नई दिल्‍ली, राहुल लाल। बीते सप्ताह जारी किए गए जीडीपी के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2019-20 की दूसरी तिमाही में जीडीपी विकास दर 4.5 फीसद पर पहुंच चुकी है। जीडीपी की विकास दर घटने से लोगों की आमदनी, खपत और निवेश पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। इससे नौकरियों पर भी अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। दरअसल सरकारी राजस्व एवं मध्य वर्ग के वेतन में वृद्धि काफी हद तक नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर पर ही निर्भर करता है। नॉमिनल वृद्धि दर 6.1 प्रतिशत से कम रहने पर अब उस स्तर से भी नीचे आ गई है, जिस पर सरकार उधारी लेती है। अपने घाटे की भरपाई के लिए सरकार फिलहाल 6.5 फीसद के नॉमिनल जीडीपी दर पर उधारी ले रही है। 

विशेषज्ञों का मानना है कि अर्थव्यवस्था के लिए यह तगड़ा आघात है। इसका मतलब होगा कि सरकार पर कर्ज बोझ आगे और बढ़ेगा। इससे भी अहम है कि अर्थव्यवस्था के उधारी दर में सुस्त रफ्तार से बढ़ने पर उन प्रोत्साहनों में भी कमी आएगी, जिनके आधार पर निवेशक फैसले लेते हैं।

लगातार दूसरे माह कोर सेक्टर में आई गिरावट : देश के आठ कोर सेक्टर में अक्टूबर माह में 5.8 फीसद गिरावट देखने को मिली। सितंबर माह में भी कोर सेक्टर में 5.2 प्रतिशत गिरावट आई थी। जीडीपी के इसी तिमाही में वृद्धि दर 4.5 प्रतिशत तक लुढ़काने में कोर सेक्टर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कोर सेक्टर इंडेक्स के अनुसार औद्योगिक उत्पादन घटने से बिजली की मांग में 12.4 प्रतिशत तक की कमी आई है। पिछले माह यह खपत सितंबर के माइनस तीन फीसद यानी ऋणात्मक तीन प्रतिशत के मुकाबले इस बार माइनस बारह फीसद हो गई है। 

सरकार के आंकड़ों के अनुसार सबसे तगड़ा झटका कोयला क्षेत्र को लगा है, जिसमें उत्पादन में 17.6 फीसद की कमी दर्ज की गई है। वहीं कच्चे तेल के उत्पादन में 5.1 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस के उत्पादन में 5.7 फीसद की कमी आई है। इसके अतिरिक्त सीमेंट के उत्पादन में 7.7 फीसद और इस्पात के उत्पादन में 1.6 प्रतिशत की कमी आई है। कोर सेक्टर में मुख्यत: आठ उद्योग शामिल होते हैं- कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, स्टील, सीमेंट, बिजली, फर्टिलाइजर और रिफाइनरी उत्पाद। आइआइपी की गणना में इनका योगदान करीब 40.27 प्रतिशत रहता है।

निर्यात में भी गिरावट : देश के निर्यात में लगातार तीसरे माह गिरावट आई है। सितंबर माह के निर्यात में 6.57 फीसद की गिरावट आई है, तो वहीं अक्टूबर में 1.1 फीसद की गिरावट दर्ज की गई है। भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय घरेलू मांग की कमी की समस्या से जूझ रही है, ऐसे में उद्योगपति अपना सामान निर्यात करते हैं और विदेशों में बाजार तलाशतें हैं। लेकिन भारतीय निर्यात की रफ्तार सुस्त पड़ चुकी है।

दरअसल निर्यात जीडीपी के चार प्रमुख घटकों में से एक है। इंजीनियरिंग वस्तुओं के निर्यात में गिरावट काफी परेशान करने वाला है। नरेंद्र मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल में 2014 से 2019 के दौरान कुल औसत निर्यात वृद्धि दर चार फीसद रहा। इस मामले में यदि वर्ष 2014-15 से पहले की बात करें, तो निर्यात बेहतर था। वर्ष 2013-14 में निर्यात की वार्षिक वृद्धि दर 17 प्रतिशत थी, जो 2014-15 और 2015-16 में घटकर क्रमश: माइनस एक प्रतिशत और माइनस नौ प्रतिशत हो गई। अभी भी निर्यात दर लगातार ऋणात्मक बना हुआ है। 

