नई दिल्‍ली, अजीत मेनन। एक निवेशक के लिहाज से देखें तो पोर्टफोलियो में असल विविधता तब आती है, जब पोर्टफोलियो में समूचे परस्पर संबंधित एसेट में निवेश किया जाता है। इसे हासिल करने का सबसे आसान तरीका होता है, शेयरों और बॉन्डों में उपयुक्त जोखिम के साथ निवेश करना। हालांकि जब सरप्लस रकम बढ़ जाती है, तो कोई व्यक्ति सोना, कमोडिटी और रीयल एस्टेट को भी अपने एसेट आवंटन में जोड़ने पर विचार कर सकता है। तमाम रिसर्च से यह सुझाव मिलता है कि आपके रिटर्न पर करीब 91.5 फीसदी असर आपके एसेट आवंटन का ही होता है, बजाय कि आपके शेयरों के चयन या बाजार में उतने के समय के। गोल्ड और रीयल एस्टेट जैसे हार्ड एसेट बढ़ती महंगाई के दौर में बेहतर प्रदर्शन करते दिखते हैं।

वास्तव में दुनिया भर में रीयल एस्टेट हाल के समय में संस्थागत धन का प्रवाह देखा गया है। एक वजह यह है कि ज्यादातर विकसित अर्थव्यवस्थाओं में रेंटल यील्ड (यानी किराये से कमाई) ब्याज दरों के मुकाबले ज्यादा रहता है। हालांकि नकदी प्रवाह की स्थिीरता, महामारी के दौर में भी कई सेगमेंट की प्रत्यास्थता और शेयर बाजारों के साथ कम सह-संबंध ने रियल एस्टेट को एक विश्वसनीय बना एसेट क्लास बना दिया है।

ऐसा कोई भी एसेट क्लास जिसमें काफी ज्यादा धन लगता हो, नए सेगमेंट का इनोवेशन और विकास लेकर आता है। REITs जैसे नए साधन, डेटा सेंटर को शामिल करने वाले गैर परंपरागत सेक्टर के साथ उभरता टोकनाइजेशन, सीनियर लीविंग (वरिष्ठ नागरिकों के लिए आवास) और सेल्फ स्टोरेज जैसी चीजों में औसत से ज्यादा बढ़त देखी जा रही है, क्योंकि यह सेक्टर बदलते समय के अनुरूप ढल रहा है।

डेटा हमारे डिजिटल भविष्य की रीढ़ की हड्डी है। बढ़ती डेटा जरूरतों के मुताबिक डेटा स्टोरेज की जरूरतें भी बढ़ रही हैं। किसी दफ्तर के परिसर में सर्वर पर ऐप्स और डेटा के संग्रहण की जगह कारोबार जगत इसे क्लाउड में भेज रहा है या डेटा सर्वर को किसी दूरदराज के इलाके में स्थापित कर रहा है। इसकी वजह से क्लाउड सर्विस प्रदान करने वालों और कारोबारी प्रतिष्ठानों में हाउसिंग सर्वर, राउटर्स, स्विचेज आदि की मांग बढ़ी है।

उम्रदराज लोगों की बढ़ती जनसंख्या, न्यूक्लियर परिवार, आजादी को महत्व आदि की वजह से अमेरिका, यूके, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में सीनियर लिविंग एक आला दर्जे की श्रेणी के रूप में उभर रहा है।

अमेरिका, यूके, फ्रांस और जर्मनी में सीनियर लिविंग अपार्टमेंट बुजुर्ग लोगों की जरूरतों और मांग को ध्यान में रखते हुए खास तरह से डिजाइन किए जाते हैं। परंपरागत मकानों में बुर्जुर्गों के लिए जो समस्याएं होती हैं जैसे सीढ़ियां, ऊंचे कैबिनेट आदि, सफाई, लॉन्ड्री और अन्य घरेलू जरूरतों आदि का पूरा ध्यान सीनियर लिविंग कम्युनिटीज में हॉस्पिटल/मेडिकल सेंटर, लॉन्ड्री और हाउसकीपिंग सेवाएं आदि की व्यवस्था के द्वारा रखा जाता है।

विकसित देशों में 62 साल के बहुत से वयस्क अपने मकान बेचकर ऐसी कम्युनिटीज में किराये पर रहने चले जा रहे हैं, जिसकी वजह से इस सेक्टर में बहुत सी पूंजी आ रही है।

