करीब एक दशक तक हस्तक्षेप नहीं करने की नीति के बाद आखिर बाजार नियामक सेबी ने म्यूचुअल फंड के वर्गीकरण की व्यवस्था तैयार की है। फंड के नियमन की दिशा में यह बड़ा कदम है, हालांकि इसे भी 100 फीसद संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है। देश में 2,043 म्यूचुअल फंड हैं और सभी प्लान, ऑप्शन, वैरिएंट को जोड़ें तो कुल 9,680 विकल्प बनते हैं। वर्गीकरण करते हुए इनमें चुनाव की प्रक्रिया को आसान किया जा सकता है।

सेबी की नई व्यवस्था में इन सब को 36 श्रेणियों में विभाजित किया गया है। निश्चित रूप से 9,680 विकल्पों की तुलना में 36 श्रेणियों में से चुनाव काफी हद तक आसान हो जाता है। हालांकि सेबी की यह व्यवस्था भी जटिलता को पूरी तरह से खत्म नहीं करती है। शून्य से शुरुआत करने की कोशिश में लगे निवेशक के लिए 36 की संख्या भी बहुत ज्यादा है। इस स्थिति में कुछ बातों का ध्यान रखते हुए सेबी की नई व्यवस्था का लाभ उठाया जा सकता है।

निसंदेह विभिन्न फंड को श्रेणियों में बांटने के पीछे मूल विचार यही है कि लोग अपनी जरूरत के हिसाब से निवेश कर सकें। इस तरह का वर्गीकरण करने से निवेशक अपनी जरूरत के लायक श्रेणी का चयन कर पाता है और फिर उसी श्रेणी के विभिन्न फंड की तुलना करता है। भारत में वैल्यू रिसर्च इस तरह के वर्गीकरण में लंबे समय से मददगार बना हुआ है। इस दिशा में लगातार बदलाव करते रहने की जरूरत होती है, क्योंकि अलग-अलग तरह के ढेरों फंड लगातार लॉन्च हो रहे हैं।

ज्यादातर फंड कंपनियां इस बात की कोशिश करती हैं कि उनके फंड का वर्गीकरण ना हो सके। ऐसा होने से उस फंड की तुलना भी किसी दूसरे फंड से करना आसान नहीं रह जाता है। इसके अलावा एक परेशानी यह भी है कि फंड कई बार अपने निवेश के तरीके बदल भी लेते हैं। उदाहरण के तौर पर संभव है कि कोई निवेशक लार्ज कैप फंड में निवेश करे और कुछ समय बाद उसे पता चले कि वह फंड ज्यादा रिस्क वाला मिड कैप फंड बन चुका है।

सेबी के नए नियमन के बाद ऐसी ढेरों समस्याएं दूर हो रही हैं। अब किसी भी फंड के लिए आधिकारिक रूप से घोषित एक श्रेणी होगी। उसके निवेश का निश्चित तरीका पहले से तय होगा। इसका अर्थ है कि उस फंड का नाम ही नहीं बल्कि उसके काम करने का तरीका भी हमेशा एक जैसा बना रहेगा। ऐसे में यह भी निश्चित हो सकेगा कि उस फंड की तुलना किन अन्य फंड से की जा सकती है। सेबी ने एक जटिल व्यवस्था को थोड़ा नियमित किया है। हालांकि जटिलता अब भी बाकी है।

फंड के ढेर से निपटने और अपने निवेश का लक्ष्य हासिल करने का एक तरीका है: फंड की लगभग सभी श्रेणियों को नजरअंदाज कर दीजिए। सीधे शब्दों में कहें तो यदि आप व्यक्तिगत निवेशक हैं और आपका लक्ष्य भी आम लोगों जैसा ही है, तो आप इन 36 में से आसानी से 32 श्रेणियों को नजरअंदाज कर सकते हैं। इसके बाद बचती हैं सिर्फ चार श्रेणियां: लंबी अवधि की बचत के लिए मल्टी कैप, मीडियम टर्म बचत के लिए एग्रेसिव हाइब्रिड फंड, लंबी अवधि की बचत और टैक्स बचाने के लिए ईएलएसएस और बैंक के फिक्स्ड डिपॉजिट के विकल्प के रूप में शॉर्ट टर्म डेट फंड। बस इतना ही।

यह करना बहुत आसान नहीं है क्योंकि सेबी की ओर से तय 36 श्रेणियों की अपनी खूबियां हैं। निश्चित तौर पर अन्य श्रेणियों में भी कई फंड बेहतर हो सकते हैं। लेकिन अगर आप अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए एक आसान प्लान चाहते हैं, तो यह बेहतर रहेगा। इन चार श्रेणियों से आपकी सामान्य जरूरतें पूरी हो जाएंगी। यह थोड़ा अजीब लगता है, लेकिन आपकी जरूरतों को पूरा करते हुए यह आपके निवेश को बेहद आसान कर देगा।

म्यूचुअल फंड की जटिल संरचना को आसान करने की दिशा में बाजार नियामक सेबी ने बड़ा कदम उठाया है। सेबी ने तमाम म्यूचुअल फंड को कुल 36 श्रेणियों में बांटने की व्यवस्था दी है। इससे विभिन्न म्यूचुअल फंड की एक-दूसरे से तुलना करना संभव होगा। इस वर्गीकरण से नए निवेशकों के लिए रास्ता काफी आसान हुआ है। इसे और भी आसान किया जा सकता है। आमतौर पर नए निवेशक इन 36 श्रेणियों में से 32 को नजरअंदाज कर सकते हैं। सामान्य लक्ष्य के साथ निवेश करने वालों के लिए चार श्रेणियां ही पर्याप्त हैं। इस तरीके को अपनाकर निवेशक म्यूचुअल फंड निवेश की जटिल प्रक्रिया से आसानी से पार पा सकते हैं।

(इस लेख के लेखक वैल्यू रिसर्च के सीईओ धीरेंद्र कुमार हैं।)

Posted By: Praveen Dwivedi