नई दिल्‍ली, धीरेंद्र कुमार। गुम हो चुकी संपत्ति और शेयर इक्विटी निवेश की पुरानी समस्याओं में से एक है। लेकिन प्रक्रिया के डिजिटल होने के साथ ही अब धीरे-धीरे इस समस्या से निजात मिलने लगी है। इन्वेस्टर एजुकेशन एंड प्रोटेक्शन फंड अथॉरिटी (आइईपीएफए) इसमें बहुत सहायक साबित हो रहा है। भुगतान और मूल शेयर को रिक्लेम करने मामले भारतीय कानून कभी साफ नहीं रहे हैं। पुराने कंपनी लॉ के मुताबिक ऐसा धन जिस पर लंबे समय तक किसी ने दावा नहीं किया है, वह कंपनी द्वारा सरकार को ट्रांसफर कर दिया जाएगा। अगर इस पर कोई कभी दावा नहीं करता है, तो ये पैसा निर्विवाद रूप से सरकार का हो जाता है। अगर पुराने कंपनी एक्ट की बात करें, तो इसमें इस बात का प्रावधान है कि कोई भी धन पर अपना दावा कर सकता है।

हालांकि, इसे हासिल करना आसान नहीं होता था। इससे संबंधित नियमों की भाषा कुछ ऐसी थी.. जिन मामलों में दावेदार पूर्व धन पर दावा करता है, जो कि कंपनियों के रजिस्ट्रार के विवेक पर निर्भर करता है, ऐसे मामलों में कंपनी का रजिस्ट्रार उस दावेदार को क्षतिपूर्ति बांड भरने को कह सकता है। अलग-अलग प्रावधानों में इस तरह की भाषा का प्रयोग किया गया था। 

यह कोई ऐसी आसान प्रक्रिया तो थी नहीं, जहां कोई साधारण व्यक्ति अपने माता-पिता या संबंधी द्वारा भूले गए शेयरों या किसी अन्य निवेश लाभ पर दावा करने के बारे में सोच भी सके। दूसरी ओर जो व्यक्ति या कंपनी इस इस तरह का दावा करने की हालत में थे, वे इसे भूलते ही क्यों? ऐसे मामलों में संपत्ति सरकार के राजस्व खाते में चली जाती थी।

कंपनी एक्ट, 2013 में कई परिवर्तन किए गए हैं। नए नियमों के मुताबिक ऐसे लाभांश जिन पर सात वर्षो तक कोई दावा नहीं किया गया है, आइईपीएफए के पास चले जाएंगे। इसके अलावा ऐसे शेयर, जिनके लिए लगातार सात वर्ष तक लाभांश का दावा नहीं किया गया है, वे भी कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के अधीन इस संगठन के मालिकाना हक में ट्रांसफर हो जाएंगे। 

इसके अंतर्गत एक नया डिजिटल सिस्टम तैयार किया गया है। इस प्रक्रिया के तहत जो लोग अपने शेयर या लाभांश पर दावा करने में नाकाम रहे हैं, वे आइईपीएफए की वेबसाइट ‘डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू डॉट आइईपीएफ डॉट जीओवी डॉट इन’ पर रजिस्टर कर सकते हैं। इसके बाद वे अपने दावे के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसमें उन्हें अपनी पहचान के साथ अन्य संबंधित जानकारी देनी होगी। दावे का सत्यापन और पहचान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद आवेदकों को उनकी भूली हुई संपत्ति वापस लौटा दी जाएगी। 

यह तरीका काफी हद तक अपने मकसद में सफल रहा है। जानकारी के मुताबिक इस तरह से अब तक करीब 200 करोड़ रुपये उचित दावेदारों को दिया जा चुका है।

भूले हुए निवेश या दूसरे तरह के असेट को वापस पाने के लिए यह तरीका निश्चित रूप से बहुत सुविधाजनक है। आगे जैसे-जैसे इसको लेकर जागरूकता आएगी, इस तरह की समस्या कम होती जाएगी। जिन मामलों में शेयर डीमैट अकाउंट में होते हैं उनमें लाभांश सीधे निवेशक के खाते में पहुंच जाता है। इस तरह के मामलों में जैसे-जैसे आइईपीएफए को लेकर जागरूकता फैलेगी, पुराने फंड की पहचान आसान होती जाएगी।

इस समस्या का एक और पहलू भी है, जो कि पुराने म्‍युचुअल फंड्स में निवेश की पहचान से जुड़ा है। इस तरह के निवेश का आइईपीएफए या एमसीए से कोई संबंध नहीं होता है। इसका प्रबंधन म्‍युचुअल फंड्स खुद ही करते हैं। जहां तक मुझे पता है, म्‍युचुअल फंड्स में गुम हो गया धन इसी तरह गुम हुए कॉरपोरेट लाभांश से कहीं अधिक है। 

शायद ये इसलिए भी हो सकता है कि म्‍युचुअल में बहुत ज्यादा संख्या में निवेशक होते हैं, जो छोटा निवेश करते हैं और भूल जाते हैं। करीब एक वर्ष पहले म्‍युचुअल फंड्स में इस तरह का लावारिश धन 44 हजार करोड़ रुपये था। यह म्‍युचुअल फंड्स में निवेश किए गए कुल धन का 1.75 परसेंट है।

अगर मैं ये कहूं कि इसमें से ज्यादातर निवेश कंपनियों के बजाय व्यक्तिगत है, (जो तार्किक भी है) तो परसेंट में यह दोगुने से अधिक हो सकता है। जो भी हो, अब तो काफी समय से केवाईसी और पैन कार्ड के नियम लागू हैं। इसलिए अब संभावना इसी बात की है कि लावारिस पड़े धन में ज्यादातर हिस्सा पुराना ही होगा। ऐसे में कह सकते हैं कि निवेशकों के गुम हुए निवेश की समस्या समय के साथ कम होती जाएगी।

(लेखक वैल्‍यू रिसर्च के सीईओ हैं। प्रकाशित विचार उनके निजी हैं।)

Posted By: Manish Mishra

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