नई दिल्ली, धीरेंद्र कुमार। हर समाज में दादी-नानियों के किस्से और नसीहतें सदियों से पीढ़ियों को मुसीबतों से निपटने के सरल और सहज मंत्र देती रही हैं। लेबनानी-अमेरिकी सांख्यिकी गणितज्ञ, शेयर बाजारों के जानकार और चिंतक नासिम निकोलस तालेब के मुताबिक उनमें से बेहद मशहूर नसीहत यह है कि हर किसी को मुसीबत के वक्त के लिए कुछ रकम बचाकर रखनी चाहिए। हालांकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनियाभर के देशों ने इसे करीब-करीब भुला दिया और समकालीन अर्थशास्त्रियों की सुनते हुए जमकर कर्ज लिए। इससे बुरे वक्त के लिए उनकी तैयारियों पर गंभीर असर पड़ता दिखा है। नवीनतम ग्लोबल संकट कोरोना ने इन तैयारियों की करीब-करीब पोल खोल दी है। वैसे, तालेब के मुताबिक कोरोना ने एक और काम किया है। वह यह, कि अब दुनियाभर के देश अगली संभावित महामारी को सार्स, इबोला और ऐसे अन्य वायरस आक्रमण की तरह हल्के में नहीं लेंगे बल्कि समय पर उससे निपटने में जुट जाएंगे। कोरोना से मिली शायद यही सबसे बड़ी सीख है।

वर्ष 2001 में नासिम निकोलस तालेब की किताब 'फूल्ड बाई रैंडमनेस' प्रकाशित हुई थी। मैं उसी समय से उनका प्रशंसक हूं। पिछले सप्ताह आदित्य बिड़ला म्यूचुअल फंड ने तालेब के साथ सवाल-जवाब का एक सत्र आयोजित किया था। मुझे इस सवाल-जवाब के सत्र में शामिल होने से काफी खुशी हुई। तालेब के पहले टॉक शो की तरह इस बार न्यूज बाइट का माहौल नहीं था। यह टीवी पर नहीं था। ऐसे में कोई जल्दी नहीं थी। और विज्ञापनों के लिए बार-बार ब्रेक लेने की जरूरत भी नहीं थी। यहां पर तालेब अपनी पूरी लय में थे और बिना समय गंवाए सीधे सबसे अहम बातों पर अपनी राय रख रहे थे।

तालेब ने अपनी किताबों में अक्सर ही वैश्विक महामारियों की बात की है और इसे मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है। इस सत्र की शुरुआत में ही तालेब ने इस बात की चर्चा की कि इस महामारी का असर क्या और क्यों होगा। तालेब ने अपने ही अंदाज में ऑडियंस को लगभग झकझोरते हुए हुए कहा कि एक असर यह होगा कि हम अगली महामारी से निपटने के लिए बेहतर तरीके से तैयार होंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि पिछले दो दशकों में सार्स, मर्स, इबोला और स्वाइन फ्लू ने समय-समय पर चेतावनी दी लेकिन मानवता ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। पहले की बीमारियों में लोग किसी तरह से बड़े खतरे से बच गए। शायद इसीलिए उन्हें इस बार भी लगता रहा कि हम हर बार की तरह बच जाएंगे। लेकिन इस बार हम इतने भाग्यशाली नहीं रहे। 

अब कोविड--19 का सामना करने के बाद हम भविष्य की सभी संभावित संक्रामक बीमारियों पर शुरुआत से ध्यान देंगे। आमतौर पर हर बार जब भी कोई बड़ा संकट आता है तो हम उसके बाद आने वाले संकट से निपटने के मामले में और बेहतर हो जाते हैं। मुझे पूरा भरोसा है कि तालेब सही हैं। लेकिन पूरी गंभीरता के साथ अगली महामारी के बारे में बात शुरू होने से ऑडिएंस एकदम सतर्क हो गए और उनकी बातों को गौर से सुनना शुरू कर दिया। तालेब ने एक बेहद अहम बात कही कि हमें पहले की बीमारियों से सबक लेते हुए शुरुआत में ही नुकसान को कम करने की कोशिशें करनी चाहिए। हमें उसी समय कड़े कदम उठा लेने चाहिए थे, जब महामारी की शुरुआत ही हुई थी।