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी कहा है कि भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था वाला देश बनाने के लिए निर्यात दर 19 से 20 प्रतिशत तक होना आवश्यक है। ऐसे में निर्यात वृद्धि के लिए विशिष्ट रणनीति बनाने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए चीन में अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ बढ़ने से एक रिक्तता भी पैदा हुई है, ऐसे में भारत लगभग 57 प्रकार के उत्पादों का निर्यात चीन को आसानी से कर सकती है। इस सदंर्भ में यह उल्लेखनीय है कि ट्रेड वॉर के संकट को वियतनाम और बांग्लादेश ने अपने लिए अवसर में बदला है। हमें इन दोनों देशों से भी सीखना होगा।

विनिर्माण में गिरावट : पिछले दो वर्षो में पहली बार विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट दर्ज की गई है। चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र में एक प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि इसकी पहली तिमाही में 0.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके पहले वित्त वर्ष की समान तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत थी। वित्त वर्ष की पहली छमाही में विनिर्माण क्षेत्र के उत्पादन में 0.2 प्रतिशत की गिरावट आई है।

विनिर्माण क्षेत्र में अत्यंत कमजोर प्रदर्शन का कारण मांग में कमी है। उपभोक्ता उत्पादों के कमजोर मांग के कारण विनिर्माण क्षेत्र सिकुड़ गया है, क्योंकि क्षमता ज्यादा है और उसकी तुलना में मांग काफी कम है। विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट अर्थव्यवस्था के लिए भयावह है।

राजकोषीय घाटा बजट लक्ष्य के पार : केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा अप्रैल-अक्टूबर के दौरान 7.2 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो 7.01 लाख करोड़ रुपये के 2019-20 के बजट लक्ष्य से अधिक है। जुलाई-सितंबर के दौरान जीडीपी के आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2019-20 की पहली छमाही में सामान्य जीडीपी के प्रतिशत के तौर पर राजकोषीय घाटा 6.6 फीसद रही, जबकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पांच जुलाई के अपने पहले बजट भाषण में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 3.3 प्रतिशत निर्धारित किया था।

अब तक सरकार अर्थव्यवस्था का सबसे तेज बढ़ता हिस्सा रही है, लेकिन राजकोषीय घाटे का पूरे वर्ष का लक्ष्य सात माह में ही पार हो जाने के बाद यह जारी नहीं रहने वाला। इस तिमाही में जीडीपी विकास दर 4.5 प्रतिशत इसलिए रही, क्योंकि सरकारी खर्च 15.6 प्रतिशत बढ़ा है। ऐसे में यदि सरकारी खर्च को अलग कर दें और तब संपूर्ण अर्थव्यवस्था को देखेंगे, तो पाएंगे कि यह स्थिति और भी बुरी है। इस खर्च से अलग जो भारतीय अर्थव्यवस्था है, उसका विकास दर गिरकर तीन फीसद हो गया है।

कृषि विकास दर की चुनौती : वित्त वर्ष 2019-20 की दूसरी तिमाही में भारत की कृषि विकास दर 2.1 प्रतिशत रही। यह पहली तिमाही के दो प्रतिशत की तुलना में कुछ ही अधिक है। उल्लेखनीय है कि पिछले पांच वर्षो में देश में औसत कृषि विकास दर 2.7 प्रतिशत रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्ष्य है कि वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी की जाए। इसके लिए नीति आयोग के तत्वावधान में अशोक दलवाई समिति का गठन किया गया, जिसने कृषि आय को दोगुना करने के लिए कृषि विकास दर को 12 प्रतिशत तक पहुंचाने की सिफारिश की। परंतु कृषि विकास दर अब भी दो प्रतिशत के आसपास ही है। ऐसे में अब इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य से भी हम लोगों की दूरी लगातार बढ़ रही है।

.. तो क्या है समाधान? सरकार ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कॉरपोरेट टैक्स में कटौती की थी। इसके साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक ने कई बार रेपो रेट में कटौती कर ब्याज दरों को घटाया। लेकिन इन प्रयासों का कोई विशेष परिणाम नहीं दिख रहा है। अर्थव्यवस्था का वर्तमान संकट मूलत: मांग पक्ष से संबद्ध है। कॉरपोरेट टैक्स में कमी का लाभ मांग पक्ष से संबद्ध न होकर आपूर्ति पक्ष से संबद्ध है। आपूर्ति पक्ष में पहले ही समस्या नहीं है। उपभोक्ता की क्रय क्षमता में कमी के कारण मांग में कमी आ रही है। इस कारण कंपनियों को उत्पादन में कटौती करनी पड़ रही है। कंपनियों को अगर लंबे समय तक यह कटौती करनी होगी, तो उन्हें अपने कर्मचारियों की छंटनी भी करनी होगी। 

