नई दिल्ली, धीरेंद्र कुमार। सैद्धांतिक तौर पर इक्विटी निवेशकों को अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता नहीं करनी चाहिए। यह बात ज्यादा मायने नहीं रखती है कि अर्थव्यवस्था के बड़े मसलों पर आपकी राय क्या है। मायने रखने वाली बात सिर्फ यह है कि आपने जिन Stocks में निवेश किया उसके मुनाफे और ग्रोथ को लेकर संभावनाएं कैसी हैं। इस नजरिये से देखें तो आने वाला कल हमेशा गुजर रहे आज से बेहतर साबित होता है। हमने कई बार देखा है कि अर्थव्यवस्था जब गहरे संकट में होती है तब भी बहुत सी कंपनियां होती हैं जो बढ़ती रहती हैं और शानदार मुनाफा दर्ज करती रहती हैं। ऐसा लगता है कि उनके आसपास के खराब माहौल को कोई असर ही नहीं है। आपके लिए यह सब बातें अहम हैं। क्योंकि ऐसा नहीं है?

हकीकत कहीं ज्यादा जटिल है। लेकिन इसके साथ चेतावनी यह है अगर अर्थव्यवस्था खराब दौर से गुजर रही है तो यह आशंका रहती है कि आखिरकार इसका असर कंपनियों पर पड़ेगा। लेकिन असल में ऐसा नहीं होता है। पिछले कई दशकों के दौरान जब भी किसी तरह का संकट आया है तो देखने को यही मिला है कि बेहतर कंपनियां और बेहतर प्रदर्शन करती हैं। ऐसा इसलिए होता है कि संकट की प्रकृति चाहे कुछ भी हो, बेहतर कंपनियों पर इस संकट का असर बहुत कम होता है और वे ज्यादा मजबूती से रिकवर करती है। एक बार संकट खत्म हो जाने के बाद इन कंपनियों की स्थिति स्पर्धियों से काफी बेहतर हो जाती है। हमने 2000-2001 में तेज गिरावट आने पर आईटी कंपनियों के साथ ऐसा ही देखा है।

इसके अलावा 2007-2008 में सभी तरह की कंपनियों के साथ ऐसा ही हुआ था। और अब चीनी वायरस के दौर में भी ऐसा ही देख रहे हैं। इक्विटी निवेशक स्वभाव से ही आशावादी होते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो उन्होंने अपनी रकम पब्लिक सेक्टर बैंकों के फिक्स्ड डिपाजिट में लगाई होती। इसके बजाय हम Stocks खरीदते हैं। इसका मतलब है कि बुनियादी तौर पर हम यह मानते हैं कि आने वाला कल आज से बहुत बेहतर हो सकता है। इसी के साथ, हम इक्विटी निवेशक मानते हैं कि बड़ा मुनाफा कमाने का मौका बनाने के लिए थोड़ा जोखिम उठाना लेना बेहतर है।

सामान्य तौर पर इक्विटी इंवेस्टिंग का मतलब इकोनॉमी की दिशा और ग्रोथ पर दांव लगाना है। अगर आप सोचते हैं कि बाधाओं के बीच लोगों की संपन्नता बढ़ेगी और कंपनियां आज की तुलना में ज्यादा रकम बनाएंगी तो आप इक्विटी निवेशक बनने के लिए सही व्यंक्ति हैं।

जब हम 2007- 2009 या मौजूदा महामारी जैसे बड़े वित्तीय संकट का सामना करते हैं तो बहुत से लोग सवाल करने लगते हैं कि क्या हम किसी बड़े संकट में फंस गए हैं और क्या सबकी कमाई घटने ही वाली है? लेकिन आशावादी व्यक्ति ऐसा नहीं सोचता है। वह जानता है कि चीजें सही होंगी और जीवन आगे बढ़ेगा। सेवाओं और वस्तुओं का उत्पादन बढ़ेगा। रकम का भुगतान होगा, नई पूंजी बनेगी, कंपनियां फलेंगी-फूलेंगी। अगर ऐसा है तो चीजें बेहतर होंगी और समस्या सिर्फ अच्छी कंपनियों को चुनने की होगी। इस बात पर भरोसा करने वाले आप अकेले नहीं हैं।

एक दिन मैंने अखबार में एक कॉलम पढ़ा। उसमें बताया गया था कि भारतीय स्टार्ट-अप में विदेशी फंडिंग स्त्रोत से बड़े पैमाने पर रकम आ रही है। इस वर्ष के शुरुआती सात महीनों यानी जनवरी-जुलाई, 2021 में इस स्त्रोत से 20 अरब डालर की रकम आई है। यह भारत की जीडीपी का 0.7 फीसद है और इसे कम अवधि में खर्च किया जाएगा। इस रकम का एक बड़ा हिस्सा तमाम तरह के खर्च के तौर पर जाएगा जो टेक कंपनियां करेंगी। और इसका एक बड़ा हिस्सा इंडिविजुअल्स की जेब में जाएगा। यह एक तरह का प्रोत्साहन है, जो अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा। अर्थव्यवस्था को इस समय इसकी बहुत जरूरत भी है। वायरस संकट के दौरान पेशेवरों द्वारा खराब तस्वीर पेश करने के भरपूर प्रयासों के बावजूद कम अवधि के लिए कुछ खास सेक्टर्स को छोड़ दे तो निराशा का कोई आधार नहीं है। यह ऐसा विचार है, जिसके साथ इक्विटी निवेशक सहज हैं।

(लेखक वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन डॉट कॉम के सीईओ हैं। प्रकाशित विचार लेखक के निजी हैं।)

Edited By: Ankit Kumar