नई दिल्ली, एस नरेन। देश भर में बढ़ते कोरोना संक्रमण के साथ ही भारतीय शेयर बाजार में भारी दबाव का आलम दिखा है। लगातार बढ़ते संक्रमण से पैदा हालातों ने अभी शक्ल ही लेनी शुरू की है, इसिलए आने वाले कुछ समय में मार्केट का सेंटिमेंट कमजोर ही रहने वाला है। चूंकि एक साल पहले भी हम इस तरह के हालात से गुजर चुके हैं, इसलिए हमारा मानना है कि कॉरपोरेट सेक्टर और निवेशक, दोनों अब आने वाली चुनौतियों से बेहतर तरह से निपटने की स्थिति में हैं।

हमें उम्मीद है कि आने वाले कुछ समय में कोरोना संक्रमण की रफ्तार की तुलना में वैक्सीनेशन की रफ्तार तेज होगी। भारत में भी वैक्सीनेशन विकसित देशों की तरह ही रफ्तार पकड़ सकेगी।

एक बार महामारी के नियंत्रण में आते ही बाजार में रिकवरी तेज हो जाएगी। हमारा मानना है कि हम इकनॉमिक रिकवरी का चक्र देख सकते हैं, क्योंकि अमेरिकी केंद्रीय बैंक यानी फेडरल रिजर्व को हम आगे लगातार ऐसा रुख अपनाते देख सकते हैं, जिससे इसे समर्थन मिलता रहे।

लेकिन यह दौर ज्यादा देर तक टिकने वाला नहीं लगता, क्योंकि बाजार को कोरोना की चुनौतियों के अलावा फेडरल रिजर्व की ओर से बढ़ाई गई ब्याज दरों का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा फेडरल रिजर्व की ओर से क्वांटेटिव इजिंग को वापस लेने की स्थिति में भी हालात मुश्किल भरे हो सकते हैं। इनमें से कोई भी स्थिति अमेरिकी और पूरे ग्लोबल मार्केट को पटरी से उतार सकती है। 

चूंकि हम एक ग्लोबल दुनिया में रहते हैं, इसलिए शेयर बाजार की स्थिति के लिए सिर्फ स्थानीय हालात ही नहीं बल्कि ग्लोबल हालात भी जिम्मेदार होते हैं। इसलिए ग्लोबल हालात में बदलाव के साथ भी भारतीय मार्केट में भी करेक्शन दिखने को मिल सकता है, लेकिन यहां से निश्चित तौर पर ऊंची वोलेटिलिटी के लिए जगह बनती दिखती है। निवेशक इस जोखिम से सिर्फ डायनेमिक एसेट एलोकेशन के जरिये ही निपट सकते हैं।

जहां तक मैक्रो इकोनॉमिक हालात जैसे, महंगाई का सवाल है, तो इसमें थोड़ी सी तेजी चिंता की बात नहीं है। इतिहास में अगर देखें तो पाएंगे कि अगर महंगाई ऐसी है, जिसे नियंत्रित किया जा सकता है, तो इससे आर्थिक गतिविधियों में तेजी आती है। ऐसे समय में चीजों की बिक्री ज्यादा होती है। इसका हाल का उदाहरण रियल एस्टेट सेक्टर की बिक्री में आई तेजी है। इससे महंगाई को कारोबारी लेनदेन या ट्रांजेक्शन या इसे बढ़ाने में नकारात्मक चीज नहीं मानना चाहिए। 

इस वक्त हम चुनिंदा बैंकों, बिजली, टेलीकॉम, सॉफ्टवेयर और मेटल सेक्टर को लेकर सकारात्मक हैं। हमारा मानना है कि कोविड के बाद आईटी तमाम सेक्टरों में एक ऐसा सेक्टर है, जिसके शेयरों ने पिछले साल की तुलना में अपनी री-रेटिंग करवाई है।

सवाल यह है कि मौजूदा कीमतों पर इसने कितनी बढ़त हासिल की है। इसके अलावा हमारा यह भी मानना है कि कमोडिटी कंपनियों की ओर से प्रदर्शन की अच्छी गुंजाइश बनी हुई है। हम मानते हैं कि काफी समय से किसी भी कमोडिटी में पर्याप्त निवेश नहीं हुआ है। इसलिए कमोडिटी शेयरों में तेजी की पर्याप्त संभावना है। इस वक्त कमोडिटी से जुड़ी किसी भी इंडस्ट्री में शायद ही कोई बड़ा निवेश दिख रहा है।

इस वक्त जो निवेशक शेयरों में निवेश का एक्सपोजर चाहते हैं वह लंबी अवधि ( कम से कम दस साल) को ध्यान में रखते हुए एसआईपी के जरिये म्यूचुअल फंड में निवेश कर सकते हैं। जो लोग पांच साल से कम निवेश अवधि का चुनाव करना चाहते हैं वे हाइब्रिड किस्म की स्कीमों जैसे एसेट अलोकेशन स्कीम या बैलेंस्ड एडवांटेज कैटेगरी में निवेश कर सकते हैं।

इस कैटेगरी के फंड बाजार के उतार-चढ़ाव और इसके बदलते माहौल का फायदा लेने के हिसाब से अच्छी स्थिति में होते हैं। इसमें फंड मैनेजरों के पास इक्विटी और डेट के बीच एसेट आवंटित करने के लिए काफी गुंजाइश होती है। उन्हें डेट और इक्विटी की बेहतर स्थिति के आधार पर दोनों के बीच एसेट आवंटित करने में लचीलेपन का लाभ मिल जाता है।

(लेखक आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एएमसी के ईडी और सीआईओ हैं। प्रकाशित विचार उनके निजी हैं।)