[डॉ. राधिका पांडेय]। वित्त मंत्री से उम्मीद थी कि वह मंदी की मारी अर्थव्यवस्था की चिंताओं को सुलझा लेंगी। साथ ही वह राजकोषीय समेकन की रूपरेखा से भी भटकेंगी नहीं। इस बात की पूरी उम्मीद थी कि करों में कटौती करके और व्यापक व्यय से बजट को लेकर खपत की मांगों को बढ़ाने वाले कदमों की घोषणा की जाएगी। आंकड़ों की कलाबाजी वाले बजट की सिफारिशों ने यह साफ संकेत दिया कि मौजूदा समय में इस बजट का सकारात्मक पहलू यह है कि यह सब्सिडी के नाम पर बड़े खर्चे का प्रस्ताव नहीं करके आर्थिक सुस्ती को दूर करने के उपाय किए जा रहे हैं।

वित्त मंत्री ने घोषणा की वित्तीय घाटे में 0.5 फीसद की कमी आई है। वित्त वर्ष 2020 के लिए अनुमानित वित्तीय घाटा 3.8 फीसद बताया गया था जो बजट में सुधार दिखाते हुए 3.3 फीसद ही बताया गया है। बजट में आयकर की दरों में कटौती की घोषणा की गई है। ताकि लोगों के हाथ में खर्च करने के लिए अधिक धन आए और मांग के मुताबिक ही खपत बढ़े।

हालांकि कटौती और छूट को छोड़ने का विकल्प भी है। यह करदाता पर निर्भर करता है कि वह मौजूदा प्रणाली को माने या कम दर वाली नई कर प्रणाली को अपना ले। प्रस्तावित कर कटौती से मध्यम वर्ग या निम्न मध्यम वर्ग को क्रय शक्ति बढ़ाने में कुछ हद तक मदद मिलेगी। अगले साल के लिए वित्तीय घाटे का लक्ष्य 3.5 फीसद रखा गया है। यह सब कुछ चुनौतीपूर्ण अवधारणाओं पर आधारित है। इस अनुपात के हिसाब से माना गया है कि वित्तीय वर्ष 2021 में विकास दर 10 फीसद रहने वाली है। हालांकि यह परिकल्पना का उच्चतम बिंदु है। खासकर तब जब अर्थव्यवस्था अरसे से मंदी के दौर से गुजर रही है। इन हालात में अर्थव्यवस्था का पटरी पर आना धीमी गति से ही होगा।

2.1 लाख करोड़ के विनिवेश की संभावना

इस साल विकास दर का अनुमान सरकार ने पहले अति उत्साह में 12 फीसद दर्शाया था, जो कि केवल 7.5 फीसद ही रहा। इतना ही नहीं 2.1 लाख करोड़ के विनिवेश की भी संभावना जताई गई है, जोकि बहुत ही महत्वाकांक्षी लक्ष्य है। हालांकि इस वित्तीय वर्ष में सरकार ने यह लक्ष्य 1.05 लाख करोड़ रुपये का रखा है। लेकिन वह बमुश्किल 18 हजार करोड़ रुपये ही विनिवेश से जुटा पाई है। अगले साल के लक्ष्य इस बात पर टिके हैं कि कितनी बुद्धिमानी से एलआइसी के प्रस्तावित आइपीओ का प्रबंध किया जाता है। एलआइसी के अस्पष्ट ढांचे को देखते हुए इसका प्रस्तावित विनिवेश भी चुनौतीपूर्ण लगता है।

बड़े खर्च का प्रस्ताव नहीं

इस बजट का सकारात्मक पहलू यह है कि यह सब्सिडी के नाम पर बड़े खर्चे का प्रस्ताव नहीं करती है। खाद्यान्न, उवर्रक और पेट्रोलियम उत्पादों की सब्सिडी से होने वाला कुल अनुमानित खर्च 2.28 लाख करोड़ रुपये रहने वाला है। मौजूदा साल में सब्सिडी से होने वाला खर्च 2.27 लाख करोड़ रुपये ही रहने वाला है। सरकार का यह पूंजीगत व्यय 18 फीसद तक बढ़ने का अनुमान है, जो कि वर्ष 2019-20 में 4.12 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 3.48 लाख करोड़ रुपये रह सकता है।

पूरी तरह से सरकारी सर्विस बांडों और एनएसएसएफ कर्जो के जरिए सरकार का बैलेंसशीट से इतर जो कर्ज जुटाने का प्रावधान है, बजट में इस खासियत पर भी ध्यान देने की जरूरत है। मौजूदा वित्तीय वर्ष में यह 1.7 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। जबकि अगले वित्तीय वर्ष में 1.8 लाख करोड़ रुपये रह सकता है। और अगर इन आंकड़ों को जीडीपी के वित्तीय घाटे में जोड़ दिया जाए तो यह घाटा चार फीसद से भी अधिक होगा। लिहाजा, सरकार को बजट के पारदर्शी आंकड़े पेश करने चाहिए, ताकि बैलेंसशीट से इतर लेनदारियों का पूरा असर मालूम पड़े।

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