अगर आप नियमित रूप से निवेश नहीं करते हैं, तो बहुत संभव है कि एसेट एलोकेशन यानी संपत्ति आवंटन और एसेट रिबैलेंसिंग यानी संपत्ति पुर्नसतुलन जैसे शब्दों से आपका वास्ता नहीं पड़ा होगा। यह भी हो सकता है कि आपने दोनों अवधारणाओं के बारे में सुना तो है, लेकिन ऐसा लगता होगा कि ये इतने जटिल मसले हैं कि इनके बारे में जानने की आपको कोई जरूरत नहीं है। हकीकत इसके बहुत अलग है। सच तो यह है कि दोनों अवधारणाएं न केवल बेहद सरल हैं, बल्कि इन्हें स्वत: ही व्यवहार में भी लाया जा सकता है। आइए, इन दोनों अवधारणाओं के बारे में सरलता से समझते हैं।

  • मूल रूप से दोनों ही अवधारणाएं वित्तीय निवेश, इक्विटी और निश्चित आय (बैंक डिपॉजिट, बांड्स) के प्रकार हैं।
  • इक्विटी निवेश में जोखिम की आशंका ज्यादा रहती है, लेकिन आमदनी भी ज्यादा होती है। दूसरी तरफ, निश्चित आय के उपकरणों में जोखिम की आशंका बहुत कम रहती है, तो आमदनी भी उसी अनुपात में घट जाती है। मतलब यह कि अगर आपको नुकसान की परवाह नहीं, तो इक्विटी में निवेश कीजिए। और अगर आपको यह लगता है कि निवेश पर आमदनी कुछ कम भी चलेगी लेकिन नुकसान नहीं होना चाहिए, तो आप निश्चित आय वाले उपकरणों में निवेश कीजिए। इसलिए अपनी वित्तीय जरूरतों और प्राथमिकताओं को देखते हुए आपको इक्विटी और निश्चित आय के उपकरणों में एक खास अनुपात में निवेश करना चाहिए। इसी अनुपात को एसेट एलोकेशन कहते हैं।
  • समय के साथ-साथ आप यह देखेंगे कि इक्विटी में निवेश से हासिल रिटर्न और निश्चित आय के उपकरणों में निवेश से हासिल रिटर्न की विकास दर में अंतर है। इस अंतर की वजह से आपको लगेगा कि एसेट एलोकेशन का बुनियादी मकसद ही भटक रहा है। फिर आप क्या करेंगे? आप इक्विटी में निवेश की कुछ रकम को वहां से निकालकर निश्चित आय वाले उपकरणों में, या निश्चित आय वाले उपकरणों से कुछ रकम निकालकर इक्विटी में निवेश करेंगे। इससे आपके निवेश का बुनियादी मकसद अपने लक्ष्य की ओर वापस आ जाएगा। निवेश के रकम की एक प्रकार के फंड से दूसरे प्रकार के फंड में इसी तरह की अदलाबदली को एसेट रिबैलेंसिंग कहते हैं।

मोटे तौर पर, एसेट एलोकेशन और एसेट रिबैलेंसिंग इससे ज्यादा कुछ नहीं हैं।

एसेट रिबैलेंसिंग का कुल मतलब यह है कि इक्विटी बनाम निश्चित आय को ‘या तो यह सही या वह सही’ की तरह देखने के बदले ‘थोड़ा यह सही और थोड़ा वह सही’ की तरह देखें। वर्ष में एक बार आपको अपने निवेश पोर्टफोलियो को रिबैलेंस जरूर करना चाहिए। कहने का मतलब यह है कि अगर आपकी वास्तविक कमाई उम्मीद के अनुरूप नहीं जा रही है, तो दोनों उपकरणों में निवेश की कुछ रकम की अदलाबदली कर दें, जिससे कमाई आपकी उम्मीदों के अनुरूप स्तर पर आ जाए।

जब कभी ऐसा हो कि इक्विटी में निवेश की रकम निश्चित आय में निवेश की रकम के मुकाबले ज्यादा फलदायी हो - और अक्सर ऐसा ही होगा - तो आप खुद-ब-खुद इक्विटी से कुछ रकम निकालकर निश्चित आय के उपकरण में लगा देंगे, ताकि दोनों का संतुलन बरकरार रहे। इसी तरह अगर कभी इक्विटी में निवेश की रकम उम्मीद के मुताबिक फलदायी नहीं हो-जैसा कि बीच-बीच में हो सकता है- तो एक समयावधि के बाद निश्चित आय वाले उपकरण से कुछ रकम निकालकर इक्विटी में लगा दें, ताकि कमाई आपकी उम्मीद के अनुरूप पटरी पर आ जाए।