इस वर्ष 26 जनवरी को तालेब ने अमेरिकी भौतिकशास्त्री यनीर बार-यम और डाटा साइंटिस्ट जोसफ नॉरमन के साथ मिलकर एक पेपर 'सिस्टमेटिक रिस्क ऑफ पैनडेमिक वाया नोवेल पैथोजेनस -कोरोनावायरस' प्रकाशित किया था। इस पेपर में कहा गया था कि ये टिप्पणियां मौजूदा और संभावित महामारी के प्रसार को लेकर सतर्क रवैया अपनाने की जरूरत पर जोर देती हैं। इसमें महामारी के प्रसार के शुरुआती चरण में ही लोगों के आवागमन पर रोक लगाना या सीमित करना शामिल है। खास कर उस समय जब आप वायरस के बारे में बहुत कम जानते हैं। कम अवधि के लिए लोगों के आवागमन पर अंकुश लगाने की कुछ कीमत हमें चुकानी होगी लेकिन ऐसा नहीं कर पाने पर हम सब कुछ गंवाने की स्थिति में आ जाएंगे। अगर अभी ऐसा नहीं होगा तो भविष्य में आने वाली महामारी से बचने में बड़ी चुनौतियां पेश आएंगी।

सबसे अहम बात यह है कि ये चीजें उस समय लिखी गईं थी जब दुनिया में कोविड के सिर्फ 2,800 मामले सामने आए थे। इनमें से लगभग सारे के सारे वुहान में ही थे। उस समय तालेब एंड कंपनी ने जो कुछ भी कहा था, उसमें से लगभग सब कुछ हर देश को करना पड़ा लेकिन तब तक शायद देर हो चुकी थी। नुकसान को शुरुआत में ही नियंत्रित करने की बात स्टॉक इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी जैसी लगती है लेकिन यह एक ऐसा सबक है जिसे दुनिया ने बहुत बड़ी कीमत चुकाकर सीखा है।

तालेब ने एक और अहम बात तमाम सरकारों के प्रोत्साहन पैकेज पर कही। उन्होंने कहा कि सरकारों को उस तरह से काम करना चाहिए जैसे आपकी दादी रकम बचाकर रखने को कहतीं थी जिसे बुरे समय में खर्च किया जा सके। हालांकि दूसरे विश्व युद्ध के बाद सरकारों ने अर्थशास्त्रियों को सुना। उन्होंने ठीक इसका उलटा किया और जमकर कर्ज लिया। जीडीपी और कंपनियों के आंकड़ों को देखना बेकार है क्योंकि आज नहीं तो कल कोई आपदा आपके सामने आएगी और आपको ग्रोथ में कई अंकों की कटौती करनी पड़ेगी। यह चीज प्राकृतिक है। लेकिन इसे तब तक नजरअंदाज किया जाता है जब तक कि कोई आपदा न आ जाए।

दिलचस्प बात यह है कि तालेब को ऐसा नहीं लगता है कि कोविड आपदा दुनिया में आपसी संघर्ष बढ़ा देगी या व्यापार व निवेश के वैश्वीकरण को पटरी से उतार देगी। उनका मानना है कि जहां भी चीजें सस्ती मिलेंगी, लोग खरीदेंगे। और जैसा कि तालेब ने कहा कि जब वस्तुएं यानी गुड्स बॉर्डर पार करती हैं, तो सेनाएं नहीं करती हैं। अपनी अन्य दर्जनों बातों की तरह इस बात को लेकर भी तालेब सही साबित होंगे या नहीं, मुझे नहीं पता। लेकिन आज यह उसका एकदम उलटा लगता है जो अब तक तालेब कहते रहे हैं।

                                                                 (लेखक वैल्यू रिसर्च के सीइओ हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

Posted By: Ankit Kumar

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