एक दशक के विचार-विमर्श के बाद आखिरकार पिछले वर्ष आज ही के दिन देश में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू हुआ। इसके साथ ही कई अप्रत्यक्ष कर समाप्त हो गए, जिनसे आम कारोबारियों का वास्ता पड़ता था। बीते एक साल में जीएसटी ने काफी लंबा रास्ता तय किया है। कारोबार जगत ने भी कई नई बाधाओं से पार पाते हुए खुद को इस नई कर व्यवस्था के अनुरूप ढाल लिया है। हालांकि इस यात्रा में कारोबारियों को कुछ जटिलताओं का भी सामना करना पड़ा है। इसलिए आज जरूरत है कि जीएसटी को और सरल बनाकर इसका आधार व्यापक बनाया जाए। साथ ही उन आइटम को इसके दायरे में लाया जाए जो फिलहाल इससे बाहर हैं।

जीएसटी कानून का उद्देश्य तभी पूरा होगा जब इसके दायरे में अधिकाधिक कारोबारी आएं, उन्हें सुविधा हो और इसके साथ ही सरकारी खजाने में धन भी आए। हालांकि इस उद्देश्य को पूरा करने में रिपोर्टिग और कंप्लायंस तंत्र की जटिलता कई व्यवसायों और क्षेत्रों के लिए नकारात्मक साबित हुई है, खासकर एसएमई क्षेत्र के लिए। हालांकि प्रभावी डिजिटाइजेशन से कर व्यवस्था और अधिक पारदर्शी बनेगी। इस समय कारोबारियों को एक और जटिल स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। यह है- इनपुट टैक्स क्रेडिट की चुनौतियां।

अगर कारोबारी का इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा उसके वेंडर के इनवॉयस अपलोड न करने की वजह से साबित नहीं होता तो राशि खजाने में लौट जाती है और देनदारी खरीदार के सिर पड़ जाती है। इसके अलावा कारोबारियों के लिए दंड की राशि और ब्याज दर भी काफी अधिक है। इसलिए इसे तर्कसंगत बनाने की जरूरत है।

सरकार ने हमेशा से ही निर्यात को प्रोत्साहित किया है। हालांकि नई व्यवस्था में रिफंड मंजूरी में विलंब के चलते निर्यातकों की वर्किंग कैपिटल फंस रही है। इसके निदान के लिए कई कदम उठाए गए हैं लेकिन कारोबार की प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए इसे सुचारु बनाने के लिए कुछ और कदम उठाने की आवश्यकता है। अन्य क्षेत्रों में भी रिफंड की इसी तरह की समस्याएं हैं। अगर इन्वर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर के तहत इनपुट सर्विसेज के रिफंड में स्पष्टता आ जाती है तो उद्योग जगत के लिए बेहतर होगा।

सरकार ने कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए एंटी प्रॉफिटियरिंग का प्रावधान किया है। लेकिन इसमें भी सप्लाई चेन के विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग कीमतों संबंधी चुनौतियां हैं, जिन पर अधिक स्पष्टता की जरूरत है। एक ही समूह की दो कंपनियां यदि आपस में लेनदेन करती हैं तो दोनों कंपनियों के बीच करदेयता और उस सौदे के वैल्युएशन के संबंध में भी स्पष्टता लाए जाने की जरूरत है।

अंत में, सरकार को अब कर आधार व्यापक बनाने के लिए पेट्रोलियम उत्पाद और अचल संपत्ति को भी जीएसटी के दायरे में लाने के लिए कदम उठाने चाहिए ताकि पूरे देश में एक कर की अवधारणा पूरी तरह से मूर्तरूप ले सके।

(इस लेख के लेखक नितिश शर्मा हैं जो कि प्रत्यक्ष कर आरएन मारवाह एंड कंपनी एलएलपी के कार्यकारी निदेशक हैं)

By Praveen Dwivedi