रिटायरमेंट या सेवानिवृत्ति का दिन तय होता है और यह सिर्फ एक दिन की घटना है। लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद का जीवन दो या तीन दशक लंबा हो सकता है। इन दोनों में फर्क कर पाने में जरा सी चूक आपके सेवानिवृत्त जीवन को तमाम वित्तीय दुश्वारियों के दलदल में धकेल सकती है।

कुछ सप्ताह पहले एक लेख में मैंने लिखा था कि बचत का परंपरागत नजरिया किस तरह भारतीय बचतकर्ताओं को बुढ़ापे में गरीबी का जीवन जीने को विवश करता जा रहा है। सेवानिवृत्त जीवन के वर्षो में महंगाई दर जिंदगीभर की बचाई जमा पूंजी को बेमतलब बना देती है। ऐसे बुजुर्गो की तादाद बहुत ज्यादा है जिन्हें इन्हीं वजहों से नौकरी के दिनों की बचत बुढ़ापे के दिनों में नाकाफी लगती है। फिर एक वक्त ऐसा आता है जब उन्हें लगने लगता है कि उनके पास पैसे तो बचे ही नहीं। इससे बुरी कोई बात नहीं हो सकती कि एक वृद्ध दंपत्ति रिटायरमेंट के लंबे वर्षो में अपनी समृद्धि खो दे और धीरे-धीरे गरीब होता चला जाए। अफसोस की बात यह है कि बचत के परंपरागत नजरिये का यही अंजाम हमारे इर्द-गिर्द दिख रहा है। हमारे चारों तरफ ऐसे बुजुर्गो की कोई कमी नहीं जिन्होंने नौकरी के दिनों में तत्कालीन आकलन के हिसाब से ठीक-ठाक रकम बचाई थी, लेकिन सेवानिवृत्त जीवन के लिए वह नाकाफी साबित हुई और वे बुढ़ापे का गरीबी भरा जीवन जीने को अभिशप्त हैं।

अब सवाल यह है कि ऐसा आपके साथ नहीं हो, इसके लिए क्या किया जाना चाहिए? इससे पहले जो लेख मैंने लिखा था, उसमें नौकरीपेशा जिंदगी में पर्याप्त बचत करने और उस बचत को इक्विटी समर्थित म्यूचुअल फंड्स में निवेश करने की जरूरत पर विस्तार से चर्चा की गई थी। यह पहली सीढ़ी और बुढ़ापे में मजबूत वित्तीय स्थिति की बुनियाद है। दूसरी सीढ़ी यह है कि उस निवेश से हासिल क्या हुआ और सेवानिवृत्त जीवन शुरू होने के बाद उसका उपयोग कैसे किया जाए।

अगर आप महंगाई दर के बारे में मेरे अब तक के विचारों से सहमत हैं, तो समझ ही गए होंगे कि रिटायरमेंट के बाद आपको ज्यादा से ज्यादा उतना ही खर्च करना चाहिए, जितना महंगाई दर की भरपाई करने के बाद रकम बचती है। दूसरे शब्दों में कहें, तो आपको मूलधन बचाए रखना चाहिए। और यह मूलधन अंकित मूल्य आधारित नहीं, बल्कि सही मायनों में महंगाई-समायोजित होना चाहिए।

इससे पहले कि आप आगे बढ़ें, मेरी गुजारिश है कि ठीक पहले वाला पैरा बेहद ध्यान से और आराम से एक बार फिर पढ़ें। ऐसा इसलिए, क्योंकि ऊपर वाला पैरा वित्तीय रूप से आरामदायक बुढ़ापा गुजारने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। अब सवाल यह है कि वास्तविक रूप से आप ऐसा कैसे कर सकते हैं। चलिए, इसे एक बेहद सरल उदाहरण से समझते हैं।

मान लीजिए कि आप आज एक करोड़ रुपये बचत के साथ सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इस रकम को आप किसी बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट या सावधि जमा में रख देते हैं। एक वर्ष बाद आपको ब्याज मिलाकर एक करोड़ सात लाख रुपये मिलते हैं। इसका मतलब यह है कि आपकी कमाई सात लाख रुपये हुई, जिसे आप अगले एक वर्ष के दौरान खर्च कर सकते हैं। आपको भले ही ऐसा ही लगता हो, लेकिन ऐसा है नहीं। अगर इस एक वर्ष की पांच फीसद महंगाई दर को ध्यान में रखें, तो आपका मूलधन एक करोड़ रुपये नहीं, बल्कि महंगाई दर को मिलाकर एक करोड़ पांच लाख रुपये हो गया है। इसका मतलब यह है कि अगले एक वर्ष में खर्च करने के लिए आपके पास महज दो लाख रुपये की रकम बचती है। कुल मिलाकर कहें तो आप महीने में 16,666 रुपये से ज्यादा खर्च करने की हालत में नहीं हैं।

क्या आपको लगता है कि सेवानिवृत्त जीवन जीने के लिए किसी भी मध्यमवर्गीय दंपत्ति के लिए यह रकम काफी है? बिल्कुल नहीं। कुछ बैंकों के मामले में तो आपकी कमाई और कम रह सकती है, या हो सकता है कि पोस्ट ऑफिस मंथली इनकम स्कीम के मामले में थोड़ी बेहतर हो। बुनियादी बात यह है कि जब भी आप निश्चित आय वाले निवेश का मार्ग अपनाएंगे, तो स्थिति थोड़ी बदतर या थोड़ी बेहतर, लेकिन होगी कमोबेश इसी तरह की।

