पूंजी बाजार नियामक सेबी ने म्युचुअल फंड उद्योग के लिए हाल ही में जिस तरह के नए नियम लाए हैं, वे उद्योग को पूरी तरह बदल देने की क्षमता रखते हैं। कमाई करते रहने के लिए म्युचुअल फंड कंपनियां जिस तरह के गैरवाजिब तरीकों के इस्तेमाल की संस्कृति विकसित कर चुके हैं, सेबी के नए नियम उस पर चोट करते दिख रहे हैं। हालांकि कंपनियां हमेशा की तरह इनमें भी झोल तलाशने की पूरी कोशिश करेंगी, लेकिन निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए नए कदम बेहद महत्वपूर्ण हैं।

पूंजी बाजार नियामक सेबी ने पिछले दिनों देश में म्युचुअल फंड उद्योग को नियंत्रित करने वाले दिशा-निर्देशों में आधारभूत और आमूल-चूल बदलावों की घोषणा की है। यह लिखने से पहले ही मुझे ऐसा कुछ होने का एहसास हो गया था। पिछले करीब एक दशक में शायद दो बार मैंने बिल्कुल यही बातें कही हैं। दोनों ही बार मेरी बात सच साबित हुई। लेकिन इस बार का मामला पिछले दोनों घटनाक्रमों के मुकाबले अलग और बड़ा है। इस बार का मामला इसलिए अलग और बड़ा है क्योंकि सभी फंड कंपनियों और वितरकों को अपना कारोबारी मॉडल ही पूरी तरह बदलना होगा।

नए नियमों के हिसाब से एक बड़ा बदलाव तो यह है कि भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने फंड कंपनियों द्वारा निवेशकों से लिए जाने वाले शुल्क में कटौती कर दी है। लेकिन बड़ा बदलाव यह है कि किसी भी फंड में निवेशकों को पूंजी लगाने के लिए आकर्षित करने के एवज में फंड वितरकों को जो अग्रिम शुल्क मिलता था, नियामक ने उसे पूरी तरह खत्म कर दिया है। इसके बदले फंड वितरकों को अब सिर्फ ट्रेल कमीशन मिलेगा। जब तक किसी फंड में रकम लगी रहती है, तब तक वितरकों को कमीशन के तौर पर मिलने वाली एक या दो फीसद रकम को ट्रेल कमीशन कहा जाता है।

यह कोई छोटा-मोटा नहीं, बल्कि बड़ा बदलाव है। ऐसा मानने की वजह यह है कि कमीशन के मामले में भले ही यह सतही या बेमतलब की बात लगे, लेकिन हकीकत यह है कि इस बदलाव के जरिये सेबी ने फंड कंपनियों और वितरकों के कारोबारी मॉडल को ही पूरी तरह बदल देने की कोशिश की है। और सेबी की इस कोशिश का मकसद सिर्फ यह है कि फंड कंपनियों और वितरकों के कारोबारी हित निवेशकों के हितों से मेल खाते दिखें। अग्रिम शुल्क का मतलब यह है कि जब भी कोई निवेशक निवेश करता है, तो इस निवेश में मदद मुहैया कराने वाले वितरक को निवेश की कुल रकम का शायद एक या दो फीसद हिस्सा कमीशन के रूप में मिलता है। ऐसे में वितरकों की दिलचस्पी सिर्फ इस बात में बनी रहती है कि किसी तरह लेनदेन पूरा हो जाए। मतलब यह कि एक ही निवेशक से बार-बार कमीशन हासिल करने के चक्कर में फंड वितरक पूरी कोशिश करता है कि निवेश की रकम का एक से दूसरे फंड में बार-बार लेनदेन होता रहे।

नए कानूनों के जरिये सेबी ने फंड वितरकों और म्युचुअल फंड कंपनियों की इस पुरानी आदत पर बड़ी चोट की है। नियामक ने अग्रिम शुल्क की व्यवस्था ही खत्म कर दी। अब बेवजह रकम को इस फंड से उस फंड में डालने या इधर-उधर घुमाते रहने के एवज में वितरकों को कोई अग्रिम शुल्क नहीं मिलेगा, बल्कि उन्हें बस ट्रेल कमीशन से संतुष्ट रहना पड़ेगा। नए नियमों के मुताबिक जब तक निवेशक अपना निवेश जारी रखेगा, तब तक फंड वितरक को नियमित आय मिलती रहेगी।

