नई दिल्ली (बिजनेस डेस्क)। अधिकांश उत्पादों में आमतौर पर ज्यादा से ज्यादा फीचर्स को अच्छा माना जाता है। फिर चाहे कार, मोबाइल फोन या मकान हो, ज्यादा फीचर होने से माना जाता है कि उत्पाद बेहतर होगा। लेकिन जब बात बचतकर्ताओं और निवेशकों के लिए वित्तीय उत्पादों की आती है तो फीचर्स के लिए आकर्षण समस्या पैदा करता है क्योंकि इससे उत्पाद में अस्पष्टता और पेचीदगी आने लगती है। समस्या उस समय और बढ़ जाती है जब ज्यादा से ज्यादा फीचर्स की बीमारी म्यूचुअल फंड एसआइपी (सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) जैसे वित्तीय उत्पादों में बढ़ती है। जब इन उत्पादों का अस्तित्व ही सरलता पर निर्भर करता है तो यह समस्या और गंभीर हो जाती है।

अत्यधिक पेचीदा विश्लेषण में उलझकर अहम बिंदुओं को नजरंदाज करना बहुत आसान होता है। कुछ हफ्तों पहले मुझे एक निवेशक से एक ईमेल मिला। उस व्यक्ति ने लिखा कि उसने कहीं एक लेख पढ़ा था कि अगर कोई मासिक एसआइपी की राशि हर साल दस फीसद बढ़ाता है तो मैच्योरिटी पर कुल रकम 45 फीसद बढ़ जाएगी। वह निवेशक जानना चाहता था कि क्या यह बात सही है और अगर ऐसा है तो क्या यह राशि हर साल सामान्य वृद्धि के साथ बढ़ाई जाए या फिर चक्रवृद्धि (कंपाउंडिंग) आधार पर बढ़ाई जाए। मैं इस मेल में पूछ गए सवाल के बारे में निश्चित नहीं हूं कि उत्तर क्या दिया जाए।

इस सवाल का एक अच्छा पहलू है कि जमाकर्ता निवेश को गंभीरता से लेते हैं और बारीकी से समझने का प्रयास करते हैं कि उन्हें क्या करना है। वे यह समझने के लिए उत्सुक हैं कि उसका असर क्या होगा। लेकिन इसके दूसरे पहलू में समस्या भी है क्योंकि निवेश को लेकर एक तरह की रूढ़िवादिता भी दिखाई देती है। कोई अपने इर्द-गिर्द पूरी स्थिति को समझे बगैर गणितीय कुशलता का अत्यधिक इस्तेमाल कर रहा है। इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए पहला तरीका है कि सीधे तौर पर गणित का सहारा लिया। सीधे गणना पर भी ध्यान न दिया जाए तो भी एक बात स्पष्ट है और कोई भी इससे इन्कार नहीं कर सकता है कि अगर आप ज्यादा निवेश करते हैं तो आपको ज्यादा फायदा होगा। लेख में भी इसी मूल सवाल को पाठकों को समझाने का प्रयास किया गया है।

लेकिन बड़ी समस्या वह सोच है कि किसी भी उथल-पुथल भरे असेट (म्यूचुअल फंड या कोई अन्य निवेश प्रपत्र) में ज्यादा निवेश करके कॉस्ट एवरेजिंग करने के अत्यंत सरल सिद्धांत को बड़ा चमत्कार मान लिया जाए। एसआइपी के पीछे भी यही सिद्धांत है कि बाजार की स्थितियों का अध्ययन किए बगैर आपको शेयर आधारित म्यूचुअल फंड स्कीम में निश्चित रकम नियमित रूप से निवेश करते रहना चाहिए। लंबी अवधि के बाद आप पाएंगे कि आपने बाजार में गिरावट के समय ज्यादा यूनिट खरीदीं। जबकि बाजार में तेजी के समय कम यूनिट खरीदी गईं। इससे आपकी औसत खरीद कीमत काफी कम होगी। इस तरह अपना निवेश बाजार से निकालते समय इस बात की ज्यादा संभावना है कि आपकी रकम काफी बढ़ चुकी होगी। हालांकि इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसमें निश्चित रिटर्न की भी कोई उम्मीद नहीं है। कल्पना कीजिए, अगर शेयर बाजार लंबी अवधि में ज्यादातर समय स्थिर रहता है या गिरावट आती है, तो एसआइपी का यह सिद्धांत लागू नहीं होगा। लेकिन वास्तविक तौर पर होता यही है कि अगर बाजार में भारी उथल-पुथल रहती है और कुल मिलाकर वृद्धि का रुख रहता है तो लंबी अवधि में आप फायदा पाने में सफल होंगे।

लेकिन किसी एसआइपी की वैल्यू गणित नहीं है बल्कि यह मनोविज्ञान है। बाजार में कब निवेश करना है, कब नहीं करना है और सर्वोत्तम निवेश का अवसर गंवाने की चिंता किए बगैर शेयर बाजार से रिटर्न हासिल करने का सबसे अच्छा और सबसे आसान तरीका एसआइपी है। इसका गणित एकदम सरल है कि आप निश्चित रकम नियमित रूप से निवेश करें तो आपको फायदा मिलेगा। लेकिन म्यूचुअल फंड मार्केट निवेशकों को लुभाने के लिए खूबियों और फीचर्स का इस्तेमाल करता है और उन्हें कई विकल्प देने का प्रयास करता है। बाजार में ऐसे अनेक एसआइपी प्लान हैं जिनमें मार्केट टाइमिंग को फीचर के तौर पर जोड़ा गया है। कई म्यूचुअल फंड कंपनियां और सलाहकार हैं जो इंडेक्स लेवल या पीई या किसी अन्य आधार पर एसआइपी की राशि कम या ज्यादा करेंगे। यह दिलचस्प है कि एसआइपी में निवेश बाजार में समय का ख्याल किए बगैर किया जाता है। इसमें बाजार की उथल-पुथल के बाद कुल खरीद लागत स्वत: ही कम हो जाती है। ऐसे में किसी अन्य अतिरिक्त चाल की गुंजाइश ही नहीं रह जाती है।

अगर एसआइपी में निवेश की कोई टेक्निक हो सकती है तो वह इसे सबसे सरल बनाए रखना है। इसमें किसी भी तक की पेचीदगी नहीं होनी चाहिए, तभी उच्चतम वैल्यू मिल सकती है। यह एसआइपी है। दूसरे शब्दों में कहें तो एसआइपी में निवेश करें और शांति से रहें।

Posted By: Pramod Kumar