नई दिल्‍ली, सत्यवान सौरभ। रुपये के मूल्य में कमी होने का मतलब है कि डालर के मुकाबले रुपये की स्थिति कमजोर हुई है। डालर के मुकाबले भारतीय रुपया 77.44 के सर्वकालिक निचले स्तर पर आ गया। सख्त वैश्विक मौद्रिक नीति, अमेरिकी डालर की मजबूती और जोखिम से बचने और उच्च चालू खाता घाटे से भारतीय रुपये के लिए गिरावट चिंता का विषय है। भारतीय रुपये के मूल्यह्रास के पीछे विभिन्न कारक देखें तो वैश्विक इक्विटी बाजारों में एक बिकवाली जो अमेरिकी फेडरल रिजर्व (केंद्रीय बैंक) द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि, रूस-यूक्रेन युद्ध और चीन में कोविड के कारण विकास की चिंताओं से शुरू हुई थी। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा दरों में 50 आधार अंकों की बढ़ोतरी के साथ, वैश्विक बाजारों में बिकवाली हुई है, क्योंकि निवेशक डालर की ओर बढ़ गए हैं। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, मुद्रास्फीति की आशंका, ब्याज दरों में बढ़ोतरी और कमजोर घरेलू इक्विटी से निवेशकों की धारणा प्रभावित होने के कारण सोमवार को अमेरिकी डालर के मुकाबले भारतीय रुपया 77.4 के ताजा निचले स्तर पर आ गया।

विश्लेषकों का कहना है कि विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय संपत्तियों की लगातार बिक्री को लेकर चिंता का भी मुद्रा पर असर पड़ा। फरवरी में रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण करने के बाद से रुपये पर व्यापक असर पड़ा है, क्योंकि संघर्ष के कारण वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि हुई है। रुपये में गिरावट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। चालू खाता घाटा बढ़ने और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी रुपये को कमजोर करने के लिए बाध्य है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और अन्य महत्वपूर्ण वस्तुओं के आयात के साथ, अर्थव्यवस्था निश्चित रूप से लागत-मुद्रास्फीति की ओर बढ़ रही है। कंपनियों को उच्च लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर पूरी तरह से डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती है, जो बदले में सरकारी लाभांश आय को प्रभावित करती है। रुपये में गिरावट भारतीय रिजर्व बैंक के लिए दोधारी तलवार है। रुपया कमजोर होने से सैद्धांतिक रूप से भारत से निर्यात को बढ़ावा मिलना चाहिए, लेकिन अनिश्चितता और कमजोर वैश्विक मांग के परिवेश में, रुपये के बाहरी मूल्य में गिरावट उच्च निर्यात में तब्दील नहीं हो सकती है। ऐसे में केंद्रीय बैंक के लिए ब्याज दरों को रिकार्ड स्तर पर लंबे समय तक बनाए रखना मुश्किल बना सकता है।

भारत अपनी घरेलू तेल आवश्यकताओं का दो-तिहाई से अधिक आयात के माध्यम से पूरा करता है। साथ ही भारत खाद्य तेलों के शीर्ष आयातकों में से एक है। एक कमजोर मुद्रा आयातित खाद्य तेल की कीमतों को और बढ़ाएगी। ऐसे में मूल्यह्रास का मुकाबला करने के लिए गैर-आवश्यक वस्तुओं के आयात पर अंकुश लगाने से डालर की मांग कम होगी और निर्यात को बढ़ावा देने से देश में डालर के प्रवाह को बढ़ाने में मदद मिलेगी। इस प्रकार रुपये के मूल्यह्रास को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं, प्रकाशित विचार उनके निजी हैं।)

Edited By: Manish Mishra