यह बात बेहद सरल लगती है। और इससे निवेशकों को होने वाले फायदे की बात करें, तो यह वास्तव में सरल है भी। लेकिन पिछले कई वर्षो का मेरा अपना अनुभव कहता है कि फंड कंपनियों और वितरकों में अपनी सेल्स टीम पर हर तरह से दबाव बनाकर ज्यादा से ज्यादा लेनदेन पूरा करवाने की एक संस्कृति पैदा हो चुकी है। मेरे हिसाब से उसमें तुरंत ना भी हो, तो धीरे-धीरे बदलाव जरूर आना चाहिए। इससे पहले का खेल यह था कि किसी भी तरह से निवेशकों की रकम इधर से उधर होती रहनी चाहिए। अब पूरा खेल बदल जाएगा। सेबी के नए नियमों के बाद फंड कंपनियों का फोकस निवेशकों की रकम ऐसी चुनिंदा योजनाओं में लगाने में रहेगा, जिसमें निवेशक लंबे समय तक टिक सकें। निवेशक टिके रहेंगे, तो फंड कंपनियों और वितरकों को आमदनी होती रहेगी। लेकिन ऐसा करने के लिए फंड कंपनियों को बेहद अलग तरह के नजरिये की जरूरत होगी, उनके कारोबार को भी अलग नजरिया चाहिए होगा, और शायद इसके लिए उन्हें कर्मचारी भी बिल्कुल अलग तरह की सोच वाले चाहिए होंगे।

लेकिन सेबी का जो हालिया निर्णय है, उसमें अन्य दूरगामी बदलावों के संकेत भी नीहित हैं।

नए नियमों के तहत न सिर्फ फंड कंपनियों द्वारा खर्च के मद में वसूला जाने वाला शुल्क घटा दिया गया है, बल्कि उनकी संरचना में भी बेहद महत्वपूर्ण तरीके से बदलाव किया गया है। अब बड़ी फंड कंपनियों को राजस्व के मद में मिलने वाली रकम में बड़ी कमी आने वाली है। दूसरी तरफ, इसका सीधा फायदा छोटी फंड कंपनियों को होगा, जो अब तक अपनी बड़ी स्पर्धी कंपनियों के सामने करीब-करीब बेबस सी दिखती रही हैं।

सच पूछिए तो सेबी द्वारा लाए नवीनतम बदलावों की पूरी कवायद का मकसद फंड कंपनियों को एक बड़ा सबक देना है। अपने आधिकारिक बयान में सेबी ने कहा कि निदेशक बोर्ड ने प्रस्ताव के फायदों को कंपनियों की अर्थव्यवस्था के आकार, म्युचुअल फंड निवेशकों का खर्च घटाने, फंड कंपनियों के खर्च के आंकड़ों में पारदर्शिता लाने और मिस-सेलिंग जैसी घटनाओं को रोकने के नजरिये से देखा।

जहां तक कमीशन के अब तक के खेल और खर्च को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की आदत का सवाल है, तो नए बदलावों से इन गतिविधियों पर अब पूरी तरह से लगाम लगने वाला है। उदाहरण के लिए, फंड कंपनियां अपने वितरकों को कमीशन के भुगतान के लिए कई तरह के रास्तों का इस्तेमाल कर लेती रही हैं। लेकिन नए नियमों के तहत सेबी ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि फंड कंपनियां अपने वितरकों को सभी कमीशन और खर्च का भुगतान सिर्फ और सिर्फ फंड योजना के जरिये ही करेंगी। अब उनका भुगतान असेट मैनेजमेंट कंपनियों (एएमसी), सहयोगियों, प्रायोजकों, ट्रस्टी या किसी भी अन्य माध्यम से नहीं किया जाएगा। सेबी का यह नया प्रावधान बताता है कि म्युचुअल फंड उद्योग को किस तरह के अनुचित कारोबारी तरीकों ने जकड़ रखा है।

अगर इतिहास सच में ही कोई दिशा दिखाता है, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि फंड कंपनियां निश्चित तौर पर सेबी के नए नियमों में भी झोल तलाश करने की पूरी कोशिश करेंगी। जो भी हो, मेरा अंतर्मन कहता है कि सेबी अब ऐसी किसी भी तरह की गतिविधि को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। आने वाले सप्ताहों और महीनों के दौरान मैं हालिया बदलावों के असर का आकलन और उसके बारे में चर्चा करता रहूंगा। लेकिन फिलवक्त मैं ऐसा कह सकता हूं कि निवेशकों के हितों की रक्षा करते दिख रहे नए बदलाव बेहद महत्वपूर्ण हैं।

(इस लेख के लेखक धीरेन्द्र कुमार हैं जो कि वैल्यू रिसर्च के सीईओ हैं।)

Posted By: Praveen Dwivedi

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