भारतीय म्यूचुअल फंड उद्योग में अक्सर ऐसी खबरें और गतिविधियां सामने आती रहती हैं जिनका किसी के निवेश पर असर तो बहुत कम होता है, लेकिन उन खबरों से निवेशक उलझन में पड़ जाते हैं। ऐसी खबरें निवेशकों को परेशान करने वाली होती हैं। कई बार ऐसी छवि बन जाती है कि जैसे म्यूचुअल फंड की दुनिया में कुछ बहुत बड़ा बदलाव होने जा रहा है। हालांकि ऐसा होता नहीं है।

हाल के दिनों में मैंने निवेशकों के बीच ऐसी दो बातों की चर्चा सुनी है। पहली चर्चा है बाजार नियामक सेबी की तरफ से म्यूचुअल फंडों को श्रेणियों में बांटने और पूरे उद्योग को नियमित करने की। दूसरी चर्चा विदेशी फंड कंपनियों से जुड़ी है। ऐसी ढेरों खबरें और कहानियां सोशल मीडिया से लेकर तमाम माध्यमों में फैली हुई हैं कि विदेशी फंड कंपनियां भारत से पैसा वापस निकाल रही हैं। खबरों की शुरुआत हुई थी ब्लैकरॉक से। ब्लैकरॉक विदेशी फंड कंपनी है और भारत में कार्यरत डीएसपी ब्लैकरॉक म्यूचुअल फंड में भागीदार है। खबरें हैं कि ब्लैकरॉक इस म्यूचुअल फंड कंपनी में अपनी हिस्सेदारी डीएसपी को बेच रही है। इसी के बाद से ऐसी खबरों और कहानियों की बाढ़ आ गई। सूचनाओं के इस बहाव से कुछ ऐसी छवि बनती है कि जैसे कोई बहुत आधारभूत बदलाव आने वाला है और शायद निवेश की पूरी प्रक्रिया में कोई गहरी समस्या है। ऐसा लगता है कि जैसे बहुत बड़ी गड़बड़ इस क्षेत्र में हो रही है।

असल तस्वीर इससे बिलकुल अलग है। ऐसा कुछ भी इस उद्योग में नहीं हो रहा है। जितने भी बदलावों का जिक्र किया जा रहा है, उनसे केवल उन्हीं लोगों पर फर्क पड़ेगा जो इस कारोबार से जुड़े हुए है। निवेशकों पर इनका असर बहुत मामूली है। जितना दिखाने की कोशिश हो रही है, उस तुलना में इन बदलावों से निवेशकों पर बहुत कम असर होना है। विदेशी फंडों के भारत छोड़ने की चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रहती हैं। जब भी कोई विदेशी फंड कंपनी भारतीय कारोबार में अपनी हिस्सेदारी बेचती है, तभी इस तरह की खबरें और कहानियां सामने आने लगती हैं। इन कहानियों का लब्बोलुआब कुछ ऐसा होता है कि भारत में म्यूचुअल फंड कारोबार में कुछ बहुत गलत हो रहा हैं। कुछ खबरें तो खतरनाक हालात को लेकर चेतावनी सी देती प्रतीत होती हैं। इनकी भाषा लगभग निवेशकों को आगाह करने वाली होती है। इस संदर्भ में दो बातें ध्यान रखने की हैं।

पहली बात यह कि म्यूचुअल फंड में निवेश की परिस्थितियों और कारोबार की परिस्थितियों में कोई समानता नहीं है। म्यूचुअल फंड के कारोबार से जुड़ा कोई विदेशी हो या भारतीय, उसके लिए परिस्थितियों के अर्थ निवेशकों से जुदा होते हैं। पिछले कई साल में कई कंपनियों ने खुद को स्थापित किया है और कई कंपनियां ऐसी भी हैं जिन्होंने अपना कारोबार बेचा और इस क्षेत्र से बाहर हो गईं। इस तरह के तमाम घटनाक्रमों का निवेशकों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

ध्यान रखने वाली दूसरी बात यह है कि म्यूचुअल फंड के कारोबार से बाहर निकलने वाली कंपनियों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। कोई ऐसी साझी वजह नहीं है, जिसकी वजह से कंपनियां इस कारोबार से दूर होती हैं। हर कंपनी के ऐसे फैसले के पीछे उसकी अपनी परिस्थितियां और अपने कारण होते हैं। इनके आधार पर कोई भी व्यापक और सर्वमान्य निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है।

