विशेषज्ञ टिप्पणी, [राधिका पांडे] मोदी सरकार का पहला आम बजट ऐसे समय में पेश किया गया है, जब अर्थव्यवस्था विपरीत परिस्थितियों से गुजर रही है। सरकार पर यह लगातार दबाव बना हुआ था कि वह सुस्त अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए खर्च को बढ़ावा देने के उपाय करे। ऐसी स्थिति में सरकार के सामने अर्थव्यवस्था के विकास को रफ्तार देने के लिए राजकोषीय कंसोलिडेशन के रोडमैप से हटते हुए बड़े पैमाने पर व्यय को अपनाने या राजकोषीय कंसोलिडेशन के रोडमैप पर बने रहने के विकल्प में से किसी एक का चुनाव करनेकी मुश्किल चुनौती थी। राजकोषीय रोड मैप से बड़े पैमाने पर विचलन से उधारी बढ़ जाती है, ब्याज दरों में वृद्धि होती है और मुद्रास्फीति होती है। ऐसा लगता है कि मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले बजट में अपने राजकोषीय कंसोलिडेशन रोडमैप को बनाए रखने के विकल्प का चुना है।

बजट से पहले ही किसानों और छोटे कारोबारियों के फायदे के लिए सामाजिक क्षेत्र की कई योजनाओं की घोषणा कर दी गई थी। इन योजनाओं के वित्तपोषण के लिए पर्याप्त संसाधनों को जुटाने का काम रह गया था। चालू वित्तवर्ष के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 3.4 फीसद से घटाकर 3.3 फीसद कर दिया गया है।

राजस्व के मोर्चे पर, कई सकारात्मक निर्णयों की घोषणा की गई है। भारत में कॉर्पोरेट टैक्स की दरें सबसे ज्यादा हैं और व्यवसायी समुदाय लंबे समय से इसे कम करने की मांग कर रहा था। बजट में सालाना 400 करोड़ का कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए कॉर्पोरेट टैक्स दर को कम करने का फैसला किया गया है। सरकार ने अपने विनिवेश लक्ष्य को भी 80,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1.05 लाख करोड़ रुपये कर दिया है। इसके लिए कई सरकारी कंपनियों (सीपीएसई) में रणनीतिक बिक्री की आवश्यकता होगी।

वित्त मंत्री ने यह भी उल्लेख किया है कि एयर इंडिया में रणनीतिक बिक्री उनके रेडार पर है। सरकार पूंजीगत व्यय और सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के वित्तपोषण हेतु संसाधन पैदा करने के लिए सरकारी कंपनियों (पीएसयू) में अपनी हिस्सेदारी कम करने के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की आवश्यकता होगी। बजट में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की सेहत सुधारने के लिए 70,000 करोड़ की व्यवस्था की गई है। घाटे में चल रही सरकारी कंपनियों में टैक्स चुकाने वाले लोगों की गाढ़ी कमाई लगाने की रणनीति पर गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है। सरकारी बैंकों की दक्षता और शासन में सुधार पर जोर दिया जाना चाहिए, ताकि वे निवेश में घरेलू बचत के मध्यस्थ के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें।

सालाना पांच लाख से कम आय वाले लोगों को टैक्स के दायरे से बाहर रखा गया है। इससे भी खपत बढ़ने की उम्मीद है। सस्ते आवास, स्टार्ट-अप और डिजिटल लेनदेन को प्रोत्साहित करने के लिए भी कई कदम उठाए गए हैं। वहीं, अमीरों के लिए अधिभार बढ़ाया गया है। बजट की बड़ी खासियत यह है कि सरकार अपने व्यय के वित्तपोषण के लिए भारतीय रिजर्व बैंक और अन्य सरकारी संस्थाओं से मिलने वाले लाभांश पर निर्भर है। रिजर्व बैंक से मिलनेवाला लाभांश सरकार और आरबीआइ केबीच विवाद की जड़ रहा है। बजट मेंआरबीआइ, सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं से 1.06 लाख करोड़ लाभांशमिलने का अनुमान लगाया गया है।

बजट में सरकार के ऋण ढांचे में क्रांतिकारी बदलाव का प्रस्ताव किया गया है। बजट में प्रस्तावित किया गया है कि सरकार अपने घाटे को पूरा करने के लिए विदेशी मुद्रा में उधार लेगी। सरकारी ऋण में खुदरा निवेश को बढ़ावा देने के लिए कई उपायों की घोषणा की गई है। आरबीआइ और सेबी विनियमित जमाकर्ताओं के बीच अंतर-संचालन की अनुमति देने का प्रस्ताव एक स्वागत योग्य कदम है। इसमें तेजी लाई जानी चाहिए और सरकारी प्रतिभूतियों में खुदरा निवेश को सुविधाजनक बनाने के लिए और कदम उठाए जाने चाहिए।

लेखिका एनआइपीएफपी में वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं।

Posted By: Tilak Raj

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