नई दिल्‍ली, पुष्‍पेंद्र पाल सिंह। वर्ष 2016-17 में केंद्र की मोदी सरकार ने ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ के रूप में एक बड़ी पहल की थी। इस योजना में प्रतिकूल मौसम के कारण बोआई बाधित होने या सूखे, बाढ़, तूफान या ओलावृष्टि जैसी किसी प्राकृतिक आपदा से फसल को हुए नुकसान की आर्थिक भरपाई करने का प्रावधान है। भारत में कुल 14 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से लगभग 55 प्रतिशत रकबा असिंचित है। हर साल औसतन 1.25 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में फसलें किसी न किसी प्राकृतिक आपदा की भेंट चढ़ जाती हैं। इस कारण करोड़ों किसानों की आय और आजीविका प्रभावित होती है।

2018-19 में इस योजना के अंतर्गत 5.64 करोड़ किसानों का पंजीकरण कर 30 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में 2.35 लाख करोड़ रुपये की फसलों का बीमा किया गया। आगामी वित्त वर्ष के लिए इस योजना में 15,695 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि यह एक सराहनीय योजना है, परंतु इसमें कई किस्म की शिकायतें आने के बाद केंद्र ने अब इस योजना में कई बदलाव किए हैं। इन संशोधनों से पहले इस योजना में संस्थागत ऋण लेने वाले किसानों को अनिवार्य रूप से सम्मिलित करने का प्रावधान था। इस बाबत किसानों की शिकायत थी कि बगैर उनकी सहमति के आवश्यकता न होने पर भी उन्हें फसल बीमा दिया जा रहा है और बिना सूचना के उनके खाते से प्रीमियम की राशि भी काट ली जाती है। अक्सर उन्हें अपनी फसल का बीमा होने की जानकारी भी नहीं होती। अत: किसान बीमा होते हुए भी इसके लाभ से वंचित रह जाते थे। 

अब आगामी खरीफ सीजन से इस योजना में बीमा स्वैच्छिक कर दिया गया है। इस लिहाज से यह एक बड़ा सुधार हुआ है। हालांकि समस्याएं और भी हैं। जैसे योजना के अंतर्गत पंजीकृत किसानों में से अभी लगभग 58 प्रतिशत ऋणी किसान ही हैं। अब सरकार को यह देखना होगा कि स्वैच्छिक होने के कारण यदि इसमें किसानों की संख्या कम होती है तो कहीं बीमा कंपनियां प्रीमियम अनावश्यक रूप से बढ़ा न दें।

इस योजना में खरीफ फसलों के लिए बीमा राशि का दो प्रतिशत, रबी फसलों के लिए डेढ़ प्रतिशत और वाणिज्यिक-बागवानी फसलों के लिए पांच प्रतिशत प्रीमियम राशि किसानों द्वारा देय है। शेष राशि का भुगतान केंद्र तथा राज्य सरकार को बराबर-बराबर करना होता है। 

अब केंद्र ने एक और सुधार करते हुए अपने हिस्से की प्रीमियम राशि को गैर-सिंचित क्षेत्रों के लिए अधिकतम 30 प्रतिशत और सिंचित क्षेत्रों के लिए अधिकतम 25 प्रतिशत प्रीमियम तक ही सीमित करने का निर्णय लिया है। जैसे यदि पहले गैर-सिंचित क्षेत्र की किसी खरीफ फसल का एक लाख रुपये का बीमा और प्रीमियम 40 प्रतिशत होता तो 40 हजार रुपये प्रीमियम बनता। इसमें से किसान दो प्रतिशत के हिसाब से दो हजार रुपये देता, बाकी 38 हजार का केंद्र एवं राज्य सरकार बराबर-बराबर यानी उन्नीस-उन्नीस हजार रुपये भुगतान करतीं, परंतु अब केंद्र केवल 30 प्रतिशत अंशदान देगा। अत: अब किसान को पहले की तरह दो हजार रुपये, केंद्र को 14 हजार और राज्य सरकार को 24 हजार रुपये देने होंगे।