सच यह है कि यह तरीका मुनाफावसूली करने और पिछड़ रहे निवेश को मजबूती देने का सबसे बेहतर तरीका है। इससे होता यह है कि चीजें स्वयमेव पटरी पर आ जाती हैं। इक्विटी पिछड़े, तो उसमें रकम लगाइए, निश्चित आय का उपकरण पिछड़े, तो उसमें रकम लगाइए।

यह तरीका कारगर क्यों है? असल में वित्तीय संपत्ति के दोनों उपकरण यानी इक्विटी और निश्चित आय एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि पूरक हैं। सिर्फ तीन तरीकों से निवेश से कमाई की जा सकती है। पहला तरीका यह है कि आप किसी को उधार दें और वह उस रकम पर आपको ब्याज दे। इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप किसी व्यक्ति या सरकार को कर्ज देते हैं। दूसरा तरीका यह है कि आप किसी बिजनेस के शेयर खरीदकर उसके मालिकाना हक में हिस्सेदार हो जाएं। तीसरा तरीका यह है कि आपके पास सोना या जमीन जैसी कोई ऐसी मूल्यवान चीज खरीदें, जिसका भाव समय के साथ-साथ बढ़ता जाए। इन तीनों में सबसे अच्छा तरीका यह है कि इक्विटी और निश्चित आय के उपकरणों में संतुलन के साथ निवेश करें। इतना ही नहीं, आप निवेश के उस संतुलन पर कायम रहें और जिधर आय ज्यादा हो रही है, उधर से थोड़ी रकम निकालकर कम आय देने वाले स्रोत में लगाएं, जिससे कुल निवेश पर रिटर्न का संतुलन बरकरार रहे।

आप पाएंगे कि निवेश का यह तरीका जादुई असर छोड़ता है। इक्विटी निवेश में एकाएक नुकसान होने की जो आशंका रहती है, निवेश के इस संतुलित तरीके से वह आशंका लगभग खत्म हो जाती है। हालांकि यह लागू करने में उतना आसान नहीं लगता। खासतौर पर इस वर्ष तो यह थोड़ा मुश्किल ही है। और टैक्स के मोर्चे पर भी इससे नुकसान है। इसकी वजह यह है कि पिछले वर्ष तक एक वर्ष से ज्यादा वक्त के इक्विटी निवेश को बेचने पर टैक्स नहीं लगता था। लेकिन इस वर्ष से उस पर 10 फीसद टैक्स लगा दिया गया है। इसका मतलब यह है कि निवेश के उपकरणों में रकम की अदलाबदली से फायदे की जगह नुकसान हो सकता है।

इसका सबसे अच्छा समाधान हाइब्रिड इक्विटी-डेट फंड्स हैं। असल में हाइब्रिड इक्विटी-डेट फंड्स की खूबसूरती यह है कि इसमें जब तक आप रकम निकाल ही न लें, तब तक एक तरह के निवेश से दूसरी तरह के निवेश पर कोई टैक्स नहीं लगता। कहने का मतलब यह कि हाइब्रिड इक्विटी-डेट फंड्स में आप टैक्स की चिंता किए बिना थोड़ी रकम एक प्रकार के निवेश से दूसरे प्रकार में कर सकते हैं। इतना ही नहीं, पूंजी बाजार की नियामक संस्था भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की तरफ से हाल ही में हाइब्रिड इक्विटी-डेट फंड्स को औपचारिक रूप दे दिए जाने के बाद बाजार में ऐसे कई फंड लांच किए गए हैं। इनमें निवेशक अपनी जरूरतों के हिसाब से निवेश कर सकते हैं। इनमें इक्विटी सेविंग्स, बैलेंस्ड, कंजर्वेटिव और एग्रेसिव फंड्स के नाम प्रमुख हैं। हालांकि इनकी खूबियों-खामियों के बारे में बाद में विस्तार से चर्चा की जाएगी। लेकिन फिलहाल सच यह है कि हाइब्रिड इक्विटी-डेट फंड्स अपने निवेश को संतुलित करने के लिए आपके बेहद मजबूत औजार साबित हो सकते हैं।

निवेश की बरकत बनाए रखने के लिए एसेट एलोकेशन और एसेट रिबैलेंसिंग बेहद जरूरी है। आम निवेशकों को लगता है कि ये जटिल शब्दावलियां हैं और इन्हें जानने-नहीं जानने से कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ता। सच यह है कि फर्क पड़ता है। उससे भी बड़ा सच यह है कि अब बाजार में ऐसे फंड्स उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से इन शब्दावलियों को जाने बिना भी निवेश पर बेहतर रिटर्न हासिल किया जा सकता है।

(इस लेख के लेखक धीरेंद्र कुमार हैं जो कि वैल्यू रिसर्च के सीईओ हैं।)

Posted By: Praveen Dwivedi