नई दिल्‍ली, डॉ. भरत झुनझुनवाला। रियल एस्टेट क्षेत्र को मुश्किलों से उबारने के लिए केंद्र सरकार ने 25,000 करोड़ रुपये की राहत देने वाली योजना पेश की है। अहम सवाल यह है कि क्या इससे समस्या सुलझेगी या और ज्यादा उलझ जाएगी? चलिए एक मामले से इसकी पड़ताल करते हैं। मान लीजिए कि मध्यम श्रेणी के एक बिल्डर ने 300 करोड़ रुपये में जमीन खरीदी। इस पर फ्लैट बनाकर वह उन्हें 1,500 करोड़ रुपये में बेचना चाहते थे। भूमि का मूल्य 300 करोड़, फ्लैट बनाने की लागत 900 करोड़ और उनका मुनाफा 300 करोड़ था। उन्होंने 1,200 करोड़ के फ्लैट बेच दिए। इसमें प्राप्त 1,200 करोड़ में से 600 करोड़ उन्होंने परियोजना को पूरा करने में खर्च कर दिए। वहीं 600 करोड़ से अपने अगले प्रोजेक्ट के लिए जमीन खरीद ली, लेकिन प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए 900 करोड़ की जरूरत थी। वह प्रोजेक्ट पूरा नहीं कर सके। 

इसी बीच नोटबंदी और रियल एस्टेट का नया कानून रेरा लागू हो गए। बाजार से काला धन गायब हो गया। प्रॉपर्टी की मांग कम हो गई। नतीजतन दाम गिर गए। उनके दोनों प्रोजेक्ट फंस गए। ऐसा इसलिए, क्योंकि वह पुरानी परियोजना के शेष 300 करोड़ रुपये के फ्लैट नहीं बेच पाए। वहीं बाजार में गिरी कीमतों के चलते नया प्रोजेक्ट भी अधर में लटक गया। उसके लिए जमीन खरीदने पर खर्च किए गए उनके 600 करोड़ रुपये भी फंस गए। 

मेरे हिसाब से इसमें बिल्डर की ‘गलती’ सिर्फ इतनी थी कि उन्होंने 900 करोड़ के जो फ्लैट बेचे, उनसे नई भूमि को पहले खरीदा और प्रोजेक्ट को पूरा बाद में करने का फैसला किया, लेकिन ध्यान रहे कि तब बिल्डरों में यही तौर-तरीका प्रचलित था।

इस पृष्ठभूमि में सरकार ने योजना बनाई है कि अटकी हुई परियोजनाओं को वित्तीय सहायता देकर उन्हें उबारा जाए। जैसे उपरोक्त मामले में किसी परियोजना को पूरा करने के लिए बिल्डर को 300 करोड़ रुपये की दरकार है। वह यह रकम नहीं जुटा पा रहे। ऐसे में सरकारी मदद से मिलने वाली रकम से वह अपनी परियोजना पूरी कर सकते हैं। इससे खरीदारों को भी उनके फ्लैट मिल जाएंगे। इस तरह तमाम अटकी हुई परियोजनाओं की नैया पार लग जाएगी। 

यह सही कदम होगा, लेकिन इससे प्रॉपर्टी क्षेत्र की समस्या और गहराएगी। कारण यह कि बिल्डर प्रोजेक्ट को पूरा करेगा और 300 करोड़ के नए फ्लैट बाजार में उपलब्ध हो जाएंगे। बाजार में पहले से ही काफी अधिक आपूर्ति है। जानकारों के अनुसार देश में तकरीबन 13 लाख करोड़ रुपये के अनबिके मकान ग्राहकों की बाट जोह रहे हैं। इसमें 300 करोड़ रुपये जैसी और संपत्तियों के दाम और जुड़ जाएंगे। इससे दाम और घटेंगे जिससे संपत्ति बाजार का संकट और बढ़ता जाएगा। ऐसी स्थिति में रेरा कानून के क्रियान्वयन पर विचार करना चाहिए। 

समस्या यही है कि यदि बिल्डर प्रोजेक्ट को पूरा नहीं करता और खरीदार विवाद खड़ा करते हैं तो मामला अदालत में जाएगा और हमारी न्याय प्रणाली में त्वरित न्याय नहीं मिलता। इससे मामला लटकेगा। बिल्डर पर ब्याज का बोझ बढ़ेगा तो खरीदार की रकम भी फंसी रहेगी।