सवाल यह है कि इस समस्या का समाधान क्या है? इसके लिए सबसे आवश्यक है कि सरकार सबसे निम्न वर्ग की क्रय क्षमता में वृद्धि करे। उदाहरण के लिए सरकार इस समय किसानों को ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ के तहत सीधे बैंक खातों में रकम भेज रही है। इस तरह की योजनाओं और लाभार्थियों की संख्या में वृद्धि करने की आवश्यकता है। इसी तरह सरकार को आधारभूत संरचना पर भी खर्च में वृद्धि करनी होगी। इससे एक ओर आधारभूत संरचनाओं का निर्माण भी होगा, वहीं लोगों को भारी मात्र में रोजगार भी मिलेगा।

अगर निवेश में विकास दर को देखें, तो वह गिरकर एक प्रतिशत पर आ गई है। इसका मतलब है कि निवेश लगभग नहीं के बराबर हो रहा है। जब अर्थव्यवस्था में मांग बनी रहती है, तभी निवेश भी सुगमता से उपलब्ध हो पाता है। अभी निवेश वृद्धि दर पिछली 19 तिमाही के निचले स्तर पर है। जब तक अर्थव्यवस्था में निवेश नहीं बढ़ेगा, तब तक नौकरियां नहीं पैदा होंगी। जब तक नौकरियां पैदा नहीं होंगी, तब तक लोगों की आय में वृद्धि नहीं होगी, और तब तक लोग खर्च नहीं करेंगे। जब लोग खर्च नहीं करेंगे, तो निजी खपत कैसे बढ़ेगी। यह सब एक -दूसरे से जुड़ा हुआ है।

सरकार को इस मामले को गंभीरतापूर्वक लेना चाहिए। आर्थिक मंदी की किसी परिभाषा में उलझने के बजाय निचले स्तर के उपभोक्ताओं की क्रय क्षमता को बढ़ाने में अपनी ऊर्जा लगा देनी चाहिए।

पांच ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी का सपना : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ ग्रहण के कुछ दिन बाद कहा था कि हम देश की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर कर देंगे। लेकिन जिस तरह से देश में आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट जारी है, उससे देश के लिए इस संकल्प को पूरा करने का लक्ष्य भी हाथ से फिसलता जा रहा है। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2024-25 तक पांच ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी के लिए 12 प्रतिशत का विकास दर अपेक्षित है। स्वयं सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार के अनुसार पांच ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी के लक्ष्य को पाने के लिए आठ प्रतिशत विकास दर तो न्यूनतम आवश्यक है। अगर जीडीपी विकास दर 4.5 फीसद रही, तो भारतीय अर्थव्यवस्था और भी धीमी गति से विकसित होगी। इस विकास दर से इस लक्ष्य को पाने में कम से कम 14 वर्ष लगेंगे। दूसरे शब्दों में इस विकास दर से पांच ट्रियिलन डॉलर का लक्ष्य 2033-34 तक ही हासिल किया जा सकता है।

खपत में गिरावट का असर : खपत दर घटने से लोगों की आमदनी पर बुरा असर पड़ रहा है। देश में बाजार की एक बड़ी शोधकर्ता कंपनी की रिपोर्ट कहती है कि तेजी से खपत वाले सामान एफएमसीजी यानी फास्ट मूविंग कंजम्प्शन गुड्स की बिक्री की विकास दर भी गिरती जा रही है। गिरती अर्थव्यवस्था के लिए खपत दर में कमी को ‘गोल्डमैन सैक्स’ ने भी रेखांकित करते हुए कहा है कि खपत में गिरावट का कारण एनबीएफसी संकट को नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकि आइएलएंडएफएस के भुगतान संकट से पहले खपत में गिरावट को देखा जा सकता है। एनबीएफसी में संकट सितंबर 2018 में शुरू हुआ, लेकिन खपत में गिरावट जनवरी 2018 से ही जारी है।

घरेलू कारणों से धीमी हुई अर्थव्यवस्था की रफ्तार : सरकार बार-बार कह रही है कि विकास की धीमी रफ्तार का कारण वैश्विक मंदी है। सरकार इसके लिए चीन-अमेरिका ट्रेड वॉर को भी जिम्मेदार मानती है। हालांकि, यह दलील काफी सतही है। मसलन, ट्रेड वॉर में उलझे चीन की इसी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में वृद्धि दर छह प्रतिशत है। यह कहना मुश्किल है कि चीन की तुलना में भारत पर ट्रेड वॉर का असर ज्यादा पड़ रहा है। इसी तरह पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी जीडीपी विकास दर सात प्रतिशत बना हुआ है। इससे समझा जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार के कारण बाहरी न होकर, बल्कि आंतरिक ही हैं।

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं। प्रकाशित विचार उनके निजी हैं।)

Posted By: Manish Mishra

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