प्रतिशत सुरक्षित नहीं रख सकता।

वर्तमान परिस्थिति कुछ ऐसी ही है। इस वक्त बाजार में बहुत तेज उतार-चढ़ाव दिख रहे हैं। घाघ किस्म के सेल्सपर्सन ऐसे मौकों पर निवेशकों को जुगाड़ लगाकर कमाई करने के लिए उकसाते रहते हैं। जिन लोगों के पास अकूत संपत्ति है, वे इस तरह के कई प्रोडक्ट्स में पूंजी निवेश कर सकते हैं और विपरीत परिस्थितियांे में घाटा उठा सकते हैं। लेकिन जो खुद को ट्रेडर नहीं बल्कि बचतकर्ता मानते हैं, उनके लिए इस तरह के उपाय कहीं से स्वागत योग्य नहीं हैं। हमें अपने बुनियादी सिद्धांतों को पकड़कर चलना होगा। हमें उतने ही जोखिम लेने होंगे, जितने की इजाजत हमारी वित्तीय स्थितियां हमें देती हैं। कोविड-19 की यह लड़ाई लंबी चलने वाली है - व्यक्तिगत रूप से भी और वित्तीय रूप से भी। बेहतर यही होगा कि हम वित्तीय उत्पादों के मामले में इस वक्त जुगाड़बाजी से बचे रहें।

शेयर बाजारों में जब सबकुछ ठीक चल रहा होता है, तो निवेश के रास्तों की बहुत सी खामियां और चालबाजियां भी ढंकी-छुपी रहती हैं। लेकिन जब उतार-चढ़ाव इस वक्त जितना असामान्य हो तो वैसी चालबाजियां खुलकर सामने आ जाती हैं और निवेशक के पास हाथ मलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता है। यूएई में रह रहे एक भारतीय निवेशक ने किसी बैंक के कहने पर एक भारतीय निवेश प्रोडक्ट में रकम लगाई और शेयर बाजारों में जैसे ही तेज गिरावट हुई, वह अपनी लगभग पूरी रकम गंवा बैठा। हालांकि भारतीय बाजार में ठीक वैसा ही नहीं हो सकता। लेकिन ठीक उसी तरह बरगलाने वाले कहीं भी हो सकते हैं। बाजार में यह वक्त चालबाजियों का नहीं, सधी चाल का है।

(लेखक वैल्यू रिसर्च के सीइओ हैं। ये लेखक के निजी विचार हैं।)

Posted By: Ankit Kumar

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