यहां हमें चीन से सबक लेना चाहिए। एक भारतीय उद्यमी ने बताया कि चीन में किसी उद्यमी की फैक्ट्री की भूमि का सरकार को अधिग्रहण करना था। चूंकि वहां हवाई पट्टी बननी थी और सरकार द्वारा उद्यमी को नोटिस दिया गया कि वह छह महीने में अपनी फैक्ट्री हटा लें। इसके बाद अधिकारियों की एक टीम उनके पास चर्चा के लिए गई। उद्यमी ने कहा कि फैक्ट्री की मौजूदा लागत 10 करोड़ युआन है और नए स्थान पर यही फैक्ट्री लगाने के लिए 13 करोड़ युआन की जरूरत है। सरकारी टीम ने उन्हें तुरंत 14 करोड़ युआन दे दिए और एक करोड़ युआन की घूस ले ली। शेष 13 करोड़ युआन से उद्यमी ने दूसरे स्थान पर अपनी फैक्ट्री लगा ली। 

भारत में भी ऐसी त्वरित व्यवस्था बनानी चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि उसमें घूस न ली जाए। संकट में पड़े प्रोजेक्ट के लिए सरकार को खरीदारों, बिल्डरों और बैंकों के साथ मिलकर निर्णय करना चाहिए। तीनों पक्षों को मजबूर करना चाहिए कि वे अपने एक अंश का घाटा वहन करें। इससे प्रोजेक्ट पूरे हो जाएंगे और मामला समाप्त हो जाएगा।

हमें समझना चाहिए कि लटके हुए प्रोजेक्ट में मूल प्रश्न पूंजी की उपलब्धता का नहीं, बल्कि प्रोजेक्ट की लागत का है जो बाजार मूल्य से ऊंची है। स्वाभाविक है कि बिल्डर लागत से कम दाम पर नहीं बेच सकते। उन्हें भी देनदारी चुकानी है। वहीं खरीदार भी समझौता नहीं करता, क्योंकि वह रेरा के तहत अपने अधिकारों को लेकर सजग है। ऐसे में बैंक और खरीदारों के दबाव में बिल्डर के पास कोई रास्ता नहीं होता कि वह प्रोजेक्ट को पूरा करके आगे बढ़े। इसीलिए तीनों पक्षों को बैठाकर सरकार को यह तय करना चाहिए कि बिल्डर, बैंक और खरीदार कितना घाटा बर्दाश्त करेंगे।

इस पर सहमति के साथ ही इसका पटाक्षेप हो जाना चाहिए। इसके लिए सरकार 25,000 करोड़ रुपये का पैकेज देकर अपने ऊपर ही बोझ बढ़ा रही है। वैसे भी इस तात्कालिक राहत से मूल समस्या हल नहीं होने वाली। असल समस्या यही है कि आज बाजार में प्रॉपर्टी की मांग कम हो गई है। सरकार को अनबिके फ्लैटों के मामले में बैंकों और बिल्डरों के साथ मिलकर चर्चा करनी चाहिए ताकि उनकी कीमतें कम होकर उनकी बिक्री की राह खुल सके। इससे हालात कुछ बेहतर तो होंगे, लेकिन काफी कुछ करने के लिए शेष है, क्योंकि स्थिति बहुत विकट है। केंद्र के 25,000 करोड़ रुपये के पैकेज से तो बाजार में आपूर्ति ही और बढ़ेगी, जबकि समस्या को सुलझाना है तो मांग में बढ़ोतरी करनी होगी।

यह मसला व्यापक आर्थिक नीति का है। सरकार की मेक इन इंडिया जैसी बड़े उद्योगों को बढ़ावा देने की नीति का परिणाम है कि आज छोटे उद्योग दबाव में हैं। वहीं खुले व्यापार की नीति से देसी बाजार सस्ते विदेशी बाजारों से पटे हैं। इससे उद्योगों पर दबाव और बढ़ रहा है। उनके द्वारा रोजगार सृजित नहीं हो रहे हैं। 

रोजगार सृजित न होने के कारण आम जनता के पास क्रय शक्ति का अभाव है। रियल एस्टेट की मांग का भी इससे सीधा सरोकार है। ऐसे में जब तक हम छोटे उद्योगों को पुनर्जीवित करने की व्यवस्था नहीं करेंगे तब तक प्रॉपर्टी की मांग में आशातीत बढ़ोतरी नहीं होगी। 

इसके लिए आर्थिक मोर्चे पर व्यापक कदम उठाने होंगे, अन्यथा 25,000 करोड़ रुपये की इस मौजूदा योजना से मकानों की आपूर्ति बढ़ेगी, प्रॉपर्टी के दाम गिरेंगे और मकान बिकेंगे नहीं। इससे संकट और गहराता जाएगा। इसलिए सरकार को लटकी हुई परियोजनाओं पर बैंकों, खरीदारों और बिल्डरों के साथ बैठकर कुछ स्थाई समाधान निकालना होगा। साथ ही अर्थव्यवस्था में छोटे उद्योग को संरक्षण देकर मांग को उत्पन्न करने के लिए प्रयास करने चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं आइआइएम, बेंगलूरु के पूर्व प्रोफेसर हैं)

Posted By: Manish Mishra

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