जहां तक म्यूचुअल फंड को श्रेणियों में बांटने वाली खबर का मामला है, हमने पहले भी इस संदर्भ में चर्चा की है। हाल के लेखों में इस बात को स्पष्ट किया है गया है कि यह बदलाव किस तरह से काम करेगा। यह पूरी प्रक्रिया म्यूचुअल फंड कारोबार की आंतरिक प्रणाली का हिस्सा है। फंड निवेशक के लिहाज से देखें तो म्यूचुअल फंडों के वर्गीकरण की इस पूरी कवायद की महत्ता उतनी है नहीं, जितनी दिख रही है। इसकी वजह भी स्पष्ट है। फंडों के वर्गीकरण की सेबी की इस नियामकीय प्रक्रिया ने म्यूचुअल फंडों को 36 श्रेणियों में वर्गीकृत किया है। इनमें इक्विटी फंड, डेट फंड, डेट-इक्विटी फंड और ऐसी ही कई अन्य श्रेणियां है। म्यूचुअल फंड किस तरह से काम करता है और उसमें होने वाला निवेश किस तरह का है, यह सोचते हुए यह पूरी प्रक्रिया बहुत तार्किक लगती है। हालांकि किसी निवेशक के लिए, जो यह जानने की कोशिश कर रहा हो कि म्यूचुअल फंड है क्या, उसके लिए 36 श्रेणियां बेकार हैं।

असल में आप इनमें से 30-32 श्रेणियों को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए भी बेहतर निर्णय ले सकते हैं। असल में मैं इस बात का बड़ा समर्थक हूं कि निवेश की प्रक्रिया को सरल बनाया जाना चाहिए। ऐसे में मैं यहां तक मानता हूं कि व्यक्तिगत निवेशक इन 36 में से 34 या 35 श्रेणियों को नजरअंदाज कर सकते हैं।

अब सवाल उठता है कि यह काम कैसे करेगा? इसे इस तरह से समझ सकते हैं। अगर आप एक निवेशक हैं, जिसका वित्तीय जीवन व्यवस्थित और सांचे में ढला हुआ है, जैसा कि ज्यादातर लोगों के मामले में होता है, तब आपकी जरूरत क्या होगी: लॉन्ग टर्म सेविंग के लिए इक्विटी मल्टी कैप फंड, मीडियम टर्म सेविंग के लिए ज्यादा अग्रेसिव इक्विटी-डेट हाइब्रिड फंड, टैक्स बचाने व लॉन्ग टर्म सेविंग के लिए ईएलएसएस फंड और ज्यादा रिटर्न के लिए व बैंक फिक्स्ड डिपोजिट के बेहतर विकल्प के लिए शॉर्ट टर्म डेट फंड। इससे भी मजेदार बात यह है कि निवेश कितने समय के लिए करना है, इस आधार पर असल में दो ही विकल्प रह जाते हैं, मल्टी कैप फंड या अग्रेसिव हाइब्रिड फंड। ज्यादा से ज्यादा आपको टैक्स बचाने वाले फंड के बारे में सोचने की जरूरत पड़ सकती है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए आप तमाम चेतावनी वाली खबरों के प्रभाव में आने से बचे रह सकते हैं।

किसी भी निवेशक के लिए यह फैसला हमेशा मुश्किल रहता है कि वह पैसा कहां लगाए। निवेश के क्षेत्र में कदम रखते हुए व्यक्ति के फैसले पर कई बातों का असर पड़ता है। इन सबके बीच इस उद्योग से जुड़ी ढेरों खबरें और कहानियां निवेशक को और ज्यादा उलझाने का काम करती हैं। कई खबरें ऐसा माहौल बनाती हैं, जैसे इस क्षेत्र में कोई बहुत बड़ी परेशानी है। इनमें निवेशकों को चेतावनी नजर आती है। असल में ऐसा कुछ भी नहीं है। ज्यादातर खबरों का असर केवल इस क्षेत्र में कारोबार कर रहे लोगों पर पड़ता है, निवेशकों पर नहीं। इसलिए निवेशकों को इन खबरों से चिंतित हुए बिना फैसला लेना चाहिए।

(इस लेख के लेखक धीरेन्द्र कुमार हैं जो कि वैल्यू रिसर्च के सीईओ हैं।)

By Praveen Dwivedi