हाल ही में एक अमेरिकी बिजनेस स्कूल की पत्रिका में बेहद मजेदार सर्वे प्रकाशित किया गया। सर्वे का शीर्षक बड़ा ही रोचक था। शीर्षक यह था कि ‘अगर आप कहते हैं कि कोई चीज संभावित है, तो लोग उसे कितना संभावित मानते हैं?’

उस लेख का मुख्य विषय या पात्र वैसे शब्द थे, जिनका उपयोग किसी घटना या परिणति के होने या नहीं होने की संभावना के लिए किया जाता है। और इसके लिए भी कि अगर घटना या परिणति वैसी नहीं हुई जैसी संभावना जताई गई थी, तो संभावना के लिए उपयोग किए गए शब्द को कैसे ठीक किया जा सकता है या उसके समर्थन में किस तरह तर्क दिए जा सकते हैं। जहां तक बचत और निवेश का सवाल है, तो वादे और उम्मीदें तो इसकी आत्मा में बसती हैं। इसलिए मुङो यह लेख बेहद रोचक लगा।

इस लेख के रोचक लगने के कई कारण हैं। इसके लेखकों में एक ट्विटर में डाटा वैज्ञानिक हैं, तो दूसरे की पहचान फाइनेंशियल रिसर्चर और शिक्षाविद के तौर पर है। लेकिन इस लेख का सबसे रोचक पहलू यह है कि लेखकों ने इस पर खुला रिसर्च किया कि जब संभावना या उम्मीद से जुड़े शब्दों का प्रयोग किया जाता है, तो लोगों के मन में वस्तुत: क्या भाव आते हैं? परीक्षण के लिए लेखकों ने ‘हमेशा’, ‘निश्चित ही’, ‘लगभग निश्चित’, ‘बहुत ज्यादा संभावना’, ‘सामान्यतया’, ‘अक्सर’, ‘कम संभावना’, ‘शायद ही’, ‘कभी नहीं’ और इन जैसे कुछ अन्य शब्दों और तकिया-कलाम का इस्तेमाल किया।

अध्ययन के तहत जवाब देने वालों से कहा गया कि जब उनसे ऐसे शब्द कहे जाते हैं, तो वे उनके मन में उन शब्दों के लिए कितने प्रतिशत का भाव आता है। मसलन अगर उनसे कहा जाए कि अमुक चीज का होना ‘लगभग निश्चित है’, तो उनके मन में उसके होने की संभावना का सही-सही प्रतिशत कितना उभरता है। इसलिए अगर आपको लगता है कि ‘निश्चित ही’ का मतलब 90 फीसद है, तो आप उसके सामने बने खाने में निशान लगा दें।

परीक्षकों ने जवाब देने वालों से सभी शब्दों के लिए इसी तरह उत्तर देने को कहा और जैसा कि होना ही था, कुछ शब्दों के लिए सभी के मन में एक जैसे भाव आए, जबकि कई शब्दों के लिए उत्तरदाताओं की राय जुदा थीं। इस जुदा राय में भी दिलचस्प पहलू यह है कि कई शब्दों के मामलों में जवाब की एकरूपता और विरोधाभास का विस्तार-पटल बहुत बड़ा निकला।

मुझे लगता था कि ‘हमेशा’ के लिए सभी उत्तरदाता के मन में 100 फीसद का भाव होगा। लेकिन अगर 75 फीसद उत्तरदाता भी ऐसे निकले जिनके लिए इस शब्द का भाव 98 फीसद निश्चित था, तो भी हर पांचवें उत्तरदाता के मन में इसके लिए भाव 90 फीसद तक के निचले स्तर पर पाया गया। कुल मिलाकर कहें, तो ‘हमेशा’ के मामले में भी हर पांचवें उत्तरदाता के मन में 100 फीसद का भाव नहीं था। इसी तरह ‘निश्चित ही’ का भी विस्तार-पटल 80 से 100 फीसद तक पाया गया। यही भाव ‘करीब-करीब निश्चित’ के लिए भी सामने आया।

इसमें हैरत की बात नहीं कि सबसे ज्यादा अस्पष्ट शब्दों के लिए उत्तरदाताओं का जवाब विस्तार-पटल के मध्य में यानी 50 फीसद के आसपास पाया गया। लेकिन असल दिक्कत यह है कि अलग-अलग उत्तरदाताओं के मन में ऐसे शब्दों को लेकर बेहद जुदा राय थी। मसलन, ‘निश्चित ही’ जैसे शब्द के लिए उत्तरदाताओं के मन में 30 से 90 फीसद तक के भाव थे।

सवाल यह है कि अनुपालन या प्रयोग करने के मामले में इसका मतलब क्या है। इसका मतलब यह है कि हमें यह जान लेना चाहिए कि ‘सच में संभव’ और ‘निश्चित ही संभव’ जैसे तकिया-कलाम का सही मायनों में कोई मतलब नहीं है। सच कहें, तो वे अर्थहीन होने से भी गए-गुजरे हैं, क्योंकि अलग-अलग लोगों के लिए इन शब्दों के मायने बहुत अलग हैं। ‘करीब-करीब’, ‘अक्सर’ और ‘शायद’ जैसे शब्दों के प्रति भाव भी इसी तरह अस्पष्ट हैं। अगर आप कारोबार या निवेश के समाचार पढ़ने या सुनने-देखने के शौकीन हैं, तो इन शब्दों से आपका सामना होता ही रहता होगा।

विश्लेषक और शोधकर्ता अक्सर कहते पाए जाते हैं कि कुछ निवेश में बेहतर रिटर्न हासिल करने की संभावना बहुत ज्यादा है, या फिर ये कि ब्याज दरों में गिरावट के बहुत ज्यादा आसार हैं, या बाजार के स्थिर रहने की संभावना सबसे ज्यादा दिखाई पड़ती है। लेकिन आपको पता है कि ऐसा कहने का उनका मतलब कुछ भी हो सकता है। इसलिए उनके कहने का असल में कोई मतलब नहीं है।

असली दिक्कत यह है कि लेखक समेत ज्यादातर लोग इसका जो समाधान बताते हैं, वह खुद में एक बड़ी समस्या है। और वह यह है कि हर किसी को संभावना जतानी चाहिए। संभावनाएं जताने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें गलत होने पर निकल बचने की गुंजाइश बहुत ज्यादा होती है। मुङो याद है, कुछ महीने पहले भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों की घोषणा से पहले टीवी पर एक बड़े अर्थशास्त्री कह रहे थे कि उन्हें ब्याज दरें नहीं बदलने की 80 फीसद उम्मीद है। लेकिन जब बैंक ने ब्याज दरों में कटौती कर दी, तो वही कहने लगे कि उनके आकलन के मुताबिक ब्याज दरों में बदलाव की 20 फीसद संभावना तो थी ही। इसका सीधा मतलब यह है कि चतुर अनुमानकर्ता संभावना का प्रतिशत बताते हुए कभी गलत नहीं होता। उसके सिक्के के दो ही पहलू होते हैं: हम जीते, आप हारे।

मूल लेख में इसका निदान यह सुझाया गया है कि भविष्यवाणी करने वाले या अनुमान लगाने वाले का पिछला रिकॉर्ड जरूर जांच लिया जाना चाहिए। लेकिन कई मामलों में यह सुझाव काम नहीं आता। खासतौर पर अगर आपके सामने कोई वित्तीय सलाहकार हो जो किसी निवेश पर निश्चित तौर पर रिटर्न मिलने का वादा करता हो। ऐसे में सिर्फ एक काम किया जा सकता है, वह यह कि सलाहकार से ही पूछा जाए कि उसके फीसद मानक पर उसके वादे कहां खरा उतरते हैं। इतना ही नहीं, यह भी समझ लें कि दो लोगों के लिए एक ही शब्द के अलग-अलग मायने हो सकते हैं।

आप www. Probabilitysurvey.com पर जाकर सर्वे का हिस्सा बन सकते हैं। वित्तीय निवेश के सलाहकार या विश्लेषक अक्सर ‘निश्चित ही’, ‘लगभग’, ‘शायद’, ‘पक्का’, ‘तगड़ा रिटर्न’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते पाए जाते हैं। लेकिन इनके मायने सबके लिए अलग-अलग होते हैं। एक नवीनतम सर्वे ने भी इसकी पुष्टि की है। सवाल यह है कि निवेशक को ऐसे शब्दों का सही भाव समझने के लिए क्या करना चाहिए?

(इस लेख के लेखक वैल्यू रिसर्च के सीईओ धीरेंद्र कुमार हैं।)

Posted By: Praveen Dwivedi