यह समझना जरूरी है कि सावधि जमा या इस तरह के अन्य उपकरणों में रकम जमा करने से हालात बहुत ज्यादा नहीं बदलते, क्योंकि ब्याज दर और महंगाई दर में अक्सर कांटे की टक्कर रहती है। ऐसे में महंगाई समायोजित ब्याज दर किसी भी सूरत में डेढ़ या दो फीसद से ज्यादा नहीं होती। कुल मिलाकर कहें, तो सेवानिवृत्त जीवन जी रहे किसी मध्यमवर्गीय दंपत्ति को महीने में खर्च करने लायक 50,000 रुपये की आय के लिए कम से कम तीन करोड़ रुपये की जमा-पूंजी चाहिए।

इतना ही नहीं, उस तरह की उच्च आय के लिए आपको आयकर भी देना पड़ेगा, जिसमें करीब 30,000 रुपये सालाना की रकम चली जाएगी। यह सर्वोत्तम स्थिति है। जमीनी हकीकत यह है कि अतीत में कई ऐसे मौके आए हैं, जब लंबे समय तक बचत पर ब्याज दर के मुकाबले महंगाई दर ज्यादा रही है। सच तो यह है कि ब्याज दर शायद ही महंगाई दर को पछाड़ पाएगी, और उस पर से बचत पर आयकर आपकी कमाई को और कम करती चली जाएगी।

लेकिन इक्विटी समर्थित म्यूचुअल फंड्स का मामला बिल्कुल जुदा है। हालांकि उनमें कमाई कम-ज्यादा होती रहती है, लेकिन सावधि जमा के मुकाबले इक्विटी म्यूचुअल फंड्स की कमाई हमेशा ज्यादा होती है। कोई ऐसा वर्ष आ सकता है जिसमें इक्विटी समर्थित म्यूचुअल फंड्स की कमाई सावधि जमा की कमाई के मुकाबले कम हो। लेकिन पांच वर्ष या उससे ज्यादा की कमाई को देखें, तो इक्विटी समर्थित म्यूचुअल फंड्स की कमाई महंगाई दर के मुकाबले आराम से छह-सात फीसद तक ज्यादा होती है। उदाहरण के लिए, पिछले पांच वर्षो के दौरान ज्यादातर म्यूचुअल फंड्स ने 17 फीसद तक सालाना रिटर्न दिया है। इनमें से एक-चौथाई ने तो 20 फीसद से ज्यादा रिटर्न दिया है। हो सकता है कि किसी एक या दो वर्ष के दौरान इक्विटी समर्थित म्यूचुअल फंड्स की कमाई कम रह जाए। लेकिन अगर बुढ़ापे की पीड़ादायी गरीबी से निजात पानी है, तो इतना जोखिम उठाने के लिए तैयार रहना ही पड़ेगा।

इस तरह के फंड्स में निवेशक सालाना चार फीसद तक रकम निकालने के बावजूद मूलधन में सुरक्षित मार्जिन रख सकता है। उस पर से सुकून की बात यह है कि म्यूचुअल फंड्स में आयकर नहीं देना पड़ता, और कैपिटल गेन टैक्स भी वास्तविक निकासी का महज 10 फीसद है। कुल मिलाकर कहें, तो 50,000 रुपये मासिक आय के लिए इक्विटी समर्थित म्यूचुअल फंड्स में तीन करोड़ रुपये नहीं, बल्कि सिर्फ डेढ़ करोड़ रुपये निवेश की जरूरत होती है।

हालांकि हाल के दिनों में थोड़े ही सही, लेकिन लोग इस बात को समझने और इस मार्ग पर चलने लगे हैं। जिन लोगों को छोटी अवधि में इक्विटी समर्थित म्यूचुअल फंड्स में आने वाली अस्थिरता की परवाह नहीं, वे लंबी अवधि के फायदे के लिए म्यूचुअल फंड्स में निवेश करने भी लगे हैं। अफसोस की बात यह है कि आज भी ऐसे बुजुर्गो की तादाद कम नहीं, जो बेवजह अपनी कमाई पर बहुत ज्यादा सुरक्षा चाहते हैं और अंत में गरीबी की ओर चलते चले जाते हैं।

बचत का फिक्स्ड डिपॉजिट जैसा परंपरागत तरीका महंगाई दर को पाटने लायक रिटर्न मुहैया नहीं करा पाता और हमारे बुजुर्गो की सेवानिवृत्त जिंदगी को आहिस्ता-आहिस्ता गरीबी की ओर धकेल रहा है। इसलिए नौकरीपेशा जिंदगी में ही इक्विटी समर्थित म्यूचुअल फंड्स में निवेश की शुरुआत कर लेनी चाहिए, जिस पर रिटर्न महंगाई दर के मुकाबले कहीं ज्यादा है। अच्छी बात यह है कि यह समझ विकसित कर चुके बुजुर्गो की तादाद लगातार बढ़ रही है।

(इस लेख के लेखक वैल्यू रिसर्च के सीईओ, धीरेंद्र कुमार हैं)

Posted By: Praveen Dwivedi