[धीरेंद्र कुमार]। मैं, प्रत्येक रविवार आकाशवाणी पर सवाल-जवाब से जुड़ा आधा घंटे का शो करता हूं। बीते रविवार को एक सवाल सुनकर मैं सचमुच अचरज में पड़ गया। मजाक में ऐसे सवाल को 'सिलेबस से बाहर' का सवाल कहता हूं। दरअसल, कोलकाता के एक शख्स ने पूछा कि क्या अध्यात्म, निवेश में मदद करता है! मैंने इस विषय की जानकारी के अभाव की बात कही। फिर मैंने अपने और अपने करीबियों के अनुभव की एक बात जरूर कही, जो उस वक्त मुझे याद आ गई। आध्यात्मिक रूप से संतुलित जीवन का नजरिया, तब सच में आपकी मदद करता है जब आप निवेश के खराब दौर से गुजर रहे हों।

इसमें कुछ भी अनअपेक्षित नहीं है। आध्यात्मिक तौर पर मजबूत लोग खुद को बेहतर तरीके से समझते हैं और इसलिए वो मुश्किल हालात में भी ज्यादा संतुलित रह सकते हैं। पिछले दो वर्षो में कोरोना वायरस के कारण बहुत से लोगों ने अपने निजी जीवन में गहरा तनाव और दुख झेले। इसने जहां कुछ लोगों को मनोवैज्ञानिक तौर पर मजबूत किया। जबकि, कई लोगों पर इसका उलटा असर हुआ। ये फर्क इस बात का भी हो सकता है कि लोग आध्यामिक रूप से कितने जागरुक रहे। निवेशक भी ऐसे ही होते हैं। देर-सबेर हर निवेशक बुरे दौर से गुजरता है। जब वो वक्त खत्म होता है, तो कुछ लोग डर कर निवेश से दूर हो जाते हैं या निवेश से घबराने लगते हैं। पर, कुछ दूसरे लोग बाहरी परिस्थितियों के असर और अपने व्यवहार को लेकर सीख लेते हैं।

इंटरनेट पर लोगों की ओर से निवेश को लेकर पूछे गए सवालों के अध्ययन पर एक दिलचस्प पैटर्न उभर कर सामने आता है। ऐसे बचत करने वाले भी हैं, जो सोचते हैं कि निवेश, निवेश के बारे में है और ऐसे लोग भी मिल जाएंगे, जो सोचते हैं कि निवेश उनके अपने बारे में है।

ये साबित करने के लिए कि मैं क्या कह रहा हूं, आपको कुछ अलग-अलग तरह की मिसालें देता हूं। यहां असल सवाल है, 'क्या ये सही है कि मौजूदा परिस्थितियों में स्टाक मार्केट पर आधारित मिड-कैप और स्माल-कैप म्यूचुअल फंड्स में निवेश किया जाए? ये परिस्थितियां कब तक ऐसी ही रहेंगी?' सुनने में ये बिल्कुल तर्कसंगत बात लगती है। हालांकि, इस बात को उलट देखिए 'मैं 40 साल का हूं। ईपीएफ के अलावा मैंने अपने रिटायरमेंट की बचत शुरू नहीं की है। जब मैं रिटायर होउंगा तो मुझे 75,000 रुपये महीने की जरूरत होगी..', और फिर निजी जानकारियां हैं जिन्हें मैं यहां बताउंगा।

तो आप समझे कि मैं क्या बात कर रहा हूं? ये ऐसा सवाल है जिन्हें दो बचत करने वालों ने ई-मेल के जरिये पूछा। मैं समझता हूं, ये आमतौर पर निवेश के प्रति उनके व्यवहार को दिखाता है। पहला सवाल करने वाला सोचता है कि निवेश के फैसले बाहरी दुनिया की घटनाओं पर आधारित होते हैं। दूसरा बचत करने वाला सोचता है कि बचत और निवेश उसके अपने जीवन की मुश्किलों का हल पाने का रास्ता है।

इसके अलावा, इससे भी गहरा एक आध्यात्मिक पहलू है जिसे लेकर आपको, अपने-आप को समझने की जरूरत है। अलग-अलग लोग जब मुश्किलों का सामना करते हैं तो अलग स्तर पर चिंतित होते और घबराते हैं। निवेश सलाहकारों को अपने क्लाइंट से यह सवाल पूछना बहुत अच्छा लगता है कि उनकी जोखिम सहने की क्षमता क्या है। मगर ये सवाल उसके लिए बेकार है जिसने असल जिंदगी में नुकसान ही न झेला हो। यही जिंदगी की कई दूसरी परिस्थितियों के लिए भी सच है। क्या आप हिम्मत दिखाएंगे जब आप एक आतंकवादी हमले का सामना करेंगे? या जब आपको कोई खतरनाक बीमारी हो जाए? इसका जवाब कोई नहीं जानता, जब तक ये हो न जाए।

(लेखक- वैल्यू रिसर्च आनलाइन डाट काम के सीईओ हैं।)  

Edited By: Krishna Bihari Singh

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