जगह की कमी से परेशान ग्राहकों के लिए सेल्फ स्टोरेज कारोबार ऐसा सुरक्षित स्थान मुहैया करते हैं, जहां वे ऐसे सामान रख देते हैं जिनकी अभी जरूरत नहीं होती, लेकिन जिन्हें वे फेंक नहीं सकते। लोग ऐसे सेल्फ स्टोरेज का इस्तेमाल कई वजहों से करते हैं, जैसे मकानों का छोटा आकार, रेनोवेशन, स्थान बदलने, सेना में पोस्टिंग और बिजनेस रिकॉर्ड रखने के लिए।

ये सुविधाएं अब बड़े कारोबार का आकार ले चुकी हैं, हर 10 में से 1 अमेरिकी परिवार करीब 50,000 सेल्फ स्टोरेज केंद्र में से एक का इस्तेमाल जरूर करता है। इस सेक्टर से अमेरिका में सालाना 22 अरब डॉलर से ज्यादा की आय का सृजन होता है और इसमें किराये पर जो जगह दी जा रही है वह कुल मिलाकर मैनहट्टन द्वीप के तीन गुना आकार के बराबर हो गई है। यह इस सेक्टर के छोटे लेकिन विकसित होते घटक हैं।

रीयल एस्टेट में निवेश करने वालों का अब भी मुख्य जोर कॉमर्शियल और रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी के मिश्रण के पारंपरिक तरीके पर ही है। लेकिन वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज और ऑनलाइन शॉपिंग में तेजी की वजह से खुदरा आपूर्ति के लिए अरबन स्पेस भी अब निवेशकों की नजरों में हैं। किसी लॉजिस्टिक ऑपरेटर के कुल संचालन लागत का किराया बहुत छोटा हिस्सा होता है और यह आपूर्ति में आने वाले ट्रांसपोर्टेशन लागत के मुकाबले भी काफी कम होता है। इसकी वजह से मकान मालिकों के लिए अब ज्यादा गुंजाइश बन रही है कि किसी अच्छी जगह स्थापित छोटे बाजार में किराया बढ़ा दें, ऐसी जगह जो किसी लॉजिस्टिक ऑपरेटर या खुदरा विक्रेता को डिलिवरी स्पीड, वेयरहाउसिंग और ढुलाई की लागत के बीच बेहतर संतुलन मुहैया करा सके।

एसेट लाइट कारोबार के दौर में ज्यादा से ज्यादा कारोबारी किसी ऑफिस को खरीदने की जगह उसे लीज पर लेना पसंद कर रहे हैं। इसकी वजह से बड़े संस्थानों के लिए इस बात की गुंजाइश बनी है कि ऑफिसेज खरीद कर अच्छे किरायेदार रखें और किराये के रूप में कमाई करें। वैसे तो महामारी के दौर ने वर्क फ्रॉम होम की अवधारणा में तेजी लाई है, लेकिन दफ्तरों का महत्व कम नहीं होने वाला। ज्यादातर अच्छी कंपनियां अब छोटे दफ्तरों की तलाश में रहेंगी, लेकिन वे ए ग्रेड की इमारतों में अपने को स्थानांतरित करना चाहेंगी।

गतिशीलता, किफायत, बड़ी पूंजी लगाने की अनिच्छा आदि की वजह से बहुत से लोग अब किराये के अपार्टमेंट में रहना पसंद कर रहे हैं। बड़ी संस्थाएं, निवेशक ऐसे शहरी अपार्टमेंट बना रहे हैं और उन्हें किराये पर उठा रहे हैं जिनसे उन्हें नियमित रूप से नकदी हासिल हो सके।

रीयल एस्टेट काफी स्थानीय खेल होता है। जो चीज मुंबई में लागू होती है, जरूरी नहीं कि वह टोक्यो में भी प्रासंगिक हो। न्यूयॉर्क में किसी रेजिडेंशियल रीयल एस्टेट को बढ़ावा देने के तत्व पेरिस या बर्लिन के मुकाबले पूरी तरह से अलग हो सकते हैं, जहां कि किराये पर अंकुश लगाया गया है। अमेरिका में ए ग्रेड के दफ्तरों की आपूर्ति में कमी आ रही है क्योंकि 70 फीसदी ऑफिस स्पेस वहां 1990 से पहले के बने हैं, जबकि सियोल, शंघाई और मेलबर्न में आपूर्ति बढ़ रही है।

मुझे उम्मीद है कि इन सबसे एक ऐसे एसेट क्लास के लिए बेहतर संभावनाएं बनने में मदद मिलेगी जिसे कि भारत में परंपरागत रूप से काफी पसंद किया जाता रहा है।

(लेखक PGIM इंडिया म्यूचुअल फंड के सीईओ हैं। छपे विचार उनके निजी हैं।)

Edited By: Ashish Deep