2018-19 में राष्ट्रीय स्तर पर फसलों का औसत प्रीमियम लगभग 12.32 फीसद रहा। इसे देखते हुए 30 फीसद सीमा भी कम नहीं और इसमें अधिकांश फसलों का बीमा आसानी से हो जाएगा। कुछ अपरिहार्य कारणों से इससे अधिक प्रीमियम भी हो सकता है, परंतु केंद्र द्वारा एक सीमा तक ही प्रीमियम वहन करने के निर्णय से कंपनियों की अत्यधिक प्रीमियम वसूलने की प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगेगा।

ऋणी किसान को अनिवार्य बीमा देने से कंपनियों को कम जोखिम वाली फसलों से भी प्रीमियम की बड़ी राशि मिल जाती थी। हालांकि, अब स्वैच्छिक होने से केवल उन्हीं किसानों से प्रीमियम मिलेगा जिनकी फसलों को वास्तविक जोखिम होगा। इस कारण कंपनियां बहुत सोच-समझ कर ही इस क्षेत्र में काम करेंगी।

केंद्र ने अब इसमें एक सुधार यह भी किया है कि अपने क्षेत्र और फसलों के अनुसार जोखिम को देखकर बीमा लेने की सुविधा भी दी है। अब किसान उन्हीं आपदाओं के लिए बीमा ले सकते हैं जिनसे उनके क्षेत्र में नुकसान होने की ज्यादा आशंका रहती है। उन्हें सभी तरह के कारकों के लिए बीमा लेने और प्रीमियम भरने की आवश्यकता नहीं। अत: जोखिम कारक कम होने से प्रीमियम राशि भी कम होने की आशा है।

वहीं, केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर राज्यों में फसल बीमा को बढ़ावा देने के लिए अपने प्रीमियम अंशदान को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 90 प्रतिशत कर दिया है। इससे एक तो उन राज्यों पर बहुत अधिक आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा और दूसरा फसल बीमा का लाभ भी अधिकांश किसानों तक पहुंचेगा। इसके अलावा सरकार सभी हितधारकों से परामर्श कर ज्यादा जोखिम और अधिक प्रीमियम वाले क्षेत्रों और फसलों के लिए अलग योजना भी तैयार करेगी।

कुछ राज्य सरकारें बीमा कंपनियों को अपने हिस्से के प्रीमियम भुगतान में विलंब कर देती हैं। इस कारण भी किसानों को अपने नुकसान के दावों का भुगतान नहीं हो पाता। केंद्र ने खरीफ के लिए अगले साल 31 मार्च और रबी के लिए अगले साल 30 सितंबर तक प्रीमियम भुगतान की अंतिम तिथि का प्रावधान किया है। इस तिथि तक भुगतान करना अनिवार्य होगा। ऐसा न करने पर अगले सीजन से उस राज्य में यह योजना कार्यान्वित नहीं होगी। इससे आशा है कि किसानों के दावों का भुगतान अब समय से हो सकेगा।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में 2016-17 से 2018-19 के बीच तीन वर्षो में सभी पक्षों द्वारा 76,331 करोड़ रुपये प्रीमियम कंपनियों को अदा किया गया। इस अवधि में किसानों को 60,000 करोड़ रुपये बीमा दावों का भुगतान मिला। यदि सभी खर्चे जोड़ दिए जाएं तो ऐसा नहीं लगता कि कंपनियों को बहुत अधिक लाभ मिला हो। प्रीमियम और दावों के भुगतान के अब तक के आंकड़े बता रहे हैं कि किए गए सुधारों को यदि ठीक नीयत से जमीन पर उतारा गया तो यह सफल योजना साबित हो सकती है।

(लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं। प्रकाशित विचार उनके निजी हैं।)

Posted By: Manish Mishra

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