निवेश करने का लक्ष्य केवल निवेश करना नहीं होता है। निवेश भविष्य की वित्तीय जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाता है। इसलिए जरूरी है कि निवेश करने से पहले भविष्य की वित्तीय जरूरतों का आकलन कर लिया जाए। वित्तीय लक्ष्यों को तय करते हुए उन्हीं के अनुरूप अलग-अलग पोर्टफोलियो में निवेश करना चाहिए। हर लक्ष्य के हिसाब से निवेश का प्रकार और तरीका तय करते हुए ही भविष्य की जरूरतों को सही तरह से पूरा करना संभव हो सकता है।

वर्तमान समय में बहुत से लोग आपको यह सलाह देते मिल जाएंगे कि कुछ निवेश करते रहो। निवेश और बचत ही आगे चलकर वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में सहायक होते हैं। ठीक उसी वक्त, बहुत से ऐसे लोग भी मिल जाएंगे, जिन्होंने बचत भी की है और निवेश भी किया है, लेकिन अपनी वित्तीय जरूरतों के लिए फिर भी संघर्ष करते रहते हैं। यह स्थिति भ्रम पैदा करती है। निवेश और बचत के बाद भी समय आने पर वित्तीय जरूरतें पूरी नहीं होने के कई कारण हैं। ज्यादातर मामलों में इसकी वजह होती है कि ऐसे लोग निवेश नहीं करते हैं, बल्कि बस पैसे को इधर-उधर लगा देते हैं। निवेश के नाम पर पैसे को कहीं भी लगा देना बहुत आसान लगता है। यह रणनीति हानिकारक है।

निवेश से पहले हमें सोचना चाहिए कि निवेश करने की असली वजह क्या है? क्या हम केवल इसलिए निवेश करते हैं ताकि लोगों को दिखा सकें। बिलकुल नहीं। निवेश किया जाता है, ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर वह पैसा काम आ सके। भविष्य में आपकी वित्तीय जरूरतों के आधार पर ही आपको निवेश के तरीके का चुनाव करना चाहिए।

निवेश करने से पहले निवेश की जरूरत और लक्ष्य को समझना जरूरी है। कुछ भी व्यवस्थित रूप से करना तब तक मुश्किल है, जब तक खर्च को ध्यान में रखकर निवेश की तैयारी नहीं की जाए। इसके लिए आपको कोई भविष्यवक्ता होने की जरूरत नहीं है। बस आपको अपने जीवन के विभिन्न पड़ाव पर आने वाले कुछ निश्चित खर्चो को लेकर अनुमान लगाना होगा।

आपको खुद से सवाल करना होगा कि आपके निवेश का असल वित्तीय लक्ष्य क्या है? निवेश का लक्ष्य केवल यह कहने से स्पष्ट नहीं हो सकता है कि आपको खूब सारा पैसा जुटाना है। आपको कुछ सटीक अनुमान लगाना होगा। आपको भविष्य की कुछ योजनाओं और उनकी वित्तीय जरूरतों पर विचार करना चाहिए। तभी आप यह तय कर पाएंगे कि आपको किस तरह के निवेश की जरूरत है।

उदाहरण के तौर पर: आपको छह साल बाद बेटी की उच्च शिक्षा के लिए पैसों की जरूरत होगी। आप आज से करीब 10 साल बाद एक घर खरीदना चाहते हैं। आप चाहते हैं कि हमेशा आपके पास आपातकालीन परिस्थितियों के लिए पांच लाख रुपये की राशि रहे। आप 18 साल बाद रिटायर होने वाले हैं और उसके बाद आपको अपनी लाइफस्टाइल को मैंटेन भी करना होगा।

जब तक आप इस तरह से अपनी जरूरतों को आंक नहीं लेते, तब तक निवेश का सही तरीका चुनना मुश्किल है। कई लोग कुछ इस तरह से भी लक्ष्य बताते हैं, ‘मुझे पांच साल बाद एक करोड़ रुपये की जरूरत है।’ सोचिए कि अगर आप पांच साल में उतने रिटर्न के लायक निवेश नहीं कर पाए तब क्या करेंगे? बिना किसी स्पष्ट लक्ष्य के आप अक्सर पीछे रह जाते हैं। फिर सवाल उठता है कि क्या 90 लाख से काम चलेगा? पांच साल की जगह सात साल लग गए तो क्या होगा? निवेश की शुरुआत इस साल हो या अगले साल? या फिलहाल ये सब छोड़ते हैं, आइफोन खरीद लेते हैं? बिना निर्धारित लक्ष्य के अक्सर ऐसी ही स्थिति बनती है।

लक्ष्य निश्चित होने पर ऐसा नहीं होता। उस स्थिति में सबकुछ स्पष्ट होता है। आपके निवेश का तरीका, लक्ष्य और गुंजाइश सब स्पष्ट होता है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण बात है कि हर लक्ष्य के हिसाब से कुछ विशेष निवेश का चुनाव करना चाहिए। निवेश का चुनाव इस तरह से होना चाहिए कि आपका लक्ष्य हासिल हो सके। दूसरे शब्दों में कहें तो अलग-अलग लक्ष्य के हिसाब से हमारे पास अलग-अलग पोर्टफोलियो होना चाहिए। यानी हर जरूरत के हिसाब से निवेश का अलग-अलग सेट तैयार करना चाहिए।

अलग-अलग पोर्टफोलियो का यह तरीका लगभग वैसा ही है, जैसा बहुत सी गृहणियां करती हैं। मेरी एक परिचित हैं, जिन्होंने जिंदगी भर घर की वित्तीय व्यवस्था को ऐसे ही संभाला। उन्होंने हाथ से सिलकर छोटी-छोटी थैलियां तैयार की हुई थीं। हर थैली की अलग-अलग भूमिका थी। जैसे ही उनके पति वेतन लेकर आते थे, वे सब्जी वाली थैली में सब्जी के खर्च के पैसे, दूध की थैली दूध खर्च के पैसे और इसी तरह अन्य खर्चो के लिए जरूरी पैसे निर्धारित थैलियों में रख देती थीं। यह तरीका बहुत कारगर रहता था।

मैं आपको अपनी बचत और निवेश के साथ यही करने के लिए कह रहा हूं। हर लक्ष्य के लिए अलग वित्तीय योजना रहनी चाहिए। लक्ष्य निर्धारण के लिए केवल तीन बातों की जरूरत है। पहला, कितना पैसा चाहिए, दूसरा, कब चाहिए और तीसरा, क्या समय और राशि में कोई छूट ली जा सकती है? लक्ष्य के लिए समय तत्काल से लेकर अगले 20 या 30 साल भी हो सकता है। इस मामले में हर व्यक्ति की जरूरतें और तरीका अलग होता है। जो लक्ष्य कम अवधि का हो, उसके लिए कम उतार-चढ़ाव वाले एसेट का चुनाव करने की जरूरत होती है। ऐसे में रिटर्न से भी समझौता करना पड़ सकता है। वहीं लंबी अवधि के लक्ष्य के लिए इससे उलट रास्ता अपनाने की जरूरत होगी।

(इस लेख के लेखक धीरेन्द्र कुमार हैं जो कि वैल्यू रिसर्च के सीईओ हैं।)

Posted By: Praveen